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Sonam Wangchuk’s Detention and Preventive Laws: Supreme Court Scrutiny of NSA and Democratic Dissent
सोनम वांगचुक की हिरासत: निवारक कानून, लोकतांत्रिक विरोध और संवैधानिक संतुलन भारत के संवैधानिक लोकतंत्र में निवारक हिरासत हमेशा एक असहज अपवाद रही है—ऐसा अपवाद, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर स्वीकार तो किया गया, लेकिन जिसकी वैधता निरंतर न्यायिक निगरानी पर निर्भर करती है। लद्दाख के सामाजिक-शैक्षिक कार्यकर्ता और जलवायु चिंतक सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत ने इसी असहजता को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। यह मामला केवल एक व्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं है, बल्कि राज्य की शक्ति, नागरिक अधिकारों, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और संवैधानिक नैतिकता के बीच संतुलन की परीक्षा भी है। पृष्ठभूमि: लद्दाख की आकांक्षाएँ और आंदोलन 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को संघ शासित प्रदेश का दर्जा मिला। इसके बाद से ही लद्दाख में दो प्रमुख मांगें उभरकर सामने आईं— पूर्ण राज्य का दर्जा , और संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत संरक्षण , ताकि आदिवासी पहचान, भूमि और सांस्कृतिक अधिकार सुरक्षित रह सकें। सोनम वांगचुक इन मांगों के सबसे मुखर और नैत...