हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स की सदस्यता का अंत: ब्रिटिश लोकतंत्र के विकास का एक निर्णायक अध्याय ब्रिटेन की संसदीय परंपरा विश्व की सबसे पुरानी और स्थायी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है। किंतु इस गौरवपूर्ण परंपरा के भीतर कुछ ऐसे तत्व भी रहे हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ लंबे समय से असंगत माने जाते रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख था हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स (Hereditary Peers) की सदस्यता—एक ऐसी व्यवस्था जिसके अंतर्गत कुलीन परिवारों के सदस्य केवल अपने जन्म के आधार पर संसद के ऊपरी सदन में स्थान प्राप्त करते थे। मार्च 2026 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित Hereditary Peers Bill इस व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इसके साथ ही सदियों से चली आ रही वह परंपरा समाप्त हो जाएगी जिसके अंतर्गत राजनीतिक शक्ति का एक हिस्सा जन्माधिकार से निर्धारित होता था। यह सुधार न केवल एक संस्थागत परिवर्तन है, बल्कि ब्रिटिश लोकतंत्र के क्रमिक आधुनिकीकरण की उस दीर्घकालिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें सामंती विरासतों को धीरे-धीरे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरू...
The Power of Solitude and Social Conditioning: Sociological Relevance of Shekhar: Ek Jivani for UPSC
‘अकेले रहने की सामर्थ्य’ : शेखर : एक जीवनी के अंश का समाजशास्त्रीय विश्लेषण उद्धृत अंश— “उसके चरित्र में त्रुटियाँ अनेक थीं लेकिन एक शक्ति भी पायी… अकेले रहने की सामर्थ्य… स्कूल, कॉलेज और संगति में टाइप बनते हैं और वह बना व्यक्ति” — उपन्यास के नायक शेखर के व्यक्तित्व की एक केन्द्रीय समाजशास्त्रीय अंतर्दृष्टि प्रस्तुत करता है। यह अंश व्यक्ति-निर्माण, सामाजिक संस्थाओं की भूमिका, अनुरूपता (conformity) और वैयक्तिकता (individuality) के द्वंद्व को उद्घाटित करता है। 1. व्यक्ति-निर्माण और समाजीकरण (Socialization) समाजशास्त्र के अनुसार व्यक्ति जन्म से “तैयार” नहीं होता; वह समाजीकरण की निरंतर प्रक्रिया से गुजरते हुए बनता है। परिवार, स्कूल, कॉलेज और सहकर्मी समूह (peer groups) व्यक्ति को व्यवहार, मूल्य और पहचान के स्वीकार्य टाइप सिखाते हैं। अंश में कहा गया— “स्कूल, कॉलेज और संगति में टाइप बनते हैं” —यह इस तथ्य को रेखांकित करता है कि आधुनिक संस्थाएँ व्यक्तियों को मानकीकृत ढाँचों में ढालती हैं, ताकि वे सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप हों। 2. ‘टाइप’ बनाम ‘स्व’ : अनुरूपता का दबाव यहाँ ...