अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
भारतीय खेलों में भागीदारी की बहु-आयामी वृद्धि: ‘पोडियम से प्लेग्राउंड’ तक बदलती खेल संस्कृति परिचय पिछले एक दशक में भारतीय खेल परिदृश्य ने अभूतपूर्व परिवर्तन देखा है। 2019 के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जीते गए स्वर्ण और अन्य पदकों ने न केवल गौरव बढ़ाया, बल्कि जमीनी स्तर पर खेलों में भागीदारी के नए द्वार भी खोले। विशेष रूप से बैडमिंटन, जैवलिन थ्रो और शूटिंग जैसे खेलों में युवा खिलाड़ियों का रूझान लगातार बढ़ा है — और इस परिवर्तन के केंद्र में प्रेरक रोल-मॉडल के रूप में उभरे हमारे पदक विजेता हैं। इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बड़ी संख्या में महिला एथलीटों की भागीदारी बढ़ी है , जिसके कारण लिंग-आधारित बाधाएँ टूट रही हैं और खेलों की पहुँच ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों तक फैल रही है। दूसरे शब्दों में, पदक अब केवल उपलब्धि नहीं रहे — वे सामाजिक गतिशीलता का माध्यम बन गए हैं। बैडमिंटन: साइना–सिंधु से सत्विक-चिराग तक बढ़ती परंपरा भारत में बैडमिंटन का स्वर्णिम दौर साइना नेहवाल और पी.वी. सिंधु से शुरू हुआ, जिसने खेल के प्रति जनविश्वास और उत्साह को नई ऊँचाई दी। इस विरासत को आगे बढ़ाते ...