भारत की गाजा शांति योजना में भागीदारी: ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पर्यवेक्षक के रूप में भारत की कूटनीतिक उपस्थिति परिचय वर्ष 2026 में गाजा पट्टी का प्रश्न केवल इजराइल–फिलिस्तीन संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन, मानवीय हस्तक्षेप और बहुपक्षीय कूटनीति की परीक्षा बन गया है। ऐसे समय में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा प्रारंभ किया गया ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) एक नई पहल के रूप में सामने आया है, जिसका घोषित उद्देश्य गाजा में युद्धविराम की निगरानी, पुनर्निर्माण, हमास के निरस्त्रीकरण तथा एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण व्यवस्था की स्थापना है। फरवरी 2026 में वाशिंगटन डीसी में आयोजित इस बोर्ड की पहली बैठक में भारत ने पूर्ण सदस्य के बजाय पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में भाग लिया। यह निर्णय साधारण कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की संतुलित और बहुस्तरीय विदेश नीति का प्रतीक है। ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पृष्ठभूमि: संयुक्त राष्ट्र से परे एक वैकल्पिक मंच? ट्रंप प्रशासन ने जनवरी 2026 में विश्व आर्थिक मंच (दावोस) के दौरान इस पहल की घोषणा की थी। इसे एक ऐसे मंच के रूप में...
भारत की रूसी तेल आयात में कमी: पोलैंड की टिप्पणी और भारत की विदेश नीति के निहितार्थ सारांश यह लेख 7 जनवरी 2026 को पेरिस में आयोजित भारत–वाइमर त्रिकोण (फ्रांस, जर्मनी और पोलैंड) बैठक के दौरान पोलैंड के विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोर्स्की द्वारा भारत की रूसी तेल आयात में आई कमी पर व्यक्त संतोष का अकादमिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह टिप्पणी केवल एक कूटनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति, रणनीतिक स्वायत्तता और पश्चिमी भू-राजनीतिक दबावों के बीच बदलते संतुलन का संकेतक है। लेख यह विवेचना करता है कि किस प्रकार रूस–यूक्रेन संघर्ष के पश्चात वैश्विक ऊर्जा राजनीति भारत की विदेश नीति को प्रभावित कर रही है तथा भविष्य में भारत के समक्ष कौन-सी रणनीतिक चुनौतियाँ और अवसर उभरते हैं। परिचय वैश्विक भू-राजनीति और ऊर्जा बाजारों के बीच भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से संतुलन और बहुपक्षीयता पर आधारित रही है। रूस–यूक्रेन संघर्ष (2022) के बाद भारत ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए रूसी कच्चे तेल के आयात में उल्लेखनीय वृद्धि की, जिससे उसकी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हुई और घरेलू अर्थव्यवस्था को स्थिरता म...