भारत की गाजा शांति योजना में भागीदारी: ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पर्यवेक्षक के रूप में भारत की कूटनीतिक उपस्थिति परिचय वर्ष 2026 में गाजा पट्टी का प्रश्न केवल इजराइल–फिलिस्तीन संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन, मानवीय हस्तक्षेप और बहुपक्षीय कूटनीति की परीक्षा बन गया है। ऐसे समय में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा प्रारंभ किया गया ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) एक नई पहल के रूप में सामने आया है, जिसका घोषित उद्देश्य गाजा में युद्धविराम की निगरानी, पुनर्निर्माण, हमास के निरस्त्रीकरण तथा एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण व्यवस्था की स्थापना है। फरवरी 2026 में वाशिंगटन डीसी में आयोजित इस बोर्ड की पहली बैठक में भारत ने पूर्ण सदस्य के बजाय पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में भाग लिया। यह निर्णय साधारण कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की संतुलित और बहुस्तरीय विदेश नीति का प्रतीक है। ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पृष्ठभूमि: संयुक्त राष्ट्र से परे एक वैकल्पिक मंच? ट्रंप प्रशासन ने जनवरी 2026 में विश्व आर्थिक मंच (दावोस) के दौरान इस पहल की घोषणा की थी। इसे एक ऐसे मंच के रूप में...
भारत की हरित ऊर्जा क्रांति: जीवाश्म ईंधन से हाइड्रो और नवीकरणीय स्रोतों की ओर संतुलित संक्रमण परिचय भारत का ऊर्जा क्षेत्र 2026 की शुरुआत में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहां गैर-जीवाश्म ईंधन की स्थापित क्षमता ने कुल क्षमता के 52 प्रतिशत से अधिक का आंकड़ा छू लिया है। 2025 में रिकॉर्ड 49.12 गीगावाट (GW) गैर-जीवाश्म क्षमता जोड़ी गई, जिससे कुल नॉन-फॉसिल क्षमता 266.78 GW तक पहुंच गई—यह 2024 की तुलना में 22.6 प्रतिशत की वृद्धि है। यह उपलब्धि पेरिस समझौते के तहत 2030 तक 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म क्षमता के लक्ष्य को पांच वर्ष पहले हासिल करने का प्रमाण है, जो भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को मजबूती प्रदान करती है। फिर भी, कोयला-आधारित बिजली उत्पादन अभी भी कुल उत्पादन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा रखता है, जबकि पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता अर्थव्यवस्था की एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस संक्रमण में हाइड्रो पावर एक संतुलनकारी भूमिका निभा रही है, जो सौर और पवन जैसी अंतरालिक ऊर्जा स्रोतों को स्थिरता प्रदान करती है। यह लेख ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु जिम्मेदारी और आर्थिक विकास के त्रिवेणी संगम का विश्लेषण ...