धार भोजशाला विवाद: हाईकोर्ट के फैसले, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और सामाजिक प्रभावों का गहन विश्लेषण धार की ऐतिहासिक भोजशाला पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का निर्णय केवल एक धार्मिक स्थल से जुड़ा कानूनी फैसला नहीं है, बल्कि यह भारत की ऐतिहासिक चेतना, न्यायिक व्यवस्था और सामाजिक संतुलन की गंभीर परीक्षा भी है। सदियों से विवादों, दावों और भावनात्मक बहसों के केंद्र में रही भोजशाला अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां न्यायपालिका ने वैज्ञानिक साक्ष्यों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर अपना स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। इस फैसले ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम समाधान का मार्ग अदालतों और संविधान से होकर ही गुजरता है। भोजशाला का इतिहास केवल एक इमारत का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जिसमें ज्ञान, शिक्षा और आस्था का गहरा समन्वय दिखाई देता है। माना जाता है कि परमार वंश के महान राजा भोज के काल में यह स्थान विद्या और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र था। समय के साथ राजनीतिक और ऐतिहासिक परिवर्तनों ने इसकी पहचान को विवादों में बदल...
ट्रंप युग में बहुपक्षीयता का संकट: अमेरिकी विदेश नीति में नियमों से ‘लिवरेज’ की ओर बदलाव प्रस्तावना बहुपक्षीयता आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आत्मा रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब दुनिया तबाही और अविश्वास से जूझ रही थी, तब संयुक्त राष्ट्र, ब्रेटन वुड्स संस्थाएं और अनेक अंतरराष्ट्रीय मंच इसलिए बनाए गए कि शक्ति को सहमति में बदला जा सके और टकराव को संस्थागत नियमों के भीतर सीमित रखा जा सके। अमेरिका इस व्यवस्था का मुख्य शिल्पकार था—उसने नियम बनाए, संस्थाएं खड़ी कीं और दूसरों को उसमें शामिल होने के लिए प्रेरित किया। लेकिन इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक से यह तस्वीर तेजी से बदली है। डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में जो रुझान दिखा था—संस्थाओं से दूरी, समझौतों से पीछे हटना और “अमेरिका फर्स्ट” की राजनीति—वह उनके दूसरे कार्यकाल में एक स्पष्ट सिद्धांत का रूप ले चुका है। 7 जनवरी 2026 को अमेरिका द्वारा 66 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बाहर निकलने की घोषणा केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि उस सोच का औपचारिक ऐलान है जिसमें नियमों के बजाय “लिवरेज” यानी दबाव और सौदेबाजी को प्राथमिकता दी जा रही है...