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The Slow Decline of Traditional Stardom: How OTT, Social Media, and Content-Driven Cinema Are Reshaping the Future of Films
सिनेमा में स्टारडम का क्षरण: बदलते समय की एक सांस्कृतिक व्याख्या सिनेमा की दुनिया में “स्टार” हमेशा से एक चमकता हुआ मिथक रहा है—एक ऐसा आकर्षण जो दर्शकों को कहानी से पहले स्क्रीन पर दिखाई देने वाले चेहरे के प्रति खींच ले जाता था। भारतीय और वैश्विक फिल्म इतिहास में कई दशक ऐसे रहे हैं जब किसी फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना उसका अभिनेता होता था। हालांकि, 21वीं सदी के तीसरे दशक में यह परिदृश्य निर्णायक रूप से बदल रहा है। डिजिटल क्रांति, दर्शकों की परिपक्वता, ओटीटी का उदय और कंटेंट-आधारित कथा-परंपराओं ने पारंपरिक स्टारडम को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया है। प्रश्न यह नहीं है कि स्टारडम खत्म क्यों हो रहा है, बल्कि यह है कि उसकी संरचना किस प्रकार नए रूप में विकसित हो रही है। स्टारडम का पुराना मॉडल: रहस्य, दूरी और आकर्षण बीते समय में स्टारडम केवल अभिनय कौशल का परिणाम नहीं था; यह सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक संरचनाओं का सम्मिश्रण था। भारत में 1950–90 के दशक के बीच राज कपूर, देव आनंद, दिलीप कुमार और बाद में अमिताभ बच्चन ने जिस तरह का रुऔब स्थापित किया, वह स्क्रीन और समाज दोनों में प्रभाव पैद...