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US-Israel Military Campaign Against Iran: Nuclear Deterrence Double Standards and the Risks to Global Order

अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...

Nivarak Nirodh aur NSA: Suraksha ke Naam par Swatantrata ka Hanan ya Nyayasangat Upay?

निवारक निरोध और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम: सुरक्षा के नाम पर स्वतंत्रता का हनन?

हाल ही में लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए), 1980 के तहत निवारक हिरासत ने एक बार फिर इस कानून की उपयोगिता और वैधता पर बहस छेड़ दी है। उनकी पत्नी डॉ. गीतांजली जे. अंगमो द्वारा दायर हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 6 अक्टूबर को सुनवाई करने वाला है, जिसमें वांगचुक की हिरासत को चुनौती दी गई है। यह मामला न केवल लद्दाख की राज्य दर्जे और छठी अनुसूची की मांग से जुड़ा है, बल्कि यह उस व्यापक समस्या को भी उजागर करता है, जिसमें निवारक निरोध राजनीतिक असहमति दबाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

भारत में निवारक निरोध की अवधारणा संविधान के अनुच्छेद 22 से उत्पन्न हुई है। यह राज्य को कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति को बिना मुकदमे के हिरासत में रखने की अनुमति देती है। इसी सिद्धांत पर आधारित एनएसए, केंद्र और राज्य सरकारों को राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या आवश्यक आपूर्तियों को खतरे में डालने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए 12 महीने तक की हिरासत की शक्ति देता है। इसका औचित्य यह है कि यह संभावित खतरे को पहले ही रोक सके, जैसे कि आतंकवादी गतिविधियां या सांप्रदायिक दंगे, जो देश की स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। संविधान निर्माताओं ने इसे विशेष परिस्थितियों—जैसे युद्ध, आंतरिक अशांति या आपातकाल—में राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित माना।

लेकिन वास्तविकता में, एनएसए का दुरुपयोग एक गंभीर समस्या बन चुका है। आलोचकों का तर्क है कि यह कानून अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है, क्योंकि इसमें व्यक्ति को बिना आरोप-पत्र या सुनवाई के हिरासत में रखा जा सकता है। गिरफ्तारी के कारण को कई दिनों तक गुप्त रखा जा सकता है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में इसका इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ किया गया है, जिससे यह सुरक्षा की आड़ में सत्ता का दुरुपयोग बन गया है।

वांगचुक का मामला इसका ताजा उदाहरण है—एक शांतिपूर्ण आंदोलनकारी, जो पर्यावरण और क्षेत्रीय अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है, को हिंसक प्रदर्शनों के बाद एनएसए के तहत हिरासत में रखा गया। क्या पर्यावरणीय मांगें वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं? यह सवाल एनएसए की व्याख्या की मनमानी पर गंभीर प्रकाश डालता है।

एनएसए के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि पारंपरिक आपराधिक न्याय प्रणाली हमेशा संभावित जोखिमों को समय पर रोक नहीं पाती। फिर भी, दुरुपयोग इतना व्यापक है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने कई बार इसकी आलोचना की है। अदालतें अक्सर हिरासत रद्द कर देती हैं, लेकिन तब तक व्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन पर अपूरणीय प्रभाव पड़ चुका होता है।

समय आ गया है कि एनएसए में सुधार किए जाएं। इसके लिए आवश्यक है कि हिरासत के आधार तुरंत सूचित किए जाएं, स्वतंत्र सलाहकार बोर्ड की भूमिका मजबूत हो और न्यायिक समीक्षा अनिवार्य की जाए। सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र की सच्ची परीक्षा है। वांगचुक जैसे मामलों से सबक लेकर, सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि एनएसए राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे, न कि असहमति को दबाने का साधन बने। अन्यथा, यह कानून स्वयं लोकतंत्र के लिए खतरा बन जाएगा।


संभावित UPSC प्रश्न 


1. बहुविकल्पीय (MCQ/Prelims) संभावित प्रश्न:

  1. राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980 के संबंध में सही कथन चुनें:
    a) एनएसए केवल आतंकवाद के मामलों में ही लागू किया जा सकता है।
    b) एनएसए के तहत राज्य सरकार को व्यक्ति को बिना आरोप-पत्र के 12 महीने तक हिरासत में रखने का अधिकार है।
    c) एनएसए का दुरुपयोग अनुच्छेद 21 का उल्लंघन कर सकता है।
    d) केवल केंद्र सरकार एनएसए का प्रयोग कर सकती है।

    सही उत्तर: b और c

  2. अनुच्छेद 22 के तहत निवारक निरोध से संबंधित कौन सा कथन सही है?
    a) इसे केवल आपातकाल के समय लागू किया जा सकता है।
    b) यह राज्य को कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति को बिना मुकदमे के हिरासत में रखने की अनुमति देता है।
    c) यह न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह मुक्त है।
    d) यह केवल विदेशी नागरिकों पर लागू होता है।

    सही उत्तर: b

  3. वांगचुक मामले के संदर्भ में, एनएसए के किस पहलू पर विवाद सबसे अधिक है?
    a) हिरासत की अधिकतम अवधि
    b) हिरासत के आधार की गुप्तता
    c) केवल आतंकवाद के मामलों में इसका प्रयोग
    d) न्यायिक समीक्षा की पूर्ण अनुपस्थिति

    सही उत्तर: b


2. संभावित Mains (GS Paper 2/4) प्रश्न:

  1. प्रश्न: “राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) का दुरुपयोग मौलिक अधिकारों का हनन कर सकता है।” अपने उत्तर में संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 का हवाला देते हुए इसे स्पष्ट कीजिए।

  2. प्रश्न: वर्तमान संदर्भ में पर्यावरण और क्षेत्रीय अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं के खिलाफ एनएसए के प्रयोग को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है? अपने उत्तर में सुरक्षा और लोकतंत्र के बीच संतुलन पर प्रकाश डालें।

  3. प्रश्न: एनएसए में सुधार की आवश्यकता और संभावित उपाय क्या हैं ताकि यह राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे, न कि राजनीतिक असहमति को दबाने का साधन बने?


लद्दाख संकट से जुड़े पूरे मामले को समझने के लिए यहां क्लिक कीजिये


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