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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

India-EU Security and Defence Partnership 2026: Key Details

भारत-यूरोपीय संघ रक्षा साझेदारी: वैश्विक अस्थिरता में एक सशक्त संरेखण दुनिया आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां पुरानी वैश्विक व्यवस्था की नींव हिल रही है। अमेरिकी नेतृत्व वाली एकध्रुवीयता की जगह बहुध्रुवीयता ले रही है, और क्षेत्रीय शक्तियां अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने में जुटी हैं। इसी पृष्ठभूमि में भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी का समझौता एक महत्वपूर्ण विकास है। 21 जनवरी 2026 को ईयू की विदेश नीति प्रमुख काजा कलास द्वारा घोषित यह साझेदारी न केवल दोनों पक्षों की साझा सुरक्षा चिंताओं को संबोधित करती है, बल्कि उभरते वैश्विक क्रम में एक नई धुरी का निर्माण भी करती है। शिखर सम्मेलन: प्रतीकवाद और रणनीति का संगम आगामी 27 जनवरी को नई दिल्ली में आयोजित 16वें भारत-ईयू शिखर सम्मेलन का महत्व केवल द्विपक्षीय चर्चाओं तक सीमित नहीं है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा का गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होना एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश है। यह दर्शाता है कि ईयू भारत को महज एक बाजार या साझेदार के रू...

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Why India Needs a Shadow Cabinet: Strengthening the Role of Opposition in a Modern Democracy

वर्तमान में भारत में विपक्ष की आवाज़ को सशक्त बनाने हेतु छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता एक समग्र अकादमिक विश्लेषण परिचय लोकतंत्र की आत्मा सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन में निहित होती है। जहां सत्तारूढ़ दल शासन, नीति-निर्माण और प्रशासन का दायित्व निभाता है, वहीं विपक्ष का कार्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों की समीक्षा, आलोचना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना होता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष ‘नकारात्मक शक्ति’ नहीं, बल्कि रचनात्मक नियंत्रक (Constructive Watchdog) की भूमिका निभाता है। भारत, जो स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र घोषित करता है, आज एक ऐसे राजनीतिक चरण से गुजर रहा है जहाँ विपक्ष की भूमिका कमजोर, बिखरी हुई और प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है। संसद के भीतर विमर्श का स्तर गिरा है और नीति-आलोचना प्रायः नारेबाज़ी या वॉकआउट तक सीमित रह जाती है। ऐसे परिदृश्य में छाया मंत्रिमंडल (Shadow Cabinet) की अवधारणा भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज़ को संस्थागत, संगठित और प्रभावी बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। यह लेख भारत में छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता, उसके संभा...

Western Alliance Cracks and the Rise of a Multipolar World Order

पश्चिमी गठबंधन में उभरती दरारें: बहुध्रुवीय विश्व की ओर संकेत ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन, जो शीत युद्ध के बाद वैश्विक स्थिरता का प्रतीक रहा है, आज अपनी आंतरिक असंगतियों से जूझ रहा है। अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते मतभेद न केवल रणनीतिक प्राथमिकताओं में फर्क दिखाते हैं, बल्कि एक नई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के उभरने का स्पष्ट संकेत भी देते हैं। जहां अमेरिका अपनी "अमेरिका फर्स्ट" नीति के तहत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की चुनौती पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, वहीं यूरोप अपनी रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने की कोशिश में लगा है। ये दरारें महज नीतिगत असहमतियां नहीं हैं, बल्कि गहरे भू-राजनीतिक परिवर्तनों की अभिव्यक्ति हैं, जो पश्चिमी एकता के पारंपरिक मिथक को तोड़ रही हैं। 2025-2026 में ट्रंप प्रशासन की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (NSS) ने इन मतभेदों को और गहरा किया है, जिसमें यूरोप को "सभ्यता के विलोपन" का खतरा बताया गया है। अमेरिकी एकतरफावाद इस संकट का मूल कारण है। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में "अमेरिका फर्स्ट 2.0" नीति ने यूरोप पर दबाव बढ़ा दिया है। NATO में बो...

Union Budget 2026-27: Fiscal Stability, Structural Reforms and Inclusive Growth Strategy

केंद्रीय बजट 2026-27: स्थिरता, सुधार और समावेशी विकास की दिशा में एक संतुलित कदम 1 फरवरी 2026 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026–27 केवल एक वार्षिक वित्तीय दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह उस नीति-निरंतरता का प्रमाण है जिसके माध्यम से भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में भी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। यह बजट इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह उनका लगातार नौवाँ बजट है और ‘कर्तव्य भवन’ में तैयार किया गया पहला बजट भी—जो शासन की नई कार्य-संस्कृति और संस्थागत संक्रमण का प्रतीक है। बजट का केंद्रीय दर्शन तीन परस्पर जुड़े उद्देश्यों पर आधारित दिखाई देता है—आर्थिक विकास की गति को बनाए रखना, मानव क्षमता का सशक्तिकरण, और “सबका साथ, सबका विकास” के सिद्धांत के अनुरूप समावेशी अवसरों का विस्तार। यह दर्शन किसी तात्कालिक राजनीतिक लाभ से अधिक, दीर्घकालिक आर्थिक सोच को प्रतिबिंबित करता है। राजकोषीय अनुशासन: विश्वास और स्थिरता की नींव बजट 2026–27 का सबसे मजबूत पक्ष उसका राजकोषीय संतुलन है। सरकार ने राजकोषीय घाटे को GDP के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने ...

India–US Trade Deal 2026: Strategic Shift, Tariff Cuts, Energy Realignment and Geopolitical Implications

भारत–अमेरिका व्यापार समझौता 2026: रणनीतिक मोड़, आर्थिक अवसर और भू-राजनीतिक निहितार्थ परिचय वैश्विक अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल के इस दौर में, जहां व्यापार युद्ध, ऊर्जा संकट और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं, भारत और अमेरिका के बीच फरवरी 2026 में घोषित व्यापार समझौता एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुए उच्च-स्तरीय संवाद के परिणामस्वरूप यह समझौता न केवल द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को मजबूत करता है, बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन को भी प्रभावित करता है। इस समझौते के केंद्र में भारतीय निर्यात पर लगे अमेरिकी टैरिफ में भारी कटौती और रूसी तेल आयात से जुड़ी शर्तें हैं, जो पिछले एक साल से चले आ रहे तनाव को समाप्त करती हैं। यह लेख समझौते की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उसके प्रमुख प्रावधानों, आर्थिक लाभों व जोखिमों, तथा भू-राजनीतिक प्रभावों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह समझौता न केवल आर्थिक अवसरों का द्वार खोलता है, बल्कि भारत की बहुध्रुवीय कूटनीति को भी नई दिशा देता है। पृष्ठभूमि: तनाव से सम...

Supreme Court Intervention on UGC Regulations: Equality, Inclusion and the Future of Higher Education in India

उच्चतम न्यायालय का यूजीसी नियमों पर हस्तक्षेप: समानता, समावेशिता और जाति-विहीन समाज की संवैधानिक तलाश भारतीय लोकतंत्र की आत्मा समानता में निहित है—एक ऐसी समानता जो केवल कानूनी प्रावधान न होकर सामाजिक चेतना का आधार बने। इसी पृष्ठभूमि में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा 2026 में जारी किए गए नए नियमों पर उच्चतम न्यायालय का हालिया अंतरिम हस्तक्षेप केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय समाज की दिशा पर एक गहन संवैधानिक टिप्पणी के रूप में देखा जाना चाहिए। यह फैसला उस मूल प्रश्न को पुनः केंद्र में लाता है कि क्या भारत, 75 वर्षों की स्वतंत्रता के बाद, जाति-विहीन समाज की ओर अग्रसर है या अनजाने में विभाजनकारी रेखाओं को और गहरा कर रहा है। विवाद की पृष्ठभूमि: नियमों में निहित संकुचन 13 जनवरी 2026 को यूजीसी द्वारा अधिसूचित नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में संकाय नियुक्तियों और पदोन्नति प्रक्रियाओं में भेदभाव को रोकना बताया गया। किंतु इन नियमों की मूल समस्या उनकी परिभाषात्मक संरचना में निहित थी। अनुच्छेद 3(सी) के अंतर्गत ‘भेदभाव’ को विशेष रूप से जाति-आधारित भेदभाव तक...

Trade, Geopolitics and Power Politics: Analysing US Criticism of the India–EU Free Trade Agreement

व्यापारिक हित बनाम भू-राजनीतिक प्रतिबद्धताएँ भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते के संदर्भ में अमेरिकी आलोचना का विश्लेषण भूमिका इक्कीसवीं सदी की वैश्विक राजनीति अब केवल सैन्य गठबंधनों या वैचारिक ध्रुवीकरण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह व्यापार, ऊर्जा और आपूर्ति शृंखलाओं के इर्द-गिर्द पुनर्गठित हो रही है। वर्ष 2026 में भारत और यूरोपीय संघ के बीच संपन्न मुक्त व्यापार समझौता इसी बदलते वैश्विक परिदृश्य का प्रतीक है। इसे आर्थिक सहयोग का ऐतिहासिक कदम माना गया, किंतु इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट की तीखी आलोचना ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि क्या वैश्विक राजनीति में नैतिक प्रतिबद्धताएँ व्यापारिक हितों के आगे गौण हो चुकी हैं। भारत-ईयू समझौते पर अमेरिका की प्रतिक्रिया वस्तुतः व्यापार, युद्ध और भू-राजनीति के अंतर्संबंधों को उजागर करती है। भारत–ईयू एफटीए: आर्थिक अवसरों की धुरी भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता वर्षों की जटिल वार्ताओं के बाद अस्तित्व में आया है। यह समझौता न केवल शुल्क कटौती और बाज़ार पहुँच का माध्यम है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारत की भूमिका को सुदृ...

UGC Equity Regulations 2026: Student Protests and the Debate on Fairness in Higher Education

यूजीसी की समता नियमावली 2026: उच्च शिक्षा में समानता की चुनौतियाँ और छात्र असंतोष की लहर भूमिका 27 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) मुख्यालय के बाहर छात्रों का एकत्र होना उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक नई बहस का प्रारंभ था। ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता को बढ़ावा देने संबंधी नियमावली, 2026’ के खिलाफ यह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन समानता के नाम पर कैंपसों में संभावित विभाजन और असंतुलन की आशंका को व्यक्त कर रहा था। प्रदर्शनकारियों का मुख्य तर्क था कि ये नियम अस्पष्ट, एकतरफा और दुरुपयोग के लिए प्रवृत्त हो सकते हैं, जिससे अकादमिक स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है। यह घटना केवल एक प्रशासनिक नियम से जुड़ी नहीं है, बल्कि यह उच्च शिक्षा नीति, सामाजिक न्याय, प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और संस्थागत संतुलन के बीच उभरते तनाव को उजागर करती है। नियमावली की पृष्ठभूमि और संदर्भ यह नियमावली 2012 के पुराने दिशा-निर्देशों को प्रतिस्थापित करती है, जिन्हें अब बाध्यकारी रूप दिया गया है। इसका मूल उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता, जन्...

Supreme Court Declares Menstrual Hygiene a Fundamental Right Under Article 21

मासिक धर्म स्वच्छता: गरिमा से जुड़े अधिकार की संवैधानिक स्वीकृति भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 समय के साथ केवल जीवित रहने के अधिकार से आगे बढ़कर सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार का संवैधानिक आधार बन चुका है। 30 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया यह ऐतिहासिक निर्णय—जिसमें मासिक धर्म स्वास्थ्य एवं स्वच्छता को जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा घोषित किया गया—इसी संवैधानिक विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह फैसला न केवल कानून की भाषा में परिवर्तन का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक चेतना के स्तर पर भी एक निर्णायक हस्तक्षेप है। जीवन का अधिकार: जैविक यथार्थ से गरिमा तक न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि मासिक धर्म कोई निजी या गौण विषय नहीं, बल्कि गरिमा, निजता, स्वास्थ्य, समानता और शिक्षा से जुड़ा एक मूल मानव अधिकार है। संविधान का अनुच्छेद 21 तब अधूरा रह जाता है, जब राज्य किसी बालिका को उसके जैविक यथार्थ के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य या सामाजिक सहभागिता से वंचित रहने देता है। अदालत की यह टिप्पणी कि “मासिक धर्म प्रबंधन की सुविधाओं से वंचित होना किश...

Trump’s Claim on India Oil Deal: Energy Geopolitics, Russia Sanctions and India’s Strategic Autonomy

ट्रंप का भारत के साथ व्यापार समझौते का दावा: ऊर्जा भू-राजनीति, दबाव कूटनीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (भारत सरकार की पुष्टि के पूर्व लिखा गया यह लेख) प्रस्तावना फरवरी 2026 की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह दावा कि भारत ने एक व्यापार समझौते के तहत रूसी तेल की खरीद बंद करने और इसके स्थान पर अमेरिका तथा संभावित रूप से वेनेजुएला से अधिक तेल आयात करने पर सहमति जताई है, केवल एक द्विपक्षीय बयान भर नहीं है। यह दावा वैश्विक ऊर्जा राजनीति, प्रतिबंध-आधारित कूटनीति और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़े कई जटिल प्रश्नों को एक साथ सामने लाता है। विशेष रूप से तब, जब इस कथित समझौते की न तो भारत के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है और न ही पेट्रोलियम मंत्रालय ने। यह स्थिति एक बार फिर उस अंतर को उजागर करती है, जो अमेरिकी राजनीतिक वक्तव्यों और संस्थागत वास्तविकताओं के बीच अक्सर देखा जाता है। साथ ही, यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि क्या ऊर्जा व्यापार अब विशुद्ध आर्थिक निर्णय नहीं रह गया है, बल्कि एक शक्तिशाली भू-राजनीतिक हथियार बन चुका है। एकतरफा दावा और कूटनीतिक चुप्पी ट्रंप ने पत...

India Energy Week 2026 Goa: Trump’s Absence, Energy Diplomacy and the Rise of a New Multipolar World Order

ट्रंप के बाद की दुनिया: गोवा में उभरी बहुध्रुवीय ऊर्जा राजनीति भारत एनर्जी वीक (IEW) 2026, जो गोवा के ONGC एडवांस्ड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में 27 से 30 जनवरी तक आयोजित हुआ, मात्र एक ऊर्जा सम्मेलन नहीं रहा। यह वैश्विक व्यवस्था में गहन बदलाव का जीवंत साक्ष्य बन गया, जहां अमेरिका-केंद्रित एकध्रुवीय ढांचे की जगह बहुध्रुवीय वास्तविकता ने मजबूती से पकड़ बनानी शुरू कर दी। इस मंच पर ऊर्जा केवल ईंधन या बिजली का स्रोत नहीं रही, बल्कि भू-राजनीतिक शक्ति-संतुलन का प्रमुख माध्यम बनी। सम्मेलन की शुरुआत से ही चर्चाएं ऊर्जा संक्रमण से आगे बढ़कर वैश्विक व्यवस्था के पुनर्गठन पर केंद्रित हो गईं। कनाडा के ऊर्जा मंत्री टिम हॉजसन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज की दुनिया में जो हो रहा है, वह "कोई धीमा आर्थिक संक्रमण नहीं, बल्कि एक बड़ा विद्रूप (rupture)" है। यह टिप्पणी डावोस में कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के उस बयान की गूंज थी, जिसमें उन्होंने postwar अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की "मृत्यु" की घोषणा की थी। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की "अमेरिका फर्स्ट" नीतियां—टैरिफ को रण...