भारत की गाजा शांति योजना में भागीदारी: ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पर्यवेक्षक के रूप में भारत की कूटनीतिक उपस्थिति परिचय वर्ष 2026 में गाजा पट्टी का प्रश्न केवल इजराइल–फिलिस्तीन संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन, मानवीय हस्तक्षेप और बहुपक्षीय कूटनीति की परीक्षा बन गया है। ऐसे समय में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा प्रारंभ किया गया ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) एक नई पहल के रूप में सामने आया है, जिसका घोषित उद्देश्य गाजा में युद्धविराम की निगरानी, पुनर्निर्माण, हमास के निरस्त्रीकरण तथा एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण व्यवस्था की स्थापना है। फरवरी 2026 में वाशिंगटन डीसी में आयोजित इस बोर्ड की पहली बैठक में भारत ने पूर्ण सदस्य के बजाय पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में भाग लिया। यह निर्णय साधारण कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की संतुलित और बहुस्तरीय विदेश नीति का प्रतीक है। ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पृष्ठभूमि: संयुक्त राष्ट्र से परे एक वैकल्पिक मंच? ट्रंप प्रशासन ने जनवरी 2026 में विश्व आर्थिक मंच (दावोस) के दौरान इस पहल की घोषणा की थी। इसे एक ऐसे मंच के रूप में...
व्यापारिक हित बनाम भू-राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते के संदर्भ में अमेरिकी आलोचना का विश्लेषण भूमिका इक्कीसवीं सदी की वैश्विक राजनीति अब केवल सैन्य गठबंधनों या वैचारिक ध्रुवीकरण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह व्यापार, ऊर्जा और आपूर्ति शृंखलाओं के इर्द-गिर्द पुनर्गठित हो रही है। वर्ष 2026 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच संपन्न मुक्त व्यापार समझौता इसी बदलते वैश्विक परिदृश्य का प्रतीक है। इसे आर्थिक सहयोग का ऐतिहासिक कदम माना गया, किंतु इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट की तीखी आलोचना ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि क्या वैश्विक राजनीति में नैतिक प्रतिबद्धताएँ व्यापारिक हितों के आगे गौण हो चुकी हैं। भारत-ईयू समझौते पर अमेरिका की प्रतिक्रिया वस्तुतः व्यापार, युद्ध और भू-राजनीति के अंतर्संबंधों को उजागर करती है। भारत–ईयू एफटीए: आर्थिक अवसरों की धुरी भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता वर्षों की जटिल वार्ताओं के बाद अस्तित्व में आया है। यह समझौता न केवल शुल्क कटौती और बाज़ार पहुँच का माध्यम है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारत की भूमिका को सुदृ...