Skip to main content

MENU👈

Show more

Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

  राजनीति शास्त्र (Polity & Political Science) की तैयारी को बनाएं आसान और सटीक! क्या आप UPSC, State PCS, UGC NET, PGT या अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं? सही मार्गदर्शन और बेहतरीन स्टडी मटेरियल के लिए विजिट करें: 🌐 www.politypoint.com Polity Point ही क्यों चुनें? विस्तृत एवं सरल नोट्स: भारतीय संविधान, राजव्यवस्था और राजनीतिक सिद्धांत की आसान भाषा में समझ। परीक्षा-उन्मुख सामग्री: पिछले वर्षों के प्रश्नों (PYQs) का विश्लेषण और ट्रेंड के अनुसार स्टडी मटेरियल। क्विज़ और टेस्ट सीरीज़: अपनी तैयारी का सही आकलन करने के लिए नियमित अभ्यास प्रश्न। करंट अफेयर्स से जुड़ाव: राजव्यवस्था से जुड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों का सटीक कवरेज। 🎯 आज ही अपनी सफलता की नींव रखें! अभ्यास शुरू करने और अपनी तैयारी को अगली स्तर पर ले जाने के लिए अभी वेबसाइट पर जाएँ: 👉 www.politypoint.com (स्मार्ट स्टडी करें, सफलता हासिल करें!)

US–Israel–Iran War 2026: Global Impact and India’s Strategic Response

मध्य पूर्व में वर्तमान संघर्ष: यूएस–इज़राइल–ईरान युद्ध और भारत की रणनीतिक चुनौती

प्रस्तावना: एक क्षेत्रीय युद्ध से वैश्विक अस्थिरता तक

फरवरी–मार्च 2026 में मध्य पूर्व एक ऐसे सैन्य संघर्ष का केंद्र बन गया है जिसने क्षेत्रीय समीकरणों को हिला दिया है। 28 फरवरी 2026 को United States और Israel द्वारा Iran के सैन्य, मिसाइल और परमाणु-संबंधित ठिकानों पर संयुक्त हमलों ने एक पूर्ण युद्ध की स्थिति उत्पन्न कर दी। 1 मार्च 2026 को ईरानी राज्य मीडिया द्वारा सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की मृत्यु की पुष्टि ने इस संघर्ष को केवल सैन्य टकराव से आगे बढ़ाकर शासन-परिवर्तन की दिशा में मोड़ दिया है।

यह युद्ध अब सीमित हवाई हमलों से आगे बढ़कर प्रॉक्सी समूहों, समुद्री मार्गों और खाड़ी देशों की सुरक्षा तक फैल चुका है। विशेष रूप से Strait of Hormuz में जहाजरानी बाधित होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा संकट मंडरा रहा है।


संघर्ष की पृष्ठभूमि: परमाणु कार्यक्रम से प्रॉक्सी युद्ध तक

इस युद्ध की जड़ें कई वर्षों से विकसित हो रहे तनाव में निहित हैं:

  1. परमाणु कार्यक्रम का विवाद – ईरान के परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को लेकर पश्चिमी देशों की चिंताएँ लंबे समय से बनी हुई थीं। 2025 के अंत तक वार्ताएँ विफल हो गईं।
  2. क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क – लेबनान में हिज़्बुल्लाह और यमन में हूती जैसे समूहों के माध्यम से ईरान की क्षेत्रीय सक्रियता ने इज़राइल और अमेरिकी हितों को चुनौती दी।
  3. आंतरिक अस्थिरता – 2025-26 के दौरान ईरान में विरोध प्रदर्शनों के दमन ने अंतरराष्ट्रीय आलोचना को बढ़ाया।
  4. अमेरिकी सैन्य पुनर्तैनाती – जनवरी 2026 से खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य जमावड़ा बढ़ा, जिसने युद्ध की संभावना को मूर्त रूप दिया।

इन सभी कारकों ने मिलकर 28 फरवरी 2026 को प्रारंभ हुए हमलों की पृष्ठभूमि तैयार की।


युद्ध का विस्तार: समुद्री और प्रॉक्सी मोर्चे

ईरान ने जवाबी कार्रवाई में खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। इज़राइल ने लेबनान में हिज़्बुल्लाह के ठिकानों पर हमले तेज कर दिए। समुद्री मार्गों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों ने ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव होर्मुज जलडमरूमध्य में दिखाई दे रहा है, जहाँ से विश्व के लगभग 20% तेल का परिवहन होता है। यहाँ जहाजरानी में बाधा ने कच्चे तेल की कीमतों को उछाल दिया है।


भारत पर प्रभाव: बहुआयामी चुनौती

1. ऊर्जा सुरक्षा का संकट

भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है। होर्मुज में व्यवधान के कारण:

  • कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि
  • एलएनजी आपूर्ति में अनिश्चितता, विशेषकर कतर से
  • चालू खाता घाटा और मुद्रास्फीति का दबाव

यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो भारत को रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का उपयोग करना पड़ सकता है।


2. प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा

पश्चिम एशिया में लगभग एक करोड़ भारतीय कार्यरत हैं। विशेषकर United Arab Emirates, Qatar और Oman में बड़ी भारतीय आबादी है।

संघर्ष की स्थिति में:

  • निकासी अभियानों की संभावना
  • रेमिटेंस में गिरावट
  • श्रम बाजार में अस्थिरता

भारत सरकार के लिए यह मानवीय और आर्थिक दोनों दृष्टि से संवेदनशील विषय है।


3. आर्थिक और व्यापारिक प्रभाव

  • शिपिंग बीमा और माल ढुलाई लागत में वृद्धि
  • स्टॉक मार्केट में अस्थिरता
  • निर्यात-आयात संतुलन पर दबाव
  • रुपया पर अवमूल्यन का खतरा

खाड़ी क्षेत्र भारत का प्रमुख व्यापार भागीदार है; अतः दीर्घकालिक संघर्ष से आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है।


4. कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा

भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित रही है।

  • अमेरिका और इज़राइल के साथ रणनीतिक संबंध
  • ईरान के साथ ऊर्जा और कनेक्टिविटी सहयोग
  • खाड़ी देशों के साथ आर्थिक साझेदारी

इस त्रिकोणीय संतुलन को बनाए रखना भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। भारत ने संयम और संवाद की अपील की है, जिससे स्पष्ट है कि वह किसी सैन्य ध्रुवीकरण से बचना चाहता है।


संभावित परिदृश्य

  1. सीमित अवधि का युद्ध (2–4 सप्ताह)
    – तेल कीमतों में अस्थायी उछाल
    – कूटनीतिक समाधान की संभावना

  2. दीर्घकालिक संघर्ष (3–6 महीने)
    – वैश्विक ऊर्जा संकट
    – वैश्विक मंदी का खतरा
    – भारत में उच्च मुद्रास्फीति

  3. शासन परिवर्तन और क्षेत्रीय पुनर्संतुलन
    – ईरान में सत्ता संरचना का पुनर्गठन
    – नए क्षेत्रीय गठबंधन


निष्कर्ष: भारत के लिए रणनीतिक सबक

मध्य पूर्व का यह युद्ध केवल क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का प्रश्न नहीं है; यह वैश्विक ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा संरचना को पुनर्परिभाषित कर सकता है।

भारत के लिए तीन प्राथमिकताएँ स्पष्ट हैं:

  1. ऊर्जा आपूर्ति का विविधीकरण
  2. प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा
  3. संतुलित और सक्रिय कूटनीति

यदि भारत इन तीनों मोर्चों पर विवेकपूर्ण रणनीति अपनाता है, तो वह इस संकट को एक अवसर में भी बदल सकता है—जहाँ वह एक जिम्मेदार, संतुलित और उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका सुदृढ़ करे।

वर्तमान परिदृश्य अनिश्चित है, परंतु यह स्पष्ट है कि मध्य पूर्व की आग का प्रभाव केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। भारत को सतर्क, सक्रिय और दूरदर्शी नीति के साथ आगे बढ़ना होगा।

Comments

Advertisement

POPULAR POSTS

AI Weapons and the Moral Red Line: क्या मशीनें इंसानों की मौत का फैसला करेंगी?

मृत्यु का एल्गोरिद्मीकरण: क्या हम जीवन और मृत्यु का फैसला मशीनों को सौंपने के लिए तैयार हैं? कुछ दशक पहले तक एल्गोरिद्म केवल कंप्यूटरों और डेटा सेंटरों तक सीमित थे। आज वही तकनीक युद्ध के मैदान तक पहुँच चुकी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अब सिर्फ हमारी खोजों, खरीदारी या सोशल मीडिया गतिविधियों को प्रभावित नहीं कर रही, बल्कि ऐसे हथियारों का हिस्सा बन रही है जो स्वयं लक्ष्य चुन सकते हैं और उन पर हमला कर सकते हैं। यही वह कारण है जिसके चलते संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस समिति (ICRC) ने दुनिया को एक गंभीर चेतावनी दी है। उनका मानना है कि मानवता एक ऐसी "नैतिक लाल रेखा" के करीब पहुँच रही है, जिसे पार करना केवल तकनीकी प्रगति का मामला नहीं होगा, बल्कि मानव मूल्यों और जिम्मेदारियों की बुनियादी परिभाषा को बदल देगा। आखिर यह "नैतिक लाल रेखा" क्या है? सवाल केवल इतना नहीं है कि मशीनें कितनी स्मार्ट हो रही हैं। असली चिंता यह है कि क्या हम किसी एल्गोरिद्म को यह अधिकार देने के लिए तैयार हैं कि वह तय करे कौन जीवित रहेगा और कौन मारा जाएगा। युद्ध के इतिहास में हथियार ...

45 साल बाद अमेरिका ने सीरिया को आतंकवाद सूची से हटाया: मध्य पूर्व की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव

45 वर्षों बाद: आतंकवाद सूची से सीरिया का हटना क्यों है वैश्विक स्तर पर एक बड़ा बदलाव 26 अगस्त 2026 को मध्य पूर्व की कूटनीतिक संरचना, जिसने लगभग आधी सदी तक क्षेत्रीय राजनीति को परिभाषित किया था, आखिरकार बदल गई। संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा सीरिया को आधिकारिक रूप से राज्य प्रायोजित आतंकवाद (State Sponsors of Terrorism) की सूची से हटाना मात्र एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि एक गहरा भू-राजनीतिक पुनर्संरेखण है। यद्यपि यह परिवर्तन 2024 के अंत में बशर अल-असद की सत्ता से विदाई के बाद आया, लेकिन पुराने शासन के पतन और इस डीलिस्टिंग के बीच का दो वर्षीय अंतराल यह दर्शाता है कि वाशिंगटन ने सावधानीपूर्वक स्थिति का आकलन किया। अमेरिका ने पिछले 24 महीनों में नई सरकार की स्थिरता का परीक्षण किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि 1979 की यथास्थिति से हटकर किया गया यह परिवर्तन अस्थायी अराजकता नहीं, बल्कि स्थायी सामान्यीकरण की दिशा में एक निर्णायक कदम है। 1979 की मुहर का अंत यह डीलिस्टिंग 45 वर्षों से चले आ रहे उस कूटनीतिक गतिरोध का औपचारिक अंत है, जो लंबे समय तक अमेरिका की लेवांत (Levant) नीति का आध...

India’s Freebie Culture: Welfare Safety Net or Fiscal Time Bomb?

रेवड़ी संस्कृति: सामाजिक सुरक्षा या भविष्य पर बढ़ता आर्थिक बोझ? भारत में "रेवड़ी संस्कृति" को लेकर बहस पिछले कुछ वर्षों में काफी तेज हुई है। चुनावी मंचों से लेकर टीवी डिबेट तक, मुफ्त बिजली, पानी, राशन और नकद सहायता जैसी योजनाएं लगातार चर्चा का विषय बनी रहती हैं। एक पक्ष इन्हें गरीबों के लिए जरूरी सहारा मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इन्हें सरकारी खजाने पर बोझ और आर्थिक अनुशासन के लिए खतरा बताता है। सवाल यह है कि क्या ऐसी योजनाएं वास्तव में समाज को मजबूत बनाती हैं, या फिर वे भविष्य की पीढ़ियों पर एक ऐसा आर्थिक बोझ डाल रही हैं जिसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी? इसका उत्तर न तो पूरी तरह "हां" में है और न ही पूरी तरह "नहीं" में। वास्तविकता इन दोनों के बीच कहीं मौजूद है। जब मुफ्त योजनाएं अर्थव्यवस्था को गति देती हैं अक्सर माना जाता है कि कल्याणकारी योजनाएं केवल सरकारी खर्च बढ़ाती हैं, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। जब सरकार गरीब परिवारों को मुफ्त राशन, बिजली या प्रत्यक्ष नकद सहायता देती है, तो उनके पास अपनी आय का कुछ हिस्सा अन्य जरूरतों पर खर्च करने के लिए बच जाता ह...

Supreme Court’s Historic Opinion (2025): Clarifying Governors’ Powers, Legislative Process, and the Protection of India’s Federal Balance

सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक मत : राज्यपालों की शक्तियाँ, संघीय संतुलन और संवैधानिक मर्यादा का न्यायिक पुनर्पुष्टि प्रस्तावना भारत का संविधान केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति-संतुलन का ऐसा तंत्र निर्मित करता है, जहाँ सहयोग, संवाद और संवैधानिक मर्यादा सर्वोपरि हैं। इसी को “सहकारी संघवाद” कहा जाता है। परंतु जब राज्यपाल—जो स्वयं केंद्र के नामित प्रतिनिधि होते हैं—विधायी प्रक्रिया में बिना उचित कारण हस्तक्षेप या लंबी देरी करते हैं, तो यह संतुलन डगमगाने लगता है। हाल के वर्षों में कई राज्यों में यही घर्षण सामने आया, जिससे यह प्रश्न उठा कि राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों की सीमा क्या है, और न्यायपालिका की भूमिका कहाँ तक है? 20 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय की पाँच-सदस्यीय संविधान पीठ ने इन्हीं जटिल प्रश्नों पर राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143(1) के तहत भेजे गए संदर्भ पर अपना मत दिया। यह मत न केवल संवैधानिक व्याख्या का नया मानदंड है, बल्कि संघवाद और न्यायिक संयम के सिद्धांतों को भी सुदृढ़ करता है। विवाद का उद्भव : संघवाद की परीक्षा तमिलनाडु, केरल, पंजाब, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे कई र...

Nepal Floods and the Himalayan Crisis: When Climate Change Meets Unplanned Development

संकट में हिमालय: नेपाल की त्रासदी हमें क्या सिखाती है? हिमालय को अक्सर "तीसरा ध्रुव" कहा जाता है, क्योंकि यहाँ ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर सबसे अधिक हिमनद पाए जाते हैं। यही हिमनद गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी महान नदियों को जीवन देते हैं। लेकिन आज हिमालय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ प्राकृतिक संतुलन और मानवीय हस्तक्षेप के बीच संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है। हाल ही में नेपाल और तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी आपदाएँ अब केवल प्राकृतिक घटनाएँ नहीं रह गई हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और विकास की गलत नीतियों का संयुक्त परिणाम हैं। नेपाल में आई हालिया आपदा की शुरुआत ऊँचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में हुई, जहाँ ग्लेशियरों और उनसे बनी झीलों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान के कारण हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं और नई ग्लेशियल झीलें बन रही हैं। जब अत्यधिक वर्षा, बादल फटना या भू-स्खलन जैसी घटनाएँ इन झीलों को प्रभावित करती हैं, तो ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी विनाशकारी घटना...

चीन का गोल्डन लूप क्या है? 25,000 KM की मेगा परियोजना से भारत क्यों चिंतित है

चीन का "गोल्डन लूप": क्या यह विकास की राह है या रणनीतिक शक्ति का नया प्रतीक? एक समय था जब चीन की महान दीवार उसकी सुरक्षा और अलगाववादी नीति का प्रतीक मानी जाती थी। लेकिन 21वीं सदी में चीन अपनी सीमाओं की सुरक्षा और संपर्क व्यवस्था को लेकर एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण अपना रहा है। इसी दिशा में चीन एक विशाल अवसंरचना परियोजना पर काम कर रहा है, जिसे अनौपचारिक रूप से "गोल्डन लूप" या "बॉर्डर-कोस्ट लूप" कहा जाता है। करीब 25,000 किलोमीटर लंबा यह सड़क नेटवर्क चीन की भूमि सीमाओं और तटीय क्षेत्रों को जोड़ने का प्रयास है। यह परियोजना न केवल चीन के दूरस्थ इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ने का लक्ष्य रखती है, बल्कि इसके रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी प्रभावों पर भी व्यापक चर्चा हो रही है। क्या है गोल्डन लूप? गोल्डन लूप दरअसल चीन के विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों को जोड़कर तैयार किया जा रहा एक व्यापक परिवहन नेटवर्क है। यह चीन की लगभग पूरी सीमा और समुद्री तट को कवर करता है तथा 14 पड़ोसी देशों से लगने वाले क्षेत्रों को जोड़ता है। चीन सरकार का कहना है कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य सी...

Manipur GST Second Amendment Bill 2025: Impact on India’s Federal Fiscal Coordination

मणिपुर जीएसटी द्वितीय संशोधन विधेयक 2025: भारत के संघीय राजकोषीय समन्वय पर प्रभाव सार भारत में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था, 2017 में लागू होने के बाद से, एक विभाजित अप्रत्यक्ष कर प्रणाली से एकीकृत, पारदर्शी और सहकारी संघवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम रही है। हाल में 1 दिसंबर 2025 को लोकसभा द्वारा पारित मणिपुर वस्तु एवं सेवा कर (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2025 यह दर्शाता है कि राज्य-स्तरीय कानूनों को केंद्र के साथ कितनी निरंतरता से समन्वित रखना आवश्यक है। यह विधेयक 7 अक्टूबर 2025 को लागू अध्यादेश का स्थान लेता है, जो 56वीं जीएसटी परिषद द्वारा तय दर-तर्कसंगतिकरण (rate rationalization) को लागू करने हेतु जारी किया गया था। मणिपुर में राष्ट्रपति शासन, शीतकालीन सत्र की जटिल संसदीय पृष्ठभूमि और परोक्ष कर सुधारों के व्यापक संदर्भ—सभी मिलकर इस विधायी कार्रवाई को संघवाद, कार्यपालिका-विधायिका संतुलन तथा राजकोषीय संघवाद की दृष्टि से विश्लेषण योग्य बनाते हैं। यह लेख विधेयक की प्रमुख विशेषताओं, इसके विधायी मार्ग, तथा भारत के कर-परिदृश्य पर इसके प्रभावों का अध्ययन करता है। 1. प्रस्तावना भार...

Taliban Foreign Minister’s Visit to India: Strategic Significance and Implications for South Asia

तालिबान विदेश मंत्री की भारत यात्रा: एक ऐतिहासिक कदम और इसके निहितार्थ 10 अक्टूबर 2025 को, तालिबान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी ने भारत की अपनी पहली आधिकारिक यात्रा शुरू की, जो 2021 में तालिबान के काबुल पर कब्जे के बाद से किसी वरिष्ठ तालिबानी नेता की भारत की पहली यात्रा है। यह यात्रा न केवल भारत-अफगानिस्तान संबंधों के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह दक्षिण एशियाई क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों और तालिबान शासन की वैश्विक स्वीकार्यता की तलाश को भी रेखांकित करती है। इस लेख में हम इस यात्रा के महत्व, इसके संभावित परिणामों और भारत की विदेश नीति के संदर्भ में इसके निहितार्थों का विश्लेषण करेंगे। यात्रा का पृष्ठभूमि संदर्भ अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद से भारत ने वहां की स्थिति पर सतर्क और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। 2021 में तालिबान के काबुल पर नियंत्रण के बाद भारत ने अपने दूतावास को अस्थायी रूप से बंद कर दिया था, लेकिन मानवीय सहायता और अफगान जनता के साथ ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखने के लिए तकनीकी मिशन के माध्यम से संपर्क बनाए रखा। भारत ने अफगानिस्तान...

BRICS Summit 2026: Bridge Builder or Global Power Bloc? 5 Key Takeaways from New Delhi

ब्रिज बिल्डर या नया पावर ब्लॉक? नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की 5 बड़ी बातें 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। भारत, चीन, रूस सहित कई प्रमुख देशों के नेता इस महत्वपूर्ण बैठक में शामिल होंगे। ऐसे समय में जब BRICS तेजी से बदल रहा है और विस्तार कर रहा है, इसकी बढ़ती भूमिका वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बनी हुई है। 1. "ब्रिज बिल्डर" के रूप में भारत की उभरती भूमिका भारत BRICS के सदस्य देशों के अलग-अलग हितों और दृष्टिकोणों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। सहमति निर्माण की इस प्रक्रिया में भारत खुद को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सेतु के रूप में स्थापित कर रहा है। "भारत विभिन्न हितों वाले देशों के बीच एक 'ब्रिज बिल्डर' की भूमिका निभाने का प्रयास कर रहा है।" 2. संयुक्त घोषणा-पत्र पर सहमति की बड़ी चुनौती इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी परीक्षा एक साझा संयुक्त घोषणा-पत्र (Joint Declaration) पर सहमति बनाना है। इसके लिए राजनयिक लगातार वार्ता कर रहे हैं। मुख्य मुद्दे हैं: पश्चिम एशिया...

DRDO and Indian Army Successfully Conduct Four MRSAM Missile Tests in Odisha

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर एक और कदम: DRDO व भारतीय सेना द्वारा MRSAM परीक्षण की सफलता हाल ही में DRDO (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) और भारतीय सेना ने ओडिशा के समुद्र तटीय क्षेत्र से मीडियम रेंज सरफेस टू एयर मिसाइल (MRSAM) के चार उड़ान परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे किए। यह न केवल देश की सैन्य क्षमताओं को मजबूती प्रदान करता है, बल्कि 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में एक ठोस प्रगति भी है। MRSAM प्रणाली की विशेषताएँ: MRSAM, जिसे बाराक-8 के नाम से भी जाना जाता है, भारत-इज़राइल संयुक्त परियोजना का हिस्सा है। यह मिसाइल प्रणाली दुश्मन के विमानों, ड्रोन, हेलीकॉप्टरों और क्रूज़ मिसाइलों को 70-100 किमी तक की दूरी पर नष्ट करने में सक्षम है। एक साथ कई लक्ष्यों को भेदने की क्षमता। 360 डिग्री कवरेज व हाई रेस्पॉन्स टाइम। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के अनुकूल डिजाइन। रणनीतिक महत्व: यह परीक्षण भारतीय सेना की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता को बढ़ाता है। सीमावर्ती क्षेत्रों में वायु सुरक्षा की मजबूत व्यवस्था सुनिश्चित करता है। भविष्य में स्वदेशी हथियार प्रणालियों ...