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मोदी युग में लोकतंत्र: विकास, विरोध और सवालों का संतुलन – एक संपादकीय विश्लेषण प्रस्तावना: तीन दोस्तों की वर्तमान राजनीति पर चर्चा प्रयागराज शहर के चंद्रशेखर आजाद पार्क में हरी-भरी घास पर बैठ कर तीन दोस्त वर्तमान राजनीति पर बहस कर रहे हैं। पहला दोस्त उत्साह से बोलता है – “मोदी जी के कार्यकाल में योजनाओं की बरसात हो गई है, देश बदल रहा है।” दूसरा धीरे-से जोड़ता है – “सही कहा, लेकिन विरोध और बहस भी बढ़ी है।” तीसरा दोस्त मुस्कुराते हुए कहता है – “लोकतंत्र में विकास और सवाल दोनों अनिवार्य हैं।” यह संवाद महज़ बातचीत नहीं; यह 2014 से 2025 तक भारत की राजनीतिक कहानी का सार है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने तेज़ विकास की ओर कदम बढ़ाए हैं, पर आलोचना, विरोध और सवाल भी उसी गति से उभरे हैं। यह लेख इसी द्वंद्व – विकास बनाम सवाल – के संतुलन को समझने की कोशिश है। मोदी सरकार की योजनाएँ: विकास के नए प्रतिमान मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही “सबका साथ, सबका विकास” का नारा दिया। यह सिर्फ़ चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि अनेक नीतियों की आधारशिला बनी। स्वच्छ भारत अभियान (2014): लाखो...