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भारत में गिग वर्कर्स की पीड़ा: क्विक कॉमर्स और 10 मिनट डिलीवरी संकट का विश्लेषण डिजिटल क्रांति ने जिस सबसे बड़े सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को जन्म दिया है, उसका एक प्रमुख रूप है—गिग इकोनॉमी। ऐप-आधारित प्लेटफॉर्म्स ने काम को “ऑन-डिमांड” बना दिया है, जहाँ नौकरी स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी कार्यों की शृंखला है। उबर, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट और ज़ोमैटो जैसे प्लेटफॉर्म्स इस मॉडल के प्रतीक हैं। पहली नज़र में यह व्यवस्था युवाओं को लचीलापन, तुरंत कमाई और तकनीक से जुड़ने का अवसर देती है, लेकिन इसी चमकदार परत के नीचे गिग वर्कर्स की पीड़ा, असुरक्षा और संघर्ष की एक लंबी कहानी छिपी है। भारत में यह समस्या विशेष रूप से क्विक कॉमर्स सेक्टर में दिखाई देती है, जहाँ “10 मिनट में डिलीवरी” जैसे वादों ने उपभोक्ताओं को तो सुविधा दी, लेकिन डिलीवरी पार्टनर्स के जीवन को जोखिम में डाल दिया। यह केवल तेज डिलीवरी का सवाल नहीं है, बल्कि यह उस आर्थिक मॉडल का सवाल है जो मुनाफे को श्रमिकों की सुरक्षा से ऊपर रखता है। गिग इकोनॉमी: अवसर और विरोधाभास गिग इकोनॉमी का मूल आकर्षण है—लचीलापन। कोई भी व्यक्ति अपनी सु...