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ध्वज के साए में पाँच वर्ष: अफ़ग़ानिस्तान के नए अध्याय का दोहरा सच काबुल की धूल भरी सड़कों पर, यह शहर एक गहरे अंतरद्वंद्व को जी रहा है। एक तरफ देखें तो जीत की नुमाइश करती एक सत्ता दिखाई देती है: हवा में लहराते विशाल बैनर, करीने से आयोजित सैन्य परेड और एक महाशक्ति के जाने के बाद पीछे छूटे घातक हथियारों का भयानक प्रभाव। दूसरी तरफ देखें तो ज़िंदा रहने की एक शांत, हताश जंग नज़र आती है। तालिबान की सत्ता में वापसी के पाँच साल बाद, नेतृत्व का "भव्य जश्न" अफ़ग़ानिस्तान की जनता पर टूटे मानवीय संकट से बिल्कुल अलग थलग खड़ा है। एक विश्लेषक के लिए सवाल अब यह नहीं रहा कि तालिबान ने सत्ता कैसे हासिल की, बल्कि सवाल यह है कि वे एक ऐसे देश पर शासन कैसे चलाएंगे जहाँ "सफलता" का दायरा सैन्य परेडों तक सीमित है, जबकि जनता एक अभूतपूर्व आर्थिक तबाही का सामना कर रही है। "स्थिरता" और अस्तित्व का विरोधाभास बीते आधे दशक को लेकर तालिबान का यही दावा रहा है कि उन्होंने देश को पूरी तरह बहाल कर दिया है। वे दशकों लंबे गृहयुद्ध के खात्मे और एक "मजबूत केंद्रीय सरकार" की स्थापना को अप...