संकट में हिमालय: नेपाल की त्रासदी हमें क्या सिखाती है?
हिमालय को अक्सर "तीसरा ध्रुव" कहा जाता है, क्योंकि यहाँ ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सबसे अधिक हिमनद पाए जाते हैं। यही हिमनद गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी महान नदियों को जीवन देते हैं। लेकिन आज हिमालय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ प्राकृतिक संतुलन और मानवीय हस्तक्षेप के बीच संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है। हाल ही में नेपाल और तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी आपदाएँ अब केवल प्राकृतिक घटनाएँ नहीं रह गई हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और विकास की गलत नीतियों का संयुक्त परिणाम हैं।
नेपाल में आई हालिया आपदा की शुरुआत ऊँचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में हुई, जहाँ ग्लेशियरों और उनसे बनी झीलों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान के कारण हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं और नई ग्लेशियल झीलें बन रही हैं। जब अत्यधिक वर्षा, बादल फटना या भू-स्खलन जैसी घटनाएँ इन झीलों को प्रभावित करती हैं, तो ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी विनाशकारी घटनाएँ सामने आती हैं। नेपाल में सैकड़ों लोगों की जान जाने और बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की घटना इसी बढ़ते संकट का संकेत है।
हालाँकि केवल जलवायु परिवर्तन को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा। पिछले कुछ दशकों में हिमालयी क्षेत्रों में सड़कों, सुरंगों, चारधाम परियोजनाओं और जलविद्युत परियोजनाओं का व्यापक विस्तार हुआ है। विकास आवश्यक है, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों और पर्यावरणीय सीमाओं की अनदेखी की जाती है। पर्वतीय ढलानों को काटने, बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य करने और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप करने से भूस्खलन और बाढ़ का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
उत्तराखंड की 2021 की ऋषिगंगा आपदा इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। ग्लेशियर के एक हिस्से के टूटने से उत्पन्न बाढ़ ने जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुँचाया और अनेक लोगों की जान चली गई। इस घटना ने दिखाया कि जब संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में बिना पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन के विकास परियोजनाएँ लागू की जाती हैं, तो प्राकृतिक खतरे मानवीय त्रासदी में बदल जाते हैं। नेपाल की वर्तमान स्थिति भी इसी चेतावनी को दोहराती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हिमालय को केवल संसाधनों के भंडार के रूप में न देखा जाए, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र के रूप में समझा जाए। ग्लेशियरों और हिमनदीय झीलों की नियमित निगरानी, प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक आधार पर पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी को विकास प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। साथ ही, पर्वतीय क्षेत्रों की वहन क्षमता के अनुसार ही विकास परियोजनाओं को अनुमति दी जानी चाहिए।
अंततः, नेपाल की हालिया त्रासदी हमें यह सिखाती है कि हिमालयी आपदाएँ अब केवल प्रकृति का प्रकोप नहीं हैं। वे जलवायु परिवर्तन और मानव निर्मित दबावों के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम हैं। यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में ऐसी घटनाएँ और अधिक विनाशकारी रूप ले सकती हैं। इसलिए हिमालय की सुरक्षा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक प्राथमिकता होनी चाहिए।
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