ओमान में ईरान–अमेरिका परमाणु वार्ता: कूटनीति की सतर्क शुरुआत
मध्य पूर्व की भू-राजनीति में स्थिरता एक दुर्लभ अतिथि रही है, किंतु ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे जब सामने आते हैं, तो क्षेत्रीय अस्थिरता वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन जाती है। 6 फरवरी 2026 को ओमान की राजधानी मस्कट में ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच अप्रत्यक्ष उच्च-स्तरीय वार्ता का आयोजन इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यह वार्ता महज द्विपक्षीय संवाद नहीं थी, अपितु यह परीक्षा थी कि क्या गहन अविश्वास और हाल के सैन्य टकरावों के बावजूद कूटनीति अभी भी प्रभावी विकल्प बनी हुई है।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने वार्ता को “एक अच्छी शुरुआत” और “सकारात्मक” करार दिया, जबकि दोनों पक्षों ने आगे बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई। यह पहली ऐसी गंभीर कूटनीतिक पहल थी, जो 2025 में इजरायल-ईरान के बीच हुए 12-दिवसीय संघर्ष और अमेरिकी हमलों के बाद हुई। उस संघर्ष ने परमाणु स्थलों पर हमलों को जन्म दिया और क्षेत्र को युद्ध की कगार पर ला खड़ा किया था। ऐसे में मस्कट वार्ता ने संवाद की प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने का संकेत दिया, यद्यपि ठोस परिणाम अभी दूर हैं।
JCPOA का पतन और वर्तमान गतिरोध
2015 का संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) परमाणु कूटनीति की एक दुर्लभ सफलता थी। इसने ईरान के यूरेनियम संवर्धन को 3.67% तक सीमित किया, स्टॉकपाइल पर कैप लगाई और बदले में प्रतिबंधों में राहत दी। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी के साथ यह व्यवस्था क्षेत्रीय स्थिरता का आधार बनी।
किंतु 2018 में अमेरिका की एकतरफा वापसी और “अधिकतम दबाव” नीति ने इस ढांचे को ध्वस्त कर दिया। ईरान ने क्रमशः JCPOA की सीमाओं का उल्लंघन शुरू किया—संवर्धन स्तर 60% तक पहुंच गया, स्टॉकपाइल बढ़ी और उन्नत सेंट्रीफ्यूज तैनात हुए। IAEA के अनुसार, 2025-26 तक ईरान के पास 60% संवर्धित यूरेनियम की मात्रा इतनी हो गई कि आगे 90% (हथियार-ग्रेड) तक पहुंचने में कुछ ही दिन लग सकते हैं। ब्रेकआउट समय अब सप्ताहों या दिनों में सिमट गया है।
2025 के इजरायल-ईरान युद्ध और अमेरिकी हमलों ने स्थिति को और जटिल बनाया। ईरान ने अपने परमाणु स्थलों पर हुए हमलों का जवाब बैलिस्टिक मिसाइलों से दिया, जबकि अमेरिका ने क्षेत्र में नौसैनिक तैनाती बढ़ाई। इस पृष्ठभूमि में मस्कट वार्ता टूटे विश्वास को जोड़ने का प्रयास थी, हालांकि दोनों पक्षों के बीच गहरी खाई बनी हुई है।
ओमान की मध्यस्थता: तटस्थता की ताकत
ओमान ने लंबे समय से ईरान-अमेरिका बैक-चैनल वार्ताओं का विश्वसनीय मंच प्रदान किया है। इसकी तटस्थ छवि, खाड़ी देशों में संतुलित संबंध और शटल डिप्लोमेसी की क्षमता इसे आदर्श बनाती है। मस्कट में दोनों प्रतिनिधिमंडल अलग-अलग स्थानों पर रहे; ओमानी मध्यस्थों ने संदेशों का आदान-प्रदान किया। अमेरिकी पक्ष की ओर से मिडिल ईस्ट विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और CENTCOM प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर शामिल थे, जबकि ईरान की ओर से विदेश मंत्री अरागची ने नेतृत्व किया।
यह अप्रत्यक्ष प्रारूप दर्शाता है कि प्रत्यक्ष मुलाकात अभी राजनीतिक रूप से संभव नहीं। फिर भी, ओमान की भूमिका इस बात का प्रमाण है कि सैन्य विकल्प की सीमाएं स्पष्ट हो चुकी हैं और संवाद अपरिहार्य है।
एजेंडे पर गतिरोध: परमाणु बनाम व्यापक सुरक्षा
वार्ता की सबसे बड़ी बाधा एजेंडे को लेकर थी। ईरान ने स्पष्ट किया कि चर्चा केवल परमाणु कार्यक्रम तक सीमित रहेगी। उसका तर्क है कि बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय रक्षा क्षमताएं संप्रभुता से जुड़ी हैं, जिन पर कोई समझौता नहीं होगा। वार्ता से ठीक पहले IRGC द्वारा खोर्रमशहर-4 बैलिस्टिक मिसाइल की नई अंडरग्राउंड “मिसाइल सिटी” में तैनाती इसी संदेश का हिस्सा थी। 2000 किमी रेंज और 1500 किग्रा वारहेड क्षमता वाली यह मिसाइल अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकती है, जो ईरान की प्रतिरोधक क्षमता का प्रदर्शन था।
अमेरिका का रुख व्यापक रहा—परमाणु मुद्दे के साथ बैलिस्टिक मिसाइल, प्रॉक्सी समूहों (जैसे हिजबुल्लाह, हूती) को समर्थन और क्षेत्रीय स्थिरता को शामिल करने की मांग। वाशिंगटन का मानना है कि केवल परमाणु पर समझौता अपर्याप्त होगा, क्योंकि ईरान का मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव वैश्विक सुरक्षा को चुनौती देते हैं।
यह टकराव दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों का प्रतिबिंब है—ईरान इसे संप्रभुता और आत्मरक्षा का प्रश्न मानता है, जबकि अमेरिका इसे बहुपक्षीय सुरक्षा का।
परमाणु लचीलापन और रणनीतिक गणना
ईरान ने परमाणु मुद्दे पर कुछ लचीलापन दिखाया। उच्च संवर्धित यूरेनियम का हिस्सा सौंपने या क्षेत्रीय कंसोर्टियम के तहत संवर्धन पर विचार के संकेत मिले हैं। प्रतिबंधों से राहत उसकी प्राथमिकता है, क्योंकि आर्थिक संकट गहरा रहा है।
किंतु अमेरिका के लिए ईरानी धरती पर किसी भी स्तर का संवर्धन “रेड लाइन” है। नीति-निर्माताओं का तर्क है कि यह भविष्य में हथियार निर्माण का द्वार खोलेगा। समस्या तकनीकी से अधिक राजनीतिक है—ईरान तत्काल राहत चाहता है, जबकि अमेरिका दीर्घकालिक गारंटी।
दबाव और सैन्य संकेतों का खेल
वार्ता के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति की “बुरे परिणामों” की चेतावनी और फारस की खाड़ी में नौसैनिक गतिविधियां दबाव-कूटनीति का हिस्सा थीं। ईरान दबाव में झुकने के बजाय प्रतिरोध को प्राथमिकता देता रहा है। ऐसे संकेत वार्ता को मजबूत करने के बजाय कमजोर कर सकते हैं, क्योंकि कूटनीति विश्वास और सम्मान पर टिकी होती है, न कि केवल शक्ति प्रदर्शन पर।
परिणाम और आगे की राह
मस्कट वार्ता बिना किसी ठोस समझौते के समाप्त हुई, किंतु संवाद जारी रखने की सहमति प्रक्रिया की जीत है। यह स्वीकार्यता महत्वपूर्ण है कि सैन्य टकराव कोई समाधान नहीं है, कूटनीति ही रास्ता है।
फिर भी, अविश्वास गहरा है। IAEA की रिपोर्टों के अनुसार, ईरान का परमाणु कार्यक्रम उन्नत स्तर पर है और सत्यापन चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। क्षेत्र में सैन्य जमावड़ा और तीखी बयानबाजी किसी भी समय स्थिति बिगाड़ सकती है।
व्यापक प्रभाव और भारत का दृष्टिकोण
इस वार्ता का प्रभाव मध्य पूर्व से परे है। सफल समझौता तेल बाजार को स्थिर कर सकता है और क्षेत्रीय तनाव कम कर सकता है। विफलता बड़े संघर्ष की ओर ले जा सकती है। भारत जैसे देशों के लिए, जिनके ऊर्जा आयात और लाखों प्रवासी इस क्षेत्र से जुड़े हैं, स्थिरता अनिवार्य है। भारत ने हमेशा कूटनीतिक समाधान का समर्थन किया है और JCPOA जैसे ढांचे को पुनर्जीवित करने की वकालत की है।
निष्कर्ष
मस्कट वार्ता ईरान-अमेरिका संबंधों की जटिलता को रेखांकित करती है। मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और प्रतिबंध जैसे मुद्दे किसी भी समझौते को कठिन बनाते हैं। फिर भी, संवाद की निरंतरता आशा की किरण है। यदि दोनों पक्ष यथार्थवादी लचीलापन और धैर्य दिखाएं, तो संशोधित JCPOA-सदृश व्यवस्था संभव है। अन्यथा, टकराव की राजनीति क्षेत्र को—और वैश्विक व्यवस्था को—गंभीर संकट में डाल सकती है।
ओमान जैसे मध्यस्थ और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका अब निर्णायक है। कूटनीति कठिन और धीमी है, किंतु युद्ध की तुलना में यही एकमात्र विवेकपूर्ण मार्ग है। इस निर्णायक क्षण में, संयम और दूरदर्शिता ही स्थायी शांति की कुंजी हैं।
With Reuters Inputs
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