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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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Is International Law Dying? Russia’s Reaction to US–Israel Strikes on Iran and the Crisis of the Global Order

अंतरराष्ट्रीय कानून की “मृत्यु” का प्रश्न: ईरान पर अमेरिका–इज़रायल हमलों के बाद रूस के बयान का वैश्विक संदर्भ

प्रस्तावना

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित वैश्विक व्यवस्था का मूल आधार यह था कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नियमों और संस्थाओं के माध्यम से नियंत्रित किया जाएगा, न कि केवल शक्ति के बल पर। 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के साथ जिस “नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था” की कल्पना की गई थी, उसका उद्देश्य था—युद्ध की पुनरावृत्ति रोकना, राष्ट्रों की संप्रभुता की रक्षा करना और वैश्विक शांति को संस्थागत आधार देना।

किन्तु 2026 में ईरान पर अमेरिका और इज़रायल द्वारा किए गए संयुक्त सैन्य हमलों के बाद इस व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। इसी संदर्भ में रूस ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून “व्यवहारिक रूप से मृत” हो चुका है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव का यह बयान केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं था, बल्कि उसने वैश्विक शासन की संरचना और उसकी सीमाओं पर व्यापक बहस को जन्म दिया।

यह प्रश्न केवल ईरान या पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक संकट की ओर संकेत करता है जिसमें शक्ति की राजनीति और नियम-आधारित व्यवस्था के बीच संघर्ष लगातार तीव्र होता जा रहा है। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि क्या वास्तव में अंतरराष्ट्रीय कानून समाप्त हो रहा है, या यह केवल वैश्विक राजनीति के बदलते संतुलन का परिणाम है।


पश्चिम एशिया का संकट और ईरान पर हमलों की पृष्ठभूमि

पश्चिम एशिया लंबे समय से भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है। इस क्षेत्र में धार्मिक विभाजन, ऊर्जा संसाधनों की प्रचुरता, और बाहरी शक्तियों की रणनीतिक रुचि ने इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक संवेदनशील क्षेत्र बना दिया है।

2026 में अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान के सैन्य और परमाणु प्रतिष्ठानों पर किए गए हमलों ने इस क्षेत्र में तनाव को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया। इन हमलों के पीछे मुख्यतः तीन रणनीतिक कारक बताए जाते हैं।

पहला, ईरान का परमाणु कार्यक्रम। इज़रायल और अमेरिका लंबे समय से यह आरोप लगाते रहे हैं कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हो सकता है।

दूसरा, इज़रायल की सुरक्षा चिंताएँ। इज़रायल का मानना है कि ईरान और उसके सहयोगी समूह, विशेषकर हिज़्बुल्लाह और अन्य प्रॉक्सी संगठनों के माध्यम से, उसके अस्तित्व के लिए चुनौती प्रस्तुत करते हैं।

तीसरा, अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति। पश्चिम एशिया में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति लंबे समय से शक्ति संतुलन बनाए रखने और ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने से जुड़ी रही है।

इन हमलों के बाद ईरान में कई उच्च सैन्य अधिकारियों की मृत्यु की खबरें सामने आईं, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई। रूस ने इस कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया और इसे “राजनीतिक हत्या” की संज्ञा दी।

इस घटनाक्रम ने यह प्रश्न उठाया कि क्या ऐसी सैन्य कार्रवाइयाँ संयुक्त राष्ट्र चार्टर की उस व्यवस्था के अनुरूप हैं, जो बल प्रयोग को केवल दो स्थितियों में वैध मानती है—आत्मरक्षा या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति।


रूस की प्रतिक्रिया और उसका राजनीतिक अर्थ

रूस की प्रतिक्रिया केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं थी; इसके पीछे एक व्यापक रणनीतिक संदेश निहित था।

क्रेमलिन के अनुसार, जब शक्तिशाली राष्ट्र स्वयं अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करते हैं, तब वैश्विक व्यवस्था की विश्वसनीयता कमजोर हो जाती है। रूस ने यह तर्क दिया कि यदि नियमों को केवल राजनीतिक सुविधा के आधार पर लागू किया जाएगा, तो अंतरराष्ट्रीय कानून की वैधता धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।

रूस ने इस संदर्भ में एक और प्रस्ताव को पुनर्जीवित किया—संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों की शिखर बैठक का विचार। यह प्रस्ताव राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन द्वारा पहले भी रखा गया था, जिसका उद्देश्य था कि वैश्विक शक्तियाँ सीधे संवाद के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों पर सहमति विकसित करें।

हालांकि इस प्रस्ताव को कुछ विश्लेषक रूस की रणनीतिक पहल मानते हैं, जिसका उद्देश्य अमेरिका-प्रधान वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देना और एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को प्रोत्साहित करना है।


अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाएँ

ईरान संकट ने अंतरराष्ट्रीय कानून की कुछ संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर किया है।

सबसे प्रमुख समस्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना है। पाँच स्थायी सदस्यों को प्राप्त वीटो शक्ति के कारण कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव अवरुद्ध हो जाते हैं। यह व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शक्ति संतुलन को ध्यान में रखकर बनाई गई थी, लेकिन आज यह अक्सर वैश्विक निर्णय प्रक्रिया को बाधित करती है।

दूसरी समस्या चयनात्मक अनुपालन की है। कई बार शक्तिशाली राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन तब करते हैं जब वह उनके हितों के अनुकूल होता है, और जब ऐसा नहीं होता तो वे उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं।

तीसरी समस्या प्रवर्तन तंत्र की कमजोरी है। अंतरराष्ट्रीय कानून के पास कोई वैश्विक “पुलिस शक्ति” नहीं है। इसके अनुपालन का आधार मुख्यतः राजनीतिक इच्छाशक्ति और अंतरराष्ट्रीय दबाव होता है।


अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांतों के संदर्भ में विश्लेषण

इस संकट को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विभिन्न सैद्धांतिक दृष्टिकोण उपयोगी हो सकते हैं।

यथार्थवाद (Realism) का दृष्टिकोण यह कहता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मूल आधार शक्ति है। इस दृष्टिकोण के अनुसार राज्य अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हैं और कानून या संस्थाएँ केवल सीमित भूमिका निभाती हैं। अमेरिका और इज़रायल की कार्रवाई को इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह शक्ति संतुलन की राजनीति का एक उदाहरण प्रतीत होती है।

इसके विपरीत उदारवादी दृष्टिकोण (Liberalism) यह मानता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और सहयोग वैश्विक शांति को बढ़ावा दे सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और जलवायु समझौते जैसे संस्थागत ढाँचे इस विचारधारा की अभिव्यक्ति हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, भले ही चुनौतियाँ हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून अभी भी वैश्विक व्यवस्था के लिए आवश्यक है।

तीसरा दृष्टिकोण संरचनावाद (Constructivism) का है, जो यह मानता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल शक्ति संतुलन से नहीं बल्कि विचारों, मानदंडों और पहचान से भी प्रभावित होती है। यदि वैश्विक शक्तियाँ नियमों को लगातार कमजोर करती रहें, तो अंतरराष्ट्रीय मानदंड भी धीरे-धीरे क्षीण हो सकते हैं।


क्या वास्तव में अंतरराष्ट्रीय कानून समाप्त हो रहा है?

रूस का यह दावा कि अंतरराष्ट्रीय कानून “मृत” हो चुका है, एक अतिशयोक्ति भी हो सकता है और चेतावनी भी।

एक ओर यह सत्य है कि हाल के वर्षों में कई बड़े संघर्षों ने नियम-आधारित व्यवस्था की सीमाओं को उजागर किया है। इराक युद्ध, लीबिया हस्तक्षेप और यूक्रेन युद्ध जैसे उदाहरणों ने दिखाया है कि शक्तिशाली राष्ट्र कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय नियमों की अवहेलना करते हैं।

दूसरी ओर यह भी तथ्य है कि अंतरराष्ट्रीय कानून पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों के निर्णय, जलवायु समझौते, व्यापार नियम और मानवाधिकार संधियाँ अभी भी वैश्विक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

वास्तव में समस्या कानून की अनुपस्थिति नहीं बल्कि उसके अनुपालन की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है।


निष्कर्ष

ईरान पर अमेरिका और इज़रायल के हमलों के बाद रूस का बयान वैश्विक राजनीति में गहराते संकट की ओर संकेत करता है। यह संकट केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि उस व्यापक प्रश्न से जुड़ा है कि क्या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था वास्तव में नियमों पर आधारित है या शक्ति पर।

यदि शक्तिशाली राष्ट्र नियमों को केवल अपनी सुविधा के अनुसार लागू करेंगे, तो अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता धीरे-धीरे क्षीण हो सकती है। ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि वैश्विक शक्तियाँ संवाद और सहयोग के माध्यम से संस्थागत ढांचे को मजबूत करें।

अंततः अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रासंगिकता इस बात पर निर्भर करेगी कि विश्व समुदाय उसे साझा जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करता है या केवल राजनीतिक साधन के रूप में उपयोग करता है। यदि यह साझा जिम्मेदारी कमजोर पड़ती है, तो वैश्विक व्यवस्था शक्ति की प्रतिस्पर्धा के एक ऐसे दौर में प्रवेश कर सकती है जहां स्थिरता और शांति दोनों ही अधिक अनिश्चित हो जाएँगी।

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