अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
एससी/एसटी आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा : सामाजिक न्याय की नई चुनौती (मौलिक, प्रवाहपूर्ण एवं विश्लेषणात्मक लेख) प्रस्तावना भारतीय संविधान सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित समुदायों को समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण को एक सुधारात्मक उपाय (affirmative action) के रूप में मान्यता देता है। अनुच्छेद 15(4), 16(4) और 335 के तहत अनुसूचित जाति (SC) एवं अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों को शिक्षा, नौकरियों और पदोन्नति में आरक्षण प्रदान किया गया है। परंतु समय के साथ यह प्रश्न उभर कर सामने आया है कि क्या इन समुदायों के भीतर भी एक ऐसा आर्थिक-सामाजिक रूप से उन्नत वर्ग विकसित हो चुका है, जो आरक्षण के वास्तविक उद्देश्य से परे है और जिसके कारण अत्यंत वंचित उप-जातियाँ पीछे रह जा रही हैं? नवंबर 2025 में मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गावई—जो स्वयं एक अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं—ने खुलकर कहा कि एससी/एसटी आरक्षण में भी ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर करना चाहिए ताकि लाभ वास्तविक रूप से वंचित वर्गों तक पहुँच सके। यह टिप्पणी उस बड़े संवैधानिक विमर्श को नई दिशा देती है, जिसकी शुरुआत सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के उप-व...