अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
संयुक्त राष्ट्र में सुधार की आवश्यकता: 1945 से 2025 की ओर (An Academic Analysis of the Need for UN Reforms in the 21st Century) परिचय संयुक्त राष्ट्र (United Nations – UN) की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को द्वितीय विश्व युद्ध की भयावहता के बाद एक ऐसे वैश्विक मंच के रूप में की गई थी, जो अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, विकास और मानवाधिकारों के संरक्षण को सुनिश्चित करे। उस समय यह संस्था एक नई आशा का प्रतीक थी—एक ऐसे विश्व की, जो संवाद और सहयोग से विवादों का समाधान खोजेगा। किन्तु 80 वर्षों के उपरांत, 2025 के वैश्विक परिदृश्य में यह प्रश्न बार-बार उठ रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्र अब भी अपनी मूल भावना और उद्देश्य के अनुरूप कार्य कर पा रहा है? क्या इसकी संरचना, निर्णय-प्रक्रिया और शक्ति-संतुलन 21वीं सदी की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करते हैं? भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने 16 अक्टूबर 2025 को इस प्रश्न को मुखर करते हुए कहा कि “संयुक्त राष्ट्र की संरचना 1945 की है, जबकि विश्व अब 2025 की जटिलताओं में जी रहा है।” उनका यह कथन केवल भारत का दृष्टिकोण नहीं, बल्कि उस सामूहिक वैश्विक असंतोष...