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India Joins Trump’s Gaza Peace Board as Observer: Strategic Balance in Middle East Diplomacy 2026

भारत की गाजा शांति योजना में भागीदारी: ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पर्यवेक्षक के रूप में भारत की कूटनीतिक उपस्थिति परिचय वर्ष 2026 में गाजा पट्टी का प्रश्न केवल इजराइल–फिलिस्तीन संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन, मानवीय हस्तक्षेप और बहुपक्षीय कूटनीति की परीक्षा बन गया है। ऐसे समय में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प  द्वारा प्रारंभ किया गया ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) एक नई पहल के रूप में सामने आया है, जिसका घोषित उद्देश्य गाजा में युद्धविराम की निगरानी, पुनर्निर्माण, हमास के निरस्त्रीकरण तथा एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण व्यवस्था की स्थापना है। फरवरी 2026 में वाशिंगटन डीसी में आयोजित इस बोर्ड की पहली बैठक में भारत ने पूर्ण सदस्य के बजाय पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में भाग लिया। यह निर्णय साधारण कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की संतुलित और बहुस्तरीय विदेश नीति का प्रतीक है। ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पृष्ठभूमि: संयुक्त राष्ट्र से परे एक वैकल्पिक मंच? ट्रंप प्रशासन ने जनवरी 2026 में विश्व आर्थिक मंच (दावोस) के दौरान इस पहल की घोषणा की थी। इसे एक ऐसे मंच के रूप में...

US Retreat from Multilateralism: Trump’s Withdrawal from 66 International Institutions and Its Global Impact

अमेरिका का बहुपक्षीयता से पीछे हटना: एक गंभीर वैश्विक चुनौती

7 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित राष्ट्रपति मेमोरेंडम ने अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों, संधियों और निकायों से तत्काल वापसी का निर्देश दिया। यह कदम कार्यकारी आदेश 14199 के तहत राज्य विभाग की समीक्षा पर आधारित है, जिसमें 31 संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध इकाइयाँ और 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र संगठन शामिल हैं। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसे “अमेरिकी संप्रभुता, सुरक्षा और समृद्धि के विरुद्ध कार्य करने वाली संस्थाओं से मुक्ति” करार दिया है।

यह निर्णय बहुपक्षीयवाद के प्रति अमेरिका की ऐतिहासिक प्रतिबद्धता से एक स्पष्ट विचलन है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र, ब्रेटन वुड्स संस्थाएँ, जलवायु समझौते और मानवाधिकार तंत्र जैसे मंचों का निर्माण अमेरिका ने ही किया था। अब वह इन्हीं को “फिजूलखर्ची, वैचारिक रूप से पक्षपाती और अमेरिकी हितों के विरुद्ध” घोषित कर रहा है।

प्रमुख वापसियाँ और उनके निहितार्थ

सबसे गंभीर कदम संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क संधि (UNFCCC) से निकलना है, जो पेरिस समझौते और क्योटो प्रोटोकॉल की मूल संधि है। इसके साथ ही अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC), अंतरराष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी (IRENA), अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) जैसी संस्थाओं से भी अमेरिका बाहर हो रहा है।

इन निकासी से वैश्विक जलवायु शासन में एक बड़ा रणनीतिक शून्य पैदा होगा। विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त और तकनीकी हस्तांतरण पहले से ही अपर्याप्त हैं; अमेरिका की अनुपस्थिति उन्हें और कमजोर करेगी। विशेषज्ञ इसे “शर्मनाक” और “खुद को नुकसान पहुँचाने वाला” कदम मान रहे हैं, क्योंकि जलवायु संकट अब मानव सभ्यता के सबसे गंभीर खतरे के रूप में स्थापित हो चुका है।

इसी प्रकार, UNFPA (संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष) और UN Women से निकासी लैंगिक समानता, प्रजनन स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी योगदान को समाप्त कर देगी। प्रशासन का तर्क है कि ये संस्थाएँ “प्रगतिशील वैचारिक एजेंडे” को बढ़ावा देती हैं, लेकिन इससे वैश्विक मानव विकास लक्ष्यों (SDGs) पर गहरा आघात होगा।

प्रशासन का तर्क और उसकी सीमाएँ

ट्रंप प्रशासन का दावा है कि ये संस्थाएँ अमेरिकी करदाताओं के अरबों डॉलर बर्बाद करती हैं, बिना कोई ठोस लाभ दिए। यह “America First” नीति का विस्तार है, जो राष्ट्रीय संप्रभुता को सर्वोपरि मानती है। लेकिन यह दृष्टिकोण 21वीं सदी की वैश्विक चुनौतियों—जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर सुरक्षा और आर्थिक असमानता—को एकतरफा हल करने की क्षमता नहीं रखता।

इन समस्याओं का समाधान सहयोग के बिना संभव नहीं। अमेरिका की अनुपस्थिति से चीन और अन्य शक्तियाँ इन मंचों पर अपना प्रभाव बढ़ा सकती हैं, जिससे नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का और क्षरण होगा।

 भारत के लिए निहितार्थ

भारत के लिए यह स्थिति दोहरी है। एक ओर, ISA जैसे मंचों पर अमेरिकी अनुपस्थिति भारत को सौर ऊर्जा और नवीकरणीय क्षेत्र में नेतृत्व का अवसर दे सकती है। जलवायु वार्ताओं में ग्लोबल साउथ की आवाज़ को और मजबूती मिल सकती है।

दूसरी ओर, जलवायु वित्त में कमी, तकनीकी हस्तांतरण में बाधा और वैश्विक नियम-निर्माण में चीन का बढ़ता दबदबा भारत के लिए चुनौती बनेगा। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अब और अधिक प्रासंगिक हो गई है—वह न तो अमेरिका के साथ पूर्ण संरेखण कर सकता है, न ही चीन के साथ।

अंतिम विचार

यह 66 संस्थाओं से वापसी केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अंत की ओर एक निर्णायक संकेत है। शीत युद्ध के बाद का विश्व, जिसमें सहयोग और नियम आधारित थे, अब तेजी से विखंडित हो रहा है।

 “वैश्विक समस्याएँ राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं मानतीं; उनका समाधान भी राष्ट्रीय दृष्टिकोण से नहीं हो सकता।”

अमेरिका की यह नीति अंततः खुद को अलग-थलग कर सकती है, जबकि दुनिया को नए संतुलन की तलाश में छोड़ सकती है। प्रश्न यह है कि क्या बहुपक्षीयता का क्षरण स्थायी होगा, या नई पीढ़ी के नेतृत्व में उसका पुनरुद्धार संभव है? समय ही इसका उत्तर देगा, लेकिन फिलहाल, यह वैश्विक सहयोग के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

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