अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता: “सभी सौदों की माँ” की ओर एक ऐतिहासिक कदम परिचय दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) के 2026 सत्र में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन का एक वाक्य वैश्विक मीडिया की सुर्खियों में छा गया—उन्होंने भारत–यूरोपीय संघ (EU) के प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते को “मदर ऑफ ऑल डील्स” यानी “सभी सौदों की माँ” कहा। यह कोई साधारण राजनयिक अतिशयोक्ति नहीं थी, बल्कि उस विशाल आर्थिक और रणनीतिक संभावना की ओर संकेत था, जो इस समझौते के जरिए साकार हो सकती है। यह समझौता लगभग 2 अरब लोगों के बाजार को जोड़ देगा और वैश्विक जीडीपी के लगभग एक चौथाई हिस्से को एक साझा व्यापारिक ढांचे में समेटेगा। एक ओर भारत, जो दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में है, और दूसरी ओर यूरोपीय संघ, जो तकनीक, विनिर्माण, हरित ऊर्जा और उच्च मानकों वाले नियामक ढांचे के लिए जाना जाता है—इन दोनों का मिलन वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नया संतुलन पैदा कर सकता है। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था अस्थिर दौर से गुजर रही है—संरक्षणवाद ब...