तारिक रहमान: निर्वासन की आग से निकली आशा की ज्योति
बांग्लादेश के नए राजनीतिक सूर्योदय की कहानी
20 नवंबर 1965 को ढाका में जन्मे आज बांग्लादेशी राजनीति के सबसे निर्णायक व्यक्तित्व के रूप में उभरे हैं। 2026 के आम चुनावों में (BNP) की ऐतिहासिक जीत के बाद वे प्रधानमंत्री-निर्दिष्ट बने—एक ऐसा क्षण जो केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष, निर्वासन और लोकतांत्रिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले जनउभार के बाद बने शून्य को भरने की जिम्मेदारी अब उनके कंधों पर है—और राष्ट्र की निगाहें उन्हीं पर टिकी हैं।
विरासत, बचपन और राष्ट्रनिर्माण की स्मृतियाँ
तारिक रहमान की राजनीतिक चेतना किसी एक घटना की देन नहीं; यह इतिहास की आग में तपकर बनी है। वे —बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के नायक—और पूर्व प्रधानमंत्री के ज्येष्ठ पुत्र हैं। 1971 के युद्धकालीन अनुभवों और परिवार पर पड़े दमन ने उन्हें कम उम्र में ही सत्ता, स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के अर्थ सिखाए।
ढाका के BAF Shaheen College में अनुशासन और आत्मसंयम ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया। विश्वविद्यालयी वर्षों में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पढ़ाई शुरू की, पर राजनीति की पुकार अधिक प्रबल निकली—और वहीं से एक लंबी यात्रा का आरंभ हुआ।
संगठनकर्ता से रणनीतिकार तक
महज 22 वर्ष की आयु में, 1988 में, उन्होंने जमीनी राजनीति में कदम रखा। 1990 के दशक का एंटी-एर्शाद आंदोलन उनकी राजनीतिक दीक्षा बना—जहाँ वे देशभर में संगठन, संवाद और जनसमर्थन के सूत्र जोड़ते दिखे। 2002 में BNP के सीनियर जॉइंट सेक्रेटरी जनरल के रूप में उन्होंने पार्टी ढांचे को आधुनिक रणनीति और क्षेत्रीय समन्वय से सशक्त किया।
यहीं से विवादों की परछाइयाँ भी गहराईं—भ्रष्टाचार के आरोप, राजनीतिक ध्रुवीकरण और संस्थागत टकराव। किंतु समर्थकों की दृष्टि में वे संकटों में भी संगठन को संभालने वाले रणनीतिकार बने रहे।
कारावास, यातना और निर्वासन
2007–08 की सैन्य-समर्थित अंतरिम सरकार के दौर ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। गिरफ्तारी, कथित यातनाएँ और स्वास्थ्यगत क्षति—इन सबके बीच 2008 में वे इलाज के लिए लंदन पहुँचे। यही यात्रा 17 वर्षों के निर्वासन में बदल गई।
निर्वासन ने उन्हें राजनीति से दूर नहीं किया; बल्कि नई राजनीति गढ़ने का मंच दिया।
लंदन से “वर्चुअल नेतृत्व”
लंदन में रहते हुए उन्होंने डिजिटल माध्यमों से पार्टी को पुनर्जीवित किया—वीडियो कॉल्स, संगठनात्मक निर्देश और चुनावी रणनीतियाँ। 2009 में सीनियर वाइस चेयरमैन और 2018 में एक्टिंग चेयरमैन के रूप में उन्होंने कठिन समय में पार्टी की कमान संभाली।
विरोधियों के लिए वे “डार्क प्रिंस” थे; कार्यकर्ताओं के लिए—अडिग आशा।
स्वदेश वापसी और भावनात्मक क्षण
दिसंबर 2025 में, 17 वर्षों बाद, ढाका वापसी ने जनसैलाब को जन्म दिया। स्वागत ऐतिहासिक था—पर निजी पीड़ा भी साथ थी। खालिदा जिया का निधन हो चुका था। तारिक ने संयमित शब्दों में कहा—घर लौटने की खुशी और माँ की स्मृतियों का बोझ साथ-साथ है।
2026: जनादेश का भूकंप
फरवरी 2026 के चुनावों में उन्होंने ढाका-17 और बोगुरा-6—दोनों सीटों से जीत दर्ज की। BNP गठबंधन ने दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुँचकर इतिहास रचा—2001 के बाद की सबसे बड़ी सफलता।
उनका संदेश स्पष्ट था: “यह बदले का समय नहीं, पुनर्निर्माण का समय है।”
आगे का रास्ता: लोकतंत्र, स्थिरता और युवा शक्ति
तारिक रहमान का एजेंडा तीन स्तंभों पर टिका है—कानून-व्यवस्था सुधार, भ्रष्टाचार के विरुद्ध संस्थागत कार्रवाई और युवाओं के लिए अवसरों का विस्तार। “बांग्लादेश पहले” का उनका आह्वान आंतरिक सुधार के साथ संतुलित विदेश नीति की बात करता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रियाएँ आईं—भारत के प्रधानमंत्री की बधाई ने क्षेत्रीय संवाद की संभावनाओं को रेखांकित किया। आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ अतीत की पीड़ा से सीख लेकर भविष्य की दिशा तय की जा सकती है।
निष्कर्ष: निर्वासन से राष्ट्रनिर्माण तक
तारिक रहमान की कहानी केवल सत्ता-प्राप्ति की नहीं—यह लोकतंत्र की पुनर्स्थापना, धैर्य की विजय और समय की कसौटी पर खरे उतरने की दास्तान है। निर्वासन की आग में तपकर निकली यह ज्योति अब पूरे देश को रोशन करने का दावा करती है।
बांग्लादेश का नया अध्याय शुरू हो चुका है—और इतिहास, एक बार फिर, अपने पन्ने पलट रहा है।
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