अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
नेहरू के प्रधानमंत्री चयन पर गाँधी जी का निर्णय: एक विवेचनात्मक लेख स्वतंत्रता संग्राम की अंतिम घड़ी में, 1946–47 का समय भारतीय राजनीति के लिए निर्णायक मोड़ लेकर आया। कांग्रेस पार्टी के भीतर प्रधानमंत्री पद को लेकर जब असमंजस की स्थिति बनी, तब महात्मा गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू को इस जिम्मेदारी के लिए चुना। इस निर्णय पर वर्षों से प्रश्न उठते रहे हैं—क्या यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी थी? क्या सरदार पटेल को दरकिनार कर दिया गया? इन प्रश्नों पर समकालीन इतिहासकारों और विचारकों ने गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किए हैं। इन श्रोतों के आधार पर यह तर्क स्थापित किया जा सकता है कि गाँधी जी का निर्णय केवल किसी व्यक्ति-विशेष की पसंद नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत के निर्माण की दिशा में दूरदर्शी कदम था। नेहरू और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि की आवश्यकता राजनीतिक वैज्ञानिक रजनी कोठारी ने अपनी कृतियों में बार-बार यह रेखांकित किया है कि स्वतंत्र भारत को एक ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता थी, जो केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि विश्व मंच पर भी भारत की आधुनिक छवि प्रस्तुत कर सके। नेहरू पश्चिमी शिक्षा से दीक्षित, अंतरराष्ट्रीय ...