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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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​5 Years of Taliban Rule: Inside Afghanistan’s Silent Humanitarian Crisis

ध्वज के साए में पाँच वर्ष: अफ़ग़ानिस्तान के नए अध्याय का दोहरा सच



काबुल की धूल भरी सड़कों पर, यह शहर एक गहरे अंतरद्वंद्व को जी रहा है। एक तरफ देखें तो जीत की नुमाइश करती एक सत्ता दिखाई देती है: हवा में लहराते विशाल बैनर, करीने से आयोजित सैन्य परेड और एक महाशक्ति के जाने के बाद पीछे छूटे घातक हथियारों का भयानक प्रभाव। दूसरी तरफ देखें तो ज़िंदा रहने की एक शांत, हताश जंग नज़र आती है। तालिबान की सत्ता में वापसी के पाँच साल बाद, नेतृत्व का "भव्य जश्न" अफ़ग़ानिस्तान की जनता पर टूटे मानवीय संकट से बिल्कुल अलग थलग खड़ा है। एक विश्लेषक के लिए सवाल अब यह नहीं रहा कि तालिबान ने सत्ता कैसे हासिल की, बल्कि सवाल यह है कि वे एक ऐसे देश पर शासन कैसे चलाएंगे जहाँ "सफलता" का दायरा सैन्य परेडों तक सीमित है, जबकि जनता एक अभूतपूर्व आर्थिक तबाही का सामना कर रही है।


"स्थिरता" और अस्तित्व का विरोधाभास


बीते आधे दशक को लेकर तालिबान का यही दावा रहा है कि उन्होंने देश को पूरी तरह बहाल कर दिया है। वे दशकों लंबे गृहयुद्ध के खात्मे और एक "मजबूत केंद्रीय सरकार" की स्थापना को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताते हैं। काबुल के गढ़ की ऊँचाइयों से देखने पर हर तरफ व्यवस्था का मंज़र दिखाई देता है—एक ऐसा देश जो एक सख्त हुकूमत के तहत एकजुट है, जिसने अपने दावों के मुताबिक भ्रष्टाचार को मिटा दिया है और अपने प्रतिद्वंद्वियों को खामोश कर दिया है।


"तालिबान नेतृत्व इन पाँच सालों को राष्ट्र की स्थिरता, सुरक्षा और सफलता के प्रतीक के रूप में देखता है।"


फिर भी, यह स्थिरता बेहद खोखली है। अफ़ग़ान नागरिकों के लिए सीधे युद्ध का खत्म होना किसी समृद्धि की शांति नहीं, बल्कि एक श्मशान जैसी खामोशी लेकर आया है। तालिबान ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है और खुद को सुरक्षित कर लिया है, लेकिन वे जनता को "कल्याण की सुरक्षा" देने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। इस माहौल में स्थिरता का मतलब सिर्फ इतना है कि अब मोर्चों पर जंग नहीं हो रही; यह आम इंसान को न तो गरीबी की मार से बचा पा रही है और न ही भुखमरी के खौफ से।


अर्थव्यवस्था का शांत पतन


जीत के बड़े-बड़े दावों के पीछे देश की वित्तीय साख पूरी तरह तबाह हो चुकी है। बैंकिंग प्रणाली के ठप होने और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बोझ ने न केवल बड़े वित्तीय लेन-देन को मुश्किल बनाया है, बल्कि ज़मीनी हकीकत का सामना कर रहे लोगों के शब्दों में, आम जनता की "कमर तोड़" दी है।


एक कामकाजी केंद्रीय सरकार केवल एक ढाँचा बनकर रह जाती है अगर उसमें व्यापार और लेन-देन की रवानगी न हो। आज अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप है। आत्मनिर्भरता के तमाम दावों के बावजूद, तालिबान सरकार उसी अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर निर्भर है जिससे वह दूरी बनाए हुए है। लोगों का गुज़र-बसर—यानी रोज़ की रोटी का इंतज़ाम—संयुक्त राष्ट्र (UN) और रेड क्रॉस जैसी राहत एजेंसियों के भरोसे चल रहा है। जब पूँजी की आवाजाही रुक जाती है और बैंकिंग व्यवस्था ठप पड़ी रहती है, तो नुकसान बख्तरबंद गाड़ियों में घूमने वाले अफ़सरों का नहीं होता, बल्कि उन छोटे दुकानदारों और परिवारों का होता है जिनकी खरीदने की ताकत धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो चुकी है।


अस्वीकार्यता की कीमत और "खाली कक्षाएं"


अफ़ग़ानिस्तान के लिए वैश्विक बिरादरी में वापस लौटने के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट उसकी अपनी ही नीतियां हैं। महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह बेदखल कर देना—उन्हें शिक्षा, रोज़गार और बुनियादी आज़ादी से महरूम करना—एक ऐसा गतिरोध बन गया है जिसका कोई हल नज़र नहीं आता। इन मुद्दों पर तालिबान का झुकने से इंकार करना ही सबसे बड़ी वजह है कि उनका शासन दुनिया से अलग-थलग पड़ा है। इसी कारण उन्हें वह अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिल पा रही है जो संपत्ति पर लगी रोक हटाने और अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए ज़रूरी है।

यह "खाली कक्षा" सिर्फ़ अधूरी रह गई उम्मीदों की कहानी नहीं है, बल्कि देश की आधी आबादी की बौद्धिक और आर्थिक ताकत को जानबूझकर खत्म करने जैसा है। दुनिया का इन मानवाधिकार उल्लंघनों पर लगातार नज़र बनाए रखना ही इस शासन की महत्त्वाकांक्षाओं के आड़े आ रहा है।

दुनिया की मुख्य चिंताएं:


  • आर्थिक संकट: पूरी तरह से पस्त वित्तीय ढाँचा और निहायत गरीबी की तरफ धकेली जा रही आबादी।

  • व्यापक बेरोज़गारी: कामगारों की एक पूरी पीढ़ी के लिए रोज़गार और आजीविका के अवसरों का खत्म होना।

  • मानवाधिकारों का हनन: महिलाओं के अधिकारों पर सख्त पाबंदियाँ, जो कूटनीतिक मान्यता के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई हैं।


सीमाओं से परे एक संकट


अफ़ग़ानिस्तान का यह संकट सिर्फ़ उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के शक्ति-संतुलन को हिला देने वाली घटना है। देश के मौजूदा हालातों ने एक ऐसा खालीपन पैदा कर दिया है जिससे दक्षिण और मध्य एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पर खतरा मंडरा रहा है। यह अब केवल "अफ़ग़ानिस्तान की समस्या" नहीं रह गया है—यह पूरे इलाके में फैलने वाला संकट बन चुका है।


एक मान्यता प्राप्त और संगठित सरकार के न होने से अनिश्चितता का माहौल गहरा गया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय में बटे विचारों ने क्षेत्रीय स्तर पर एक ऐसा खालीपन छोड़ दिया है जहाँ आतंकवाद पनप सकता है, और आर्थिक तबाही से भागते लोगों के कारण शरणार्थी संकट पड़ोसी देशों की सीमाओं को पार कर रहा है। यह अस्थिरता किसी नए दौर का इत्तेफाक नहीं है, बल्कि यह उस शासन का सीधा नतीजा है जिसने क्षेत्रीय सहयोग और बेहतर प्रशासन के बजाय अपनी कट्टरपंथी सोच को प्राथमिकता दी है।


निष्कर्ष: अनिश्चितता के ढलता सूरज


काबुल की पथरीली पहाड़ियों के पीछे जैसे ही सूरज ढलता है, सैन्य हथियारों की लंबी परछाइयां बेहद चिंतित नागरिकों पर पड़ती हैं। तालिबान ने पाँच साल में यह तो साबित कर दिया कि वे इलाके पर कब्ज़ा रख सकते हैं और परेड निकाल सकते हैं, लेकिन वे यह साबित नहीं कर पाए कि वे एक देश को संभाल सकते हैं। नेतृत्व का यह जश्न उस मुस्तकबिल पर ढका हुआ एक पतला पर्दा भर है जो बेरोज़गारी, अलग-थलग पड़ने और धीरे-धीरे गहराते मानवीय संकट से घिरा है।


अंतिम सवाल यही बना हुआ है: क्या कोई सरकार सचमुच "स्थिरता" का दावा कर सकती है यदि वह दुनिया के लिए अछूत बनी रहे, अपनी आधी आबादी को काम करने से रोक दे, और अकाल को टालने के लिए संयुक्त राष्ट्र और रेड क्रॉस की मदद पर टिकी रहे? ये परेड भले ही तालिबान के आत्मविश्वास का ढिंढोरा पीटती हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत यही बताती है कि जनता के टूटे कंधों पर टिकी "सफलता" असल में कोई सफलता नहीं है। तालिबान शासन के आधे दशक पर सूरज ढल रहा है, और अफ़ग़ान लोगों के लिए आने वाली रात कभी इतनी अनिश्चित नहीं लगी।

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