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सावलकोट हाइड्रो प्रोजेक्ट: जल-रणनीति, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय संकल्प का नया अध्याय भारत की जल-नीति और ऊर्जा रणनीति लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, कूटनीतिक आपत्तियों और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन साधती रही है। किंतु सिंधु जल संधि के निलंबन के बाद, मोदी सरकार ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि अब विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और ऊर्जा आत्मनिर्भरता—तीनों पर कोई समझौता नहीं होगा। चिनाब नदी पर प्रस्तावित सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट इसी बदली हुई रणनीतिक सोच का सबसे सशक्त और ठोस प्रमाण बनकर उभरा है। सरकारी कंपनी एनएचपीसी (NHPC) द्वारा 5,129 करोड़ रुपये के प्रमुख सिविल वर्क पैकेज का टेंडर जारी होना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि दशकों से रुके एक राष्ट्रीय स्वप्न को गति देने का निर्णायक क्षण है। यह परियोजना जम्मू-कश्मीर के विकास, भारत की ऊर्जा सुरक्षा और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति—तीनों को एक साथ प्रभावित करने की क्षमता रखती है। सिंधु जल संधि का निलंबन: सुरक्षा और संप्रभुता का संदेश 1960 में हुई सिंधु जल संधि को लंबे समय तक भारत-पाक संबंधों में स्थिरता का प्रतीक माना...