अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
दक्षिण कोरिया की परमाणु-संचालित पनडुब्बी महत्वाकांक्षा: एशिया में बदलता सामरिक समीकरण और एक उभरती जलमग्न हथियार दौड़ प्रस्तावना इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र आज वैश्विक सामरिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बन चुका है। दक्षिण चीन सागर से लेकर जापान के समुद्री सीमांत तक शक्ति-संतुलन लगातार बदल रहा है। इसी पृष्ठभूमि में दक्षिण कोरिया का परमाणु-संचालित पनडुब्बियों (SSN) के अधिग्रहण की दिशा में निर्णायक कदम उठाना एशिया की सुरक्षा संरचना में एक गहरा मोड़ दर्शाता है। दिसंबर 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दी गई स्पष्ट सहमति केवल तकनीकी सहयोग की अनुमति नहीं है—यह एक भू-राजनीतिक संदेश है कि अमेरिका अब अपने सहयोगियों को अधिक आक्रामक और स्वतंत्र रक्षा क्षमता विकसित करने देना चाहता है। यह निर्णय उन सभी नीतिगत बाधाओं को समाप्त करता है जो 1970 के दशक से वाशिंगटन की “नॉन-प्रोलिफ़रेशन फर्स्ट” नीति के कारण सियोल को रोकती आई थीं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: अधूरी महत्वाकांक्षाओं से पुनर्जीवित आकांक्षाओं तक दक्षिण कोरिया की परमाणु-संचालित पनडुब्बी की आकांक्षा नई नहीं है। 1974 में तत्कालीन राष्...