अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
तंज़ानिया में चुनावी हिंसा का बढ़ता संकट: लोकतंत्र की डगमगाती बुनियाद परिचय अफ्रीका के पूर्वी तट पर बसा तंज़ानिया, जो कभी स्थिरता और शांतिपूर्ण राजनीतिक संक्रमण का उदाहरण माना जाता था, अब चुनावी हिंसा के तूफ़ान में घिर चुका है। 29 अक्टूबर 2025 को हुए आम चुनाव — जिन्हें देश की लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रतीक कहा जा रहा था — महज़ कुछ घंटों में रक्तरंजित विरोध प्रदर्शनों, सैकड़ों मौतों और सरकारी दमन की छवियों में बदल गए। विपक्ष के अनुसार अब तक 700 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं , जबकि सरकार ने इस पर मौन साध रखा है। दार एस सलाम, अरुशा, डोडोमा और म्वांज़ा जैसे शहरों की सड़कों पर फैले आक्रोश ने यह सवाल फिर से जीवित कर दिया है — क्या अफ्रीका के इस प्रमुख राष्ट्र का लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक भ्रम है? ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: स्थिरता का भ्रम 1961 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र होने के बाद तंज़ानिया ने अफ्रीकी महाद्वीप को स्थिर शासन का एक दुर्लभ उदाहरण दिया था। चामा चा मापिंदुज़ी (CCM) — जो स्वाहिली में “क्रांति की पार्टी” कहलाती है — ने छह दशकों से सत्ता पर क़ब्ज़ा बनाए रखा है। 1992 म...