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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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India’s Silence on Iran Supreme Leader Assassination: Strategic Neutrality or Foreign Policy Abdication?

भारत की चुप्पी या कूटनीतिक विचलन? ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या पर विदेश नीति की बड़ी परीक्षा

सन्दर्भ- सोनिया गांधी का ओपिनियन लेख: ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या पर भारत सरकार की चुप्पी मात्र तटस्थता नहीं, बल्कि सिद्धांतों से पीछे हटना है

3 मार्च 2026 को Sonia Gandhi द्वारा The Indian Express में प्रकाशित लेख—“Government’s silence on killing of Iran leader is not neutral, it is abdication”—सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति की आत्मा पर उठाया गया प्रश्न है। 1 मार्च 2026 को ईरान के सुप्रीम लीडर Ayatollah Ali Khamenei की लक्षित हत्या ने पश्चिम एशिया को एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। अमेरिका–इज़राइल की संयुक्त कार्रवाई और उसके बाद ईरान की जवाबी प्रतिक्रिया ने क्षेत्रीय तनाव को वैश्विक संकट में बदल दिया है।

इस पृष्ठभूमि में भारत सरकार की चुप्पी—या सीमित शब्दों में व्यक्त “गहरी चिंता”—को लेकर उठे प्रश्न महज़ विपक्ष की आलोचना नहीं हैं; वे उस नैतिक और रणनीतिक संतुलन पर केंद्रित हैं जिसने दशकों तक भारत की विदेश नीति को दिशा दी है।


चुप्पी: तटस्थता या त्याग?

संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) किसी भी राज्य की संप्रभुता के विरुद्ध बल प्रयोग या उसकी धमकी को निषिद्ध करता है। एक जीवित राष्ट्राध्यक्ष की लक्षित हत्या—वह भी औपचारिक युद्ध की घोषणा के बिना—अंतरराष्ट्रीय कानून की उस संरचना को चुनौती देती है, जिस पर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की विश्व-व्यवस्था टिकी है।

भारत ने परंपरागत रूप से संप्रभु समानता, गैर-हस्तक्षेप और शांतिपूर्ण विवाद समाधान का समर्थन किया है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने की बात करता है। ऐसे में यदि नई दिल्ली इस घटना की स्पष्ट निंदा से बचती है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह रणनीतिक विवेक है या सिद्धांतों से पीछे हटना?

विदेश नीति में मौन कभी-कभी रणनीतिक होता है। किंतु जब मौन किसी बुनियादी सिद्धांत—संप्रभुता और कानून-आधारित व्यवस्था—पर पड़ता है, तब वह तटस्थता से अधिक त्याग प्रतीत होता है।


गुटनिरपेक्षता की विरासत और रणनीतिक स्वायत्तता

भारत की गुटनिरपेक्षता निष्क्रिय तटस्थता नहीं थी; वह सक्रिय नैतिकता और रणनीतिक स्वायत्तता का संगम थी। शीत युद्ध के दौरान नई दिल्ली ने दोनों गुटों से दूरी रखते हुए सिद्धांतों पर आधारित रुख अपनाया।

आज भारत “वैश्विक दक्षिण” की आवाज़ बनने की आकांक्षा रखता है। G20 की अध्यक्षता के दौरान “वसुधैव कुटुंबकम” का उद्घोष किया गया। किंतु यदि नियम-आधारित व्यवस्था के क्षरण पर भारत स्पष्ट रुख नहीं लेता, तो उसकी नैतिक विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

यहाँ प्रश्न यह नहीं कि भारत को अमेरिका या इज़राइल के साथ संबंध तोड़ने चाहिए। प्रश्न यह है कि क्या संबंधों की मजबूती सिद्धांतों की कीमत पर होनी चाहिए? रणनीतिक साझेदारियाँ और नैतिक स्पष्टता—दोनों एक साथ संभव हैं, यदि कूटनीति संतुलित और साहसी हो।


ईरान: केवल ऊर्जा नहीं, भू-रणनीतिक साझेदार

भारत–ईरान संबंध ऊर्जा आपूर्ति से कहीं आगे जाते हैं। 1990 के दशक में कश्मीर पर ओआईसी के प्रस्ताव को रोकने में तेहरान की भूमिका भारत के लिए निर्णायक रही।

Iran के साथ चाबहार पोर्ट और ज़ाहेदान रेल परियोजना भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक वैकल्पिक पहुँच प्रदान करती है—विशेषकर Pakistan और चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच। 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee की तेहरान यात्रा ने इस रणनीतिक साझेदारी को औपचारिक रूप दिया था।

आज जब पश्चिम एशिया अस्थिर है, भारत के लगभग एक करोड़ प्रवासी नागरिक खाड़ी देशों में कार्यरत हैं। किसी भी व्यापक संघर्ष का सीधा प्रभाव उनकी सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इसलिए यह केवल नैतिक विमर्श नहीं, बल्कि व्यावहारिक हितों का भी प्रश्न है।


दोहरे संतुलन की चुनौती

भारत के इज़राइल के साथ रक्षा, कृषि और प्रौद्योगिकी संबंध मजबूत हैं। परंतु इसी कारण नई दिल्ली की भूमिका मध्यस्थ या संतुलनकारी हो सकती है। यदि भारत दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखे, तो वह तनाव कम करने में योगदान दे सकता है।

किन्तु ऐसी भूमिका तभी संभव है जब दोनों पक्ष भारत को निष्पक्ष और सिद्धांतनिष्ठ मानें। मौन या अस्पष्ट प्रतिक्रिया इस विश्वास को कमजोर कर सकती है।


संसद और सार्वजनिक विमर्श की आवश्यकता

लोकतांत्रिक व्यवस्था में विदेश नीति केवल कार्यपालिका का विशेषाधिकार नहीं हो सकती। संसद में खुली बहस से न केवल पारदर्शिता बढ़ती है, बल्कि राष्ट्रीय सहमति भी निर्मित होती है।

यदि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में नियमों का क्षरण हो रहा है, तो भारत जैसे लोकतंत्र की जिम्मेदारी है कि वह स्पष्ट रूप से बताए कि उसका रुख क्या है। यह केवल कूटनीतिक बयानबाज़ी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश है।


निष्कर्ष: विवेक-रक्षक की भूमिका

“वसुधैव कुटुंबकम” कोई औपचारिक नारा नहीं, बल्कि एक नैतिक प्रतिज्ञा है। विश्व-व्यवस्था जब शक्ति-राजनीति की ओर झुक रही हो, तब भारत का दायित्व है कि वह विवेक-रक्षक की भूमिका निभाए।

सिद्धांत और शक्ति के बीच संतुलन ही विदेश नीति की कसौटी है। यदि भारत वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करना चाहता है, तो उसे केवल आर्थिक या सामरिक क्षमता से नहीं, बल्कि नैतिक स्पष्टता से भी आगे आना होगा।

ईरान संकट पर भारत की प्रतिक्रिया—या उसकी कमी—भविष्य में उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को आकार देगी। प्रश्न यह नहीं कि भारत किसके साथ है; प्रश्न यह है कि भारत किस सिद्धांत के साथ खड़ा है।

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