भारतीय खेलों में भागीदारी की बहु-आयामी वृद्धि: ‘पोडियम से प्लेग्राउंड’ तक बदलती खेल संस्कृति
परिचय
पिछले एक दशक में भारतीय खेल परिदृश्य ने अभूतपूर्व परिवर्तन देखा है। 2019 के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जीते गए स्वर्ण और अन्य पदकों ने न केवल गौरव बढ़ाया, बल्कि जमीनी स्तर पर खेलों में भागीदारी के नए द्वार भी खोले। विशेष रूप से बैडमिंटन, जैवलिन थ्रो और शूटिंग जैसे खेलों में युवा खिलाड़ियों का रूझान लगातार बढ़ा है — और इस परिवर्तन के केंद्र में प्रेरक रोल-मॉडल के रूप में उभरे हमारे पदक विजेता हैं।
इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बड़ी संख्या में महिला एथलीटों की भागीदारी बढ़ी है, जिसके कारण लिंग-आधारित बाधाएँ टूट रही हैं और खेलों की पहुँच ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों तक फैल रही है। दूसरे शब्दों में, पदक अब केवल उपलब्धि नहीं रहे — वे सामाजिक गतिशीलता का माध्यम बन गए हैं।
बैडमिंटन: साइना–सिंधु से सत्विक-चिराग तक बढ़ती परंपरा
भारत में बैडमिंटन का स्वर्णिम दौर साइना नेहवाल और पी.वी. सिंधु से शुरू हुआ, जिसने खेल के प्रति जनविश्वास और उत्साह को नई ऊँचाई दी। इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए सत्विकसाइराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी ने डबल्स श्रेणी में इतिहास रचा—एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ गेम्स और विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर वे विश्व नंबर-1 रैंकिंग तक पहुँचे।
उनकी सफलता का सबसे बड़ा प्रभाव जमीनी स्तर पर दिखाई देता है—
- जूनियर डबल्स श्रेणियों में एंट्री दोगुनी से अधिक हुई
- राजस्थान, पंजाब, मिजोरम, उत्तराखंड और तमिलनाडु में विशेष डबल्स-कोचिंग केंद्र विकसित हुए
- अंडर-13 और अंडर-15 प्रतियोगिताओं में हजारों प्रतिभागियों का जुड़ना सामान्य हो गया
यह संकेत देता है कि बैडमिंटन अब महानगरों तक सीमित खेल नहीं रहा। छोटे कस्बों और ग्रामीण पृष्ठभूमि से नई प्रतिभाएँ उभर रही हैं, जो इसे एक जनआंदोलन जैसा स्वरूप दे रही हैं।
जैवलिन थ्रो: नीरज चोपड़ा और ‘जैव-ल्यूशन’ की शुरुआत
2021 टोक्यो ओलंपिक में नीरज चोपड़ा की स्वर्णिम जीत भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ बनकर उभरी। इस सफलता ने पूरे देश में जैवलिन थ्रो के प्रति अभूतपूर्व आकर्षण पैदा किया—
- जूनियर नेशनल प्रतियोगिताओं में महिला भागीदारी कई गुना बढ़ी
- ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों से नए खिलाड़ी सामने आए
- 80 मीटर से अधिक दूरी फेंकने वाले एथलीटों की संख्या लगातार बढ़ रही है
‘राष्ट्रीय जैवलिन दिवस’ जैसे पहल कार्यक्रमों ने इस ऊर्जा को संगठित दिशा दी। यहाँ उल्लेखनीय तथ्य यह है कि लक्षद्वीप, पहाड़ी क्षेत्रों और आदिवासी बेल्ट जैसे दूरस्थ इलाकों से भी बड़ी संख्या में खिलाड़ी सामने आए—यह दर्शाता है कि प्रेरणा की शक्ति संरचनात्मक सीमाएँ पार कर सकती है।
नीरज की सफलता ने यह संदेश मजबूत किया है—
“प्रतिभा कहीं भी जन्म ले सकती है, बस अवसर और विश्वास की आवश्यकता होती है।”
शूटिंग: गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में फैलती खेल चेतना
अभिनव बिंद्रा, गगन नारंग और मेहुली घोष जैसी प्रतिभाओं ने शूटिंग को भारत में मजबूत पहचान दिलाई। 2019 के बाद यह खेल एक नए विस्तार चरण में प्रवेश करता हुआ दिखाई देता है—
- राष्ट्रीय चैंपियनशिप में प्रतिभागियों की संख्या दोगुनी से अधिक
- एयर पिस्टल और एयर राइफल इवेंट्स में युवा खिलाड़ियों की मजबूत उपस्थिति
- टियर-2 और टियर-3 शहरों में शूटिंग रेंज और प्रशिक्षण केंद्रों का प्रसार
ध्यान देने योग्य पहलू यह है कि शूटिंग अब केवल सैन्य-प्रभावित या शहरी खेल नहीं रहा। औद्योगिक टाउनशिप, कृषि क्षेत्र और छोटे शहरों के छात्र-छात्राओं के बीच भी यह तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
इस परिवर्तन के पीछे तीन प्रमुख कारक रहे—
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर पदक
- अपेक्षाकृत बेहतर उपकरण-सुविधाएँ
- निजी व सरकारी खेल योजनाओं का विस्तार
बदलती भागीदारी: सामाजिक समावेशन की दिशा में कदम
भारतीय खेलों में बढ़ती भागीदारी केवल संख्या का खेल नहीं है—
यह सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत है।
- महिला खिलाड़ियों की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी
- खेलों का प्रसार महानगरों से आगे ग्रामीण-अंचलों तक
- सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की विविधता में वृद्धि
खेलों में यह समावेशिता स्वास्थ्य, आत्मविश्वास, सामुदायिक पहचान और सामाजिक गतिशीलता को मजबूत करती है।
नीतिगत संकेत: पदक से आगे बढ़कर सतत विकास की आवश्यकता
आज यह स्पष्ट हो चुका है कि
“पदक प्रेरणा पैदा करते हैं, लेकिन संरचना उस प्रेरणा को टिकाऊ बनाती है।”
इसीलिए आगे की दिशा निम्न बिंदुओं पर केंद्रित होनी चाहिए—
- जमीनी स्तर पर खेल अवसंरचना और प्रशिक्षक-व्यवस्था का विस्तार
- स्कूल–कॉलेज आधारित खेल प्रणाली का सुदृढ़ीकरण
- महिला और ग्रामीण खिलाड़ियों के लिए विशेष समर्थन तंत्र
- प्रतिभा पहचान और दीर्घकालिक प्रशिक्षण मॉडल
यदि इस प्रेरणाशक्ति को नीति, सुविधाओं और अवसरों से जोड़ा जाए, तो भारत न केवल अधिक पदक जीतेगा, बल्कि एक सशक्त, स्वस्थ और समावेशी खेल-संस्कृति का निर्माण करेगा।
निष्कर्ष
2019 के बाद भारतीय खेलों की कहानी यह दिखाती है कि जब कोई खिलाड़ी वैश्विक मंच पर तिरंगा लहराता है, तो उसकी गूँज केवल स्टेडियम तक सीमित नहीं रहती—वह हजारों-लाखों युवाओं के सपनों में उतर जाती है। यही वह क्षण है जहाँ “पोडियम” की चमक “प्लेग्राउंड” तक पहुँचती है और खेल एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बन जाता है।
With Indian Express Inputs
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