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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Iran’s Dual Reality: Social Liberalization and Political Repression

ईरान में सामाजिक प्रतिबंधों की ढील और राजनीतिक दमन की बढ़ती सख्ती: एक द्वंद्वात्मक विश्लेषण परिचय ईरान इन दिनों एक गहरे राजनीतिक और सामाजिक द्वंद्व से गुजर रहा है। एक ओर सरकार ने सार्वजनिक रूप से सामाजिक प्रतिबंधों, विशेष रूप से हिजाब कानून के प्रवर्तन में ढील देकर सुधारों का आभास कराया है; वहीं दूसरी ओर, राजनीतिक असहमति और नागरिक स्वतंत्रता पर नियंत्रण को पहले से अधिक सख्त बना दिया गया है। यह परिघटना न केवल ईरान की आंतरिक सत्ता-संरचना को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि किस प्रकार एक अधिनायकवादी शासन "नियंत्रित उदारीकरण" के माध्यम से असंतोष को शांत करने की कोशिश करता है, जबकि असहमति की जड़ों को व्यवस्थित रूप से कुचलता जाता है। रॉयटर्स की हालिया रिपोर्ट (2025) के अनुसार, ईरान में कार्यरत कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुष्टि की है कि "धार्मिक शासन भय और निगरानी की नीति के ज़रिए किसी भी संभावित विद्रोह को समय से पहले निष्प्रभावी बनाने में जुटा है।" यह नीति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि सामाजिक ढील का उद्देश्य जनतांत्रिक उदारीकरण नहीं, बल्कि शासन की वैधता और स्था...

US Grants India a Six-Month Sanctions Waiver on Iran’s Chabahar Port: Strategic and Geopolitical Implications

भारत को ईरान के चाबाहार बंदरगाह पर अमेरिकी प्रतिबंधों से छह महीने की छूट: भू-राजनीतिक और रणनीतिक निहितार्थ परिचय भारत की विदेश नीति में चाबाहार बंदरगाह हमेशा से एक ऐसा प्रतीक रहा है जो उसकी रणनीतिक स्वायत्तता, क्षेत्रीय दृष्टि और पश्चिम एशिया के साथ गहराते संबंधों को दर्शाता है। 30 अक्टूबर 2025 को भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा यह घोषणा कि अमेरिका ने चाबाहार बंदरगाह परियोजना से जुड़े कार्यों पर लगाए गए प्रतिबंधों से भारत को छह महीने की छूट प्रदान की है , वैश्विक कूटनीति में भारत की बढ़ती विश्वसनीयता का प्रमाण है। यह छूट ऐसे समय में आई है जब पश्चिम एशिया में ईरान-इजराइल तनाव , अफगानिस्तान में तालिबान शासन , तथा भारत-चीन प्रतिस्पर्धा क्षेत्रीय समीकरणों को जटिल बना रहे हैं। इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि वाशिंगटन भारत को न केवल एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में बल्कि एक विश्वसनीय स्थिरता प्रदाता के रूप में भी देख रहा है। इस विश्लेषण में हम इस छूट की पृष्ठभूमि, इसके भू-राजनीतिक महत्व, रणनीतिक लाभ, और संभावित चुनौतियों का अध्ययन करेंगे। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि चाबाहार बंदरगाह ईरान के सिस्त...

Iran’s Hijab Protests After Mahsa Amini: A Historic Turning Point in Social and Cultural Transformation

महसा अमीनी के बाद ईरान में अनिवार्य हिजाब के विरुद्ध खुला प्रतिरोध: सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन की दिशा में एक ऐतिहासिक विकास सारांश (Abstract) महसा अमीनी की मृत्यु के पश्चात् ईरान में उभरा “महिला, जीवन, स्वतंत्रता” आंदोलन अब केवल क्षणिक जनआक्रोश नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक चेतना के दीर्घकालिक पुनर्गठन का प्रतीक बन चुका है। तीन वर्षों में यह प्रतिरोध राजधानी तेहरान से निकलकर छोटे नगरों और परंपरागत रूप से रूढ़िवादी क्षेत्रों तक फैल गया है। यह लेख स्थानीय समाचार, सोशल मीडिया सामग्री, साक्षात्कारों और उपलब्ध अकादमिक अध्ययनों के आधार पर यह विश्लेषण करता है कि अनिवार्य हिजाब-विरोध अब किस प्रकार एक व्यापक सामाजिक विमर्श में परिवर्तित हो गया है, जो न केवल लैंगिक समानता की मांग करता है बल्कि शासन की वैचारिक वैधता को भी चुनौती देता है। 1. परिचय (Introduction) सितंबर 2022 में महसा अमीनी, एक 22 वर्षीय कुर्द-ईरानी युवती, को ईरान की मोरैलिटी पुलिस ने कथित रूप से “अनुचित तरीके से हिजाब पहनने” के आरोप में हिरासत में लिया। कुछ ही घंटों बाद उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने न केवल घरेलू बल्कि वैश्वि...

Tensions in Iran-US Relations and the 1979 Islamic Revolution

  ईरान-अमेरिका संबंधों में तनाव और 1979 की इस्लामिक क्रांति 1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति ने न केवल ईरान के राजनीतिक ढांचे को बदल दिया, बल्कि यह वैश्विक राजनीति पर भी गहरा असर डालने वाली घटना साबित हुई। इस क्रांति ने शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासन को समाप्त कर दिया, जो अमेरिका का करीबी सहयोगी था, और ईरान में एक इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की। इस क्रांति के बाद, ईरान और अमेरिका के संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे, और यह तनाव आज भी जारी है, जैसा कि हाल ही में ईरान के राष्ट्रपति द्वारा डोनाल्ड ट्रंप पर आरोप लगाए गए थे कि वे ईरान को "घुटनों पर लाने" की कोशिश कर रहे हैं। ईरान-अमेरिका संबंधों का ऐतिहासिक संदर्भ ईरान और अमेरिका के रिश्तों का इतिहास बहुत जटिल और उलझा हुआ है। 1950 के दशक में, अमेरिका ने ईरान में एक अहम भूमिका निभाई थी, खासकर शाह के शासन को मजबूत करने में। 1953 में, CIA ने एक ऑपरेशन के तहत ईरान के प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दिक को अपदस्थ कर दिया था, क्योंकि वे पश्चिमी तेल कंपनियों के हितों के खिलाफ जा रहे थे। इसके बाद शाह का शासन और मजबूत हुआ और उन्होंने पश्चिमी देशो...

Trump’s 25% Tariff on Iran Traders: What It Means for India and Global Trade

ट्रंप का 25% टैरिफ: ईरान व्यापार करने वाले देशों पर असर और भारत की रणनीतिक चुनौती भूमिका 13 जनवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को झकझोर देने वाली घोषणा की। उन्होंने कहा कि जो भी देश ईरान के साथ व्यापार करेगा, उसे अमेरिका के साथ अपने पूरे व्यापार पर 25% अतिरिक्त टैरिफ देना होगा। यह आदेश “तुरंत प्रभावी” बताया गया और इसे ट्रंप ने “अंतिम और निर्णायक कदम” कहा। यह घोषणा ऐसे समय आई है जब ईरान में सरकार विरोधी हिंसक प्रदर्शन चल रहे हैं और सैकड़ों लोगों की मौत की खबरें आ चुकी हैं। अमेरिका इस अस्थिरता के बीच ईरान पर अधिकतम दबाव बनाना चाहता है, लेकिन इसका असर सीधे उन देशों पर पड़ेगा जो ईरान के साथ व्यापार करते हैं—जिनमें भारत भी शामिल है। यह टैरिफ सीधे ईरान पर नहीं, बल्कि उसके व्यापारिक साझेदारों पर लगाया गया है, इसलिए इसे “सेकेंडरी सैंक्शन” जैसा कदम माना जा रहा है। इसका मतलब है कि किसी तीसरे देश को ईरान से व्यापार करने की सजा अमेरिका के साथ उसके व्यापार में दी जाएगी। वैश्विक संदर्भ: दबाव की राजनीति अमेरिका की यह रणनीति नई नहीं है। पहले भी वह ईरान, र...

FIFA World Cup 2026 Draw Analysis: Geopolitical Expansion, Key Groups, and Global Football Implications

The FIFA World Cup 2026 Draw: Geopolitical Expansion, Competitive Dynamics, and the Future of Global Football Governance Introduction FIFA विश्व कप केवल एक खेल आयोजन नहीं है; यह वैश्विक राजनीति, सांस्कृतिक कूटनीति, आर्थिक निवेश और पहचान की अभिव्यक्ति का सबसे प्रभावशाली मंच है। वर्ष 2026 का संस्करण इस परंपरा में एक ऐतिहासिक मोड़ प्रस्तुत करता है — 48 टीमों तक विस्तार, 104 मैच, और एक अभूतपूर्व त्रि-देशीय मेजबानी मॉडल (कनाडा, मेक्सिको और संयुक्त राज्य अमेरिका)। दिसंबर 2025 में वॉशिंगटन डी.सी. के केनेडी सेंटर में हुए ड्रॉ ने न केवल समूहों का निर्धारण किया, बल्कि FIFA के दीर्घकालिक भू-राजनीतिक लक्ष्यों को भी रेखांकित किया — विशेषकर एशिया, अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका में फुटबॉल के बाज़ार विस्तार की रणनीति को। विस्तार को लेकर खेल गुणवत्ता, खिलाड़ी कल्याण, लॉजिस्टिक्स और वित्तीय असमानताओं पर उठाई गई चिंताओं के बीच, ड्रॉ समारोह इस वैश्विक आयोजन की बदलती प्रकृति का दर्पण साबित हुआ। The Ceremonial and Structural Context: Symbolism, Politics, and FIFA’s Strategic Vision ड्रॉ का आयोजन केनेडी स...

Iran Protest Attack in USA: Radicalism, Diaspora Politics and the Crisis of Global Democracy

अमेरिका में ईरान-विरोधी रैली पर हमला राजनीतिक कट्टरता, प्रवासी राजनीति और वैश्विक लोकतंत्र की चुनौतियाँ (ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ समग्र विश्लेषणात्मक लेख) भूमिका: विरोध से हिंसा तक की यात्रा लोकतंत्र की आत्मा विरोध में बसती है। विचारों का टकराव, सत्ता से असहमति और सार्वजनिक मंचों पर असंतोष की अभिव्यक्ति—यही किसी भी जीवंत लोकतांत्रिक समाज की पहचान है। लेकिन जब यही विरोध हिंसा में बदल जाए, तो वह लोकतंत्र की शक्ति नहीं, उसकी कमजोरी बन जाता है। 12 जनवरी 2026 को अमेरिका के लॉस एंजेलिस में हुई घटना इसी त्रासदी का प्रतीक है। ईरान की राजशाही समर्थक और सर्वोच्च नेता अली खामेनेई-विरोधी रैली के दौरान एक ट्रक भीड़ में घुस गया, जिससे लोग घायल हुए और पूरे विश्व का ध्यान एक बार फिर इस प्रश्न पर गया—क्या वैश्वीकृत दुनिया में कोई भी राजनीतिक संघर्ष अब “स्थानीय” रह गया है? यह घटना केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं थी, बल्कि इतिहास, प्रवास, वैचारिक टकराव और वैश्विक राजनीति के कई धागों से बुनी हुई एक जटिल कहानी थी। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ईरान का अधूरा संघर्ष ईरान का आधुनिक राजनीतिक इतिहास अस्थिरता और ...

Iran-US Nuclear Tension: A Threat to Global Peace or a Test of Diplomacy?

🌍 ईरान-अमेरिका परमाणु तनाव: विश्व शांति के लिए खतरा या कूटनीति की परीक्षा? ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु विवाद एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को दी गई बमबारी की धमकी ने इस तनाव को और बढ़ा दिया है। ट्रंप का यह बयान, "अगर ईरान समझौता नहीं करता है, तो उसे ऐसी बमबारी का सामना करना पड़ेगा, जो उसने पहले कभी नहीं देखी होगी", केवल बयानबाजी नहीं है, बल्कि पश्चिम एशिया में युद्ध की आशंका को और बल देता है। यह विवाद केवल दो देशों का नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव वैश्विक शांति, तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ सकते हैं। 🔥 परमाणु तनाव की पृष्ठभूमि: ईरान का परमाणु कार्यक्रम 1950 के दशक में अमेरिका के सहयोग से शुरू हुआ था। हालांकि, 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद दोनों देशों के संबंध बिगड़ गए। 2015 में ओबामा प्रशासन के दौरान अमेरिका, ईरान और अन्य पांच शक्तियों (P5+1) के बीच जॉइंट कम्प्रिहेन्सिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) हुआ। इसके तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमति जताई थी और बदले में उस पर लगे आर्थि...

Gaza and the American Plan: A Fault-line in West Asian Politics

गाज़ा पर अमेरिकी योजना: भारत और पश्चिम एशिया की राजनीति में निहितार्थ Context वॉशिंगटन पोस्ट की एक हालिया रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि ट्रंप प्रशासन एक ऐसी योजना पर विचार कर रहा है जिसके अंतर्गत गाज़ा की पूरी आबादी को कहीं और स्थानांतरित किया जाएगा और संयुक्त राज्य अमेरिका सीधे तौर पर इस क्षेत्र का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेगा। यदि यह योजना अमल में आती है, तो यह न केवल फिलिस्तीन के राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए बल्कि पूरे पश्चिम एशिया के सामरिक परिदृश्य के लिए भी एक भूकंपीय बदलाव होगा। The Humanitarian Dimension गाज़ा लंबे समय से मानवीय संकट का केंद्र रहा है। इज़राइल और हमास के बीच लगातार संघर्ष, आर्थिक नाकेबंदी और असुरक्षा ने यहाँ की जनता को संकटग्रस्त बना दिया है। पूरी आबादी का विस्थापन एक तरह से “जनसांख्यिकीय इंजीनियरिंग” होगी, जिसे अंतर्राष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार मानकों के गंभीर उल्लंघन के रूप में देखा जाएगा। यह कदम न केवल शरणार्थी संकट को बढ़ाएगा बल्कि अरब समाज में गहरी असंतुष्टि भी पैदा करेगा। Strategic Calculations Israel’s Security Gains : इस योजना से इज़राइल को गाज...

UPSC Current Affairs in Hindi : 14 April 2025

दैनिक समसामयिकी लेख संकलन: 14 अप्रैल 2025  1- भारत ने विकसित की अत्याधुनिक लेज़र-निर्देशित ऊर्जा हथियार प्रणाली: रक्षा क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि परिचय: भारत ने रक्षा क्षेत्र में एक और मील का पत्थर पार करते हुए अत्याधुनिक लेज़र-निर्देशित ऊर्जा हथियार प्रणाली (Laser-Directed Energy Weapon System) Mk-II(A) का सफल परीक्षण किया है। यह उपलब्धि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा रविवार को घोषित की गई। यह प्रणाली मिसाइलों, ड्रोन और अन्य छोटे प्रक्षेप्य को निष्क्रिय करने की अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित है। तकनीकी विशेषताएं: DRDO द्वारा विकसित Mk-II(A) प्रणाली उच्च शक्ति की लेज़र ऊर्जा का प्रयोग कर लक्ष्यों को भौतिक रूप से नष्ट नहीं करती, बल्कि उन्हें अकार्यक्षम बनाकर निष्क्रिय कर देती है। इस प्रणाली के माध्यम से कम दूरी पर अत्यंत सटीकता के साथ उड़ती हुई वस्तुओं को रोका जा सकता है। इसमें लेज़र बीम को लक्षित वस्तु पर केंद्रित कर उसकी कार्यप्रणाली को प्रभावित किया जाता है। रणनीतिक महत्त्व: इस सफलता ने भारत को उन गिने-चुने देशों की श्रेणी में शामिल कर दिया है, जिनके पास उच्च-शक्त...

Iran’s Water Crisis: The Cost of Self-Sufficiency and the Road Ahead

ईरान का जल-संकट: आत्मनिर्भरता की कीमत और भविष्य की दिशा मध्य पूर्व की भू-राजनीति में ईरान हमेशा ऊर्जा, तेल और क्षेत्रीय प्रभाव के कारण सुर्खियों में रहा है। लेकिन आज देश एक ऐसे संकट से जूझ रहा है जो न तो जटिल कूटनीति से हल हो सकता है, न ही कठोर प्रतिबंधों से—यह है पानी की तेज़ी से घटती उपलब्धता। नवंबर 2025 तक स्थिति इतनी दयनीय हो चुकी है कि देश के कई बड़े बाँध लगभग सूख चुके हैं और 15 मिलियन आबादी वाला तेहरान अभूतपूर्व पेयजल संकट के द्वार पर खड़ा है। राष्ट्रपति द्वारा राजधानी को आंशिक रूप से खाली करने की संभावना तक पर विचार किया जाना इस त्रासदी की भयावहता को उजागर करता है। कहाँ चूका ईरान? ईरान का यह संकट अचानक नहीं आया; यह दशकों से तैयार हो रही वह आपदा है जो जलवायु परिवर्तन और नीतिगत भूलों के संगम से विस्फोटित हुई है। 1. सूखा—लेकिन केवल मौसम की गलती नहीं पिछले पाँच वर्षों में औसत वर्षा सदी के न्यूनतम स्तर पर पहुँच गई। कुछ क्षेत्रों में बारिश सामान्य से आधी रह गई। लेकिन यदि ईरान का जल-तंत्र पहले से सुदृढ़ होता तो यह कमी इस कदर विनाशकारी साबित न होती। असली समस्या संरचनात्मक है—जिसे अ...

Iran–US Nuclear Talks in Oman 2026: Diplomacy, Deadlock and the Risk of Middle East Conflict

ओमान में ईरान–अमेरिका परमाणु वार्ता: कूटनीति की सतर्क शुरुआत मध्य पूर्व की भू-राजनीति में स्थिरता एक दुर्लभ अतिथि रही है, किंतु ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे जब सामने आते हैं, तो क्षेत्रीय अस्थिरता वैश्विक स्तर पर चिंता का विषय बन जाती है। 6 फरवरी 2026 को ओमान की राजधानी मस्कट में ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच अप्रत्यक्ष उच्च-स्तरीय वार्ता का आयोजन इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यह वार्ता महज द्विपक्षीय संवाद नहीं थी, अपितु यह परीक्षा थी कि क्या गहन अविश्वास और हाल के सैन्य टकरावों के बावजूद कूटनीति अभी भी प्रभावी विकल्प बनी हुई है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने वार्ता को “एक अच्छी शुरुआत” और “सकारात्मक” करार दिया, जबकि दोनों पक्षों ने आगे बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई। यह पहली ऐसी गंभीर कूटनीतिक पहल थी, जो 2025 में इजरायल-ईरान के बीच हुए 12-दिवसीय संघर्ष और अमेरिकी हमलों के बाद हुई। उस संघर्ष ने परमाणु स्थलों पर हमलों को जन्म दिया और क्षेत्र को युद्ध की कगार पर ला खड़ा किया था। ऐसे में मस्कट वार्ता ने संवाद की प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने का संकेत दिया, यद्यप...

America's Grand Comeback or Political Complacency?

डोनाल्ड ट्रंप के "अमेरिका की ऐतिहासिक वापसी" के दावे का गहराई से विश्लेषण करता यह संपादकीय लेख उनकी "अमेरिका फर्स्ट" नीति, आर्थिक सुधार, वैश्विक कूटनीति और सामाजिक विभाजन पर पड़ने वाले प्रभावों की आलोचनात्मक समीक्षा करता है। क्या यह सच में अमेरिका की महान वापसी है, या केवल राजनीतिक आत्ममुग्धता? जानिए इस विस्तृत और संतुलित विश्लेषण में। अमेरिका की ऐतिहासिक वापसी या राजनीतिक आत्ममुग्धता? डोनाल्ड ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान कई विवादास्पद निर्णय लिए, लेकिन उनका एक बयान विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है—"अमेरिका अब ऐसी वापसी की कगार पर है, जैसी दुनिया ने पहले कभी नहीं देखी होगी।" यह बयान न केवल उनके आत्मविश्वास को दर्शाता है, बल्कि अमेरिका की राजनीतिक, आर्थिक, और सामाजिक स्थिति पर भी व्यापक बहस को जन्म देता है। क्या वास्तव में अमेरिका एक अभूतपूर्व वापसी कर रहा है, या यह केवल एक राजनीतिक दंभ है? इस लेख में हम इस दावे का गहराई से विश्लेषण करेंगे और इसकी वास्तविकता को समझने की कोशिश करेंगे। ट्रंप का राष्ट्रवाद और "अमेरिका फर्स्ट" नीति डोन...

Iran Protests 2025–2026: Economic Crisis, Currency Crash and Rising Public Unrest

2025–2026 ईरान विरोध प्रदर्शन: आर्थिक संकट से उपजी जन-आक्रोश की नई लहर प्रस्तावना दिसंबर 2025 के उत्तरार्ध में शुरू होकर जनवरी 2026 तक जारी रहने वाले ईरान के विरोध प्रदर्शन केवल कुछ दिनों की असंतोष-लहर नहीं थे, बल्कि वे उस गहरे आर्थिक और सामाजिक संघर्ष का विस्फोट थे जो वर्षों से भीतर-ही-भीतर पनप रहा था। राजधानी तेहरान के बाजारों में दुकानदारों द्वारा शुरू हुआ यह आंदोलन जल्द ही छात्रों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग तक फैल गया। यह उभार 2022 के महसा अमीनी विरोधों के बाद सबसे बड़ा और सबसे व्यापक जन-आंदोलन माना जा रहा है, जहाँ आर्थिक पीड़ा राजनीतिक अविश्वास में बदलती हुई दिखाई दी। आर्थिक संकट: असंतोष की जड़ ईरान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से प्रतिबंधों, सीमित निवेश, तेल-राजस्व की अनिश्चितता और संस्थागत अक्षमताओं का बोझ ढो रही है। 2025 में इज़रायल के साथ 12-दिवसीय संघर्ष, वैश्विक कूटनीतिक दबाव और ऊर्जा व्यापार में गिरावट ने स्थिति को और नाजुक बना दिया। दिसंबर 2025 के अंत तक ईरानी रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक रूप से गिरकर लगभग 1.42–1.45 मिलियन रियाल प्रति डॉलर के स्त...

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परीक्षा पे चर्चा 2026: परीक्षा से आगे जीवन की तैयारी का राष्ट्रीय संवाद परीक्षा का समय आते ही देश के करोड़ों छात्रों के मन में एक ही सवाल गूंजने लगता है— क्या मैं सफल हो पाऊँगा? इसी प्रश्न, इसी तनाव और इसी अनिश्चितता को संवाद और आत्मविश्वास में बदलने का मंच है ‘परीक्षा पे चर्चा’ । 6 फरवरी 2026 को आयोजित परीक्षा पे चर्चा के 9वें संस्करण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों से सीधी बातचीत की। सुबह 10 बजे शुरू हुए इस कार्यक्रम में दिल्ली, गुजरात के देवमोगरा, तमिलनाडु के कोयंबटूर, छत्तीसगढ़ के रायपुर और असम के गुवाहाटी से जुड़े छात्रों ने भाग लिया। कार्यक्रम का लाइव प्रसारण दूरदर्शन, पीएम मोदी के यूट्यूब चैनल और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर किया गया। इस बार 4.5 करोड़ से अधिक रजिस्ट्रेशन होना यह दर्शाता है कि आज का छात्र केवल परीक्षा टिप्स नहीं, बल्कि जीवन मार्गदर्शन चाहता है। 🌱 सपने देखें, लेकिन एक्शन के साथ प्रधानमंत्री मोदी का संदेश बेहद स्पष्ट और प्रेरक था— “सपने न देखना जुर्म है, लेकिन सिर्फ सपनों की गुनगुनाहट से काम नहीं चलता।” उन्हों...

Civil–Military Relations in India: Security, Democracy and the Naravane Memoir Debate

जनरल एम.एम. नरवणे की आत्मकथा विवाद: सिविल–मिलिट्री संबंधों और भारतीय लोकतंत्र की कसौटी फरवरी 2026 में भारत की संसद से शुरू हुआ पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा “Four Stars of Destiny” से जुड़ा विवाद जल्द ही एक साधारण राजनीतिक बहस से आगे बढ़कर सिविल–मिलिट्री संबंधों, राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे गहरे संवैधानिक प्रश्नों का प्रतीक बन गया। यह घटना इस बात का उदाहरण है कि जब सेना, राजनीति और सार्वजनिक विमर्श एक-दूसरे से टकराते हैं, तो लोकतंत्र की संस्थागत परिपक्वता की वास्तविक परीक्षा होती है। विवाद की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम जनरल नरवणे (सेना प्रमुख: 2019–2022) की यह आत्मकथा उनके सैन्य जीवन के अनुभवों पर आधारित बताई जाती है, जिसमें 2020 का गलवान घाटी संघर्ष, चीन के साथ सीमा तनाव, अग्निपथ योजना जैसी सैन्य सुधार नीतियाँ और संकटकाल में राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका का उल्लेख कथित रूप से किया गया है। चूँकि भारत में सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों की पुस्तकों पर भी Official Secrets Act, 1923 और रक्षा मंत्रालय के दिशा-निर्देश लागू ...

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Reforming Global Governance: Strategic Significance of the G4 Countries’ Munich Meeting 2026

बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार: G4 देशों की म्यूनिख बैठक का ऐतिहासिक महत्व भूमिका: बदलती विश्व-व्यवस्था और सुधार की अनिवार्यता 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति गहन संक्रमण के दौर से गुजर रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित बहुपक्षीय संस्थाएं—विशेषकर संयुक्त राष्ट्र—आज यूक्रेन युद्ध, गाज़ा–मध्य पूर्व संकट, इंडो-पैसिफिक तनाव, जलवायु आपातकाल, महामारी, और साइबर–स्पेस की चुनौतियों से जूझ रही हैं। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि 1945 की संस्थागत संरचनाएँ 2026 की वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं रहीं। इसी पृष्ठभूमि में G4 देशों—भारत, जर्मनी, जापान और ब्राज़ील —द्वारा बहुपक्षीय व्यवस्था, खासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), में सुधार की मांग को नया बल मिला है। फरवरी 2026 में के दौरान आयोजित G4 विदेश मंत्रियों की बैठक इस दिशा में एक निर्णायक प्रतीक बनकर उभरी। G4 का उदय: प्रतिनिधित्व की कमी के विरुद्ध सामूहिक आवाज G4 समूह का औपचारिक उभार 2005 में हुआ, जब इन चार देशों ने UNSC सुधार के लिए संयुक्त प्रस्ताव प्रस्तुत किया। आज ये देश वैश्विक अर्थव्यवस्था और शासन में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं— ...

Bangladesh BNP Historic Victory 2026: Impact on India-Bangladesh Relations

बांग्लादेश में बीएनपी की ऐतिहासिक जीत और भारत-बांग्लादेश संबंध: एक विस्तृत अकादमिक विश्लेषण प्रस्तावना 13 फरवरी 2026 को बांग्लादेश की राजनीति में एक निर्णायक परिवर्तन सामने आया, जब Bangladesh Nationalist Party (बीएनपी) ने संसदीय चुनाव में दो-तिहाई से अधिक बहुमत प्राप्त कर सत्ता में वापसी की। लगभग दो दशकों बाद यह परिवर्तन केवल सरकार बदलने की घटना नहीं, बल्कि बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा, वैचारिक संतुलन और विदेश नीति की प्राथमिकताओं में संभावित पुनर्संरचना का संकेत है। संभावित प्रधानमंत्री के रूप में Tarique Rahman का उभार इस परिवर्तन को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। यह चुनाव 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद हुआ, जिसने Sheikh Hasina के नेतृत्व वाली Awami League सरकार का अंत किया। इस राजनीतिक संक्रमण ने दक्षिण एशिया की सामरिक राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है—विशेषकर भारत-बांग्लादेश संबंधों के संदर्भ में। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सहयोग और तनाव के आयाम भारत और बांग्लादेश के संबंध 1971 के मुक्ति संग्राम से गहराई से जुड़े हैं। स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक वर्षों में संबंध सहयोगपूर्ण रहे, क...

Bangladesh Election 2026: Gen Z Politics, Constitutional Referendum and the Future of Democracy

बांग्लादेश चुनाव 2026: लोकतंत्र की नई दिशा या पुरानी चुनौतियों का नया अध्याय? दक्षिण एशिया की राजनीति में बांग्लादेश एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। 12 फरवरी 2026 को होने वाले आम चुनाव केवल 300-सदस्यीय जतीय संसद के गठन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उस राजनीतिक प्रयोग की परीक्षा भी हैं, जिसे अंतरिम सरकार ‘दूसरे गणराज्य’ की संज्ञा दे रही है। जुलाई 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह के बाद यह पहला बड़ा लोकतांत्रिक अभ्यास है, जिसने 15 वर्षों से सत्ता में रही शेख हसीना की अवामी लीग सरकार का अंत कर दिया था। करीब 12.7 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं की भागीदारी वाला यह चुनाव इसलिए भी असाधारण है क्योंकि इसके साथ ही संवैधानिक जनमत संग्रह (रेफरेंडम) भी कराया जा रहा है, जो बांग्लादेश की शासन-व्यवस्था की संरचना को ही बदल सकता है। यह प्रश्न अब केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि क्या बांग्लादेश वास्तव में लोकतांत्रिक पुनर्जन्म की ओर बढ़ रहा है या फिर वह पुराने संघर्षों के नए संस्करण से रूबरू होने वाला है। विद्रोह के बाद की राजनीति: एक शून्य और कई दावेदार 2024 का छात्र आंदोलन केव...

Pakistan–US Relations: “Used and Throw Like Toilet Paper” Remark, Historical Context, Strategic Mistakes and Future Policy

पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध: “टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल कर फेंक दिया” – एक विश्लेषणात्मक लेख भूमिका अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन और शत्रुता प्रायः हितों पर आधारित होती हैं। पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध इसका स्पष्ट उदाहरण हैं। हाल के दिनों में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने अमेरिका के साथ संबंधों पर तीखी आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका ने पाकिस्तान को “used and threw us like toilet paper” यानी “टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल किया और फिर फेंक दिया।” यह बयान पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली या किसी सार्वजनिक मंच पर दिया गया, जहां उन्होंने अतीत के अनुभवों के आधार पर अमेरिका पर आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने अमेरिका के लिए भारी कुर्बानियां दीं, लेकिन बदले में उसे धोखा और उपेक्षा ही मिली। यह बयान पाकिस्तान की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ की ओर संकेत करता है, जहां अब पाकिस्तान स्वयं को स्वतंत्र निर्णय लेने वाला देश के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों की नींव 1950 के दशक में पड़ी, जब शीत युद्ध के दौर में पाकिस्तान ने अमे...

National Interest Over Permanent Friends or Foes: India’s Shifting Strategic Compass

राष्ट्रीय हित ही सर्वोपरि: भारत की बदलती कूटनीतिक दिशा प्रस्तावना : : न मित्र स्थायी, न शत्रु अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी दृष्टिकोण बार-बार यह स्पष्ट करता है कि विश्व राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न ही कोई स्थायी शत्रु। यदि कुछ स्थायी है, तो वह है प्रत्येक राष्ट्र का राष्ट्रीय हित (National Interest) । बदलती वैश्विक परिस्थितियों में यही राष्ट्रीय हित कूटनीतिक रुख, विदेश नीति के निर्णय और अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को निर्धारित करता है। वर्तमान समय में भारत की विदेश नीति इसी सिद्धांत का मूर्त रूप प्रतीत हो रही है। जहाँ एक ओर भारत और अमेरिका के बीच कुछ असहजता और मतभेद देखने को मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारत और चीन, सीमा विवाद और गहरी अविश्वास की खाई के बावजूद संवाद और संबंध सुधारने की दिशा में आगे बढ़ते नज़र आ रहे हैं। यह परिदृश्य एक बार फिर यह रेखांकित करता है कि भावनात्मक स्तर पर मित्रता या शत्रुता से परे जाकर, अंतरराष्ट्रीय राजनीति का आधार केवल और केवल हित-आधारित यथार्थवाद है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भारत के विदेश नीति इतिहास में यह कथन अनेक बार सत्य सिद्ध हुआ ...

Bangladesh General Election 2026: Democratic Reset After the Gen-Z Revolution

बांग्लादेश के आम चुनाव 2026: राजनीतिक पुनर्जन्म और लोकतांत्रिक पुनर्संरचना की ऐतिहासिक घड़ी भूमिका: एक युग का अंत, एक नए अध्याय की शुरुआत 12 फरवरी 2026 को बांग्लादेश ने न केवल अपना 13वां संसदीय आम चुनाव संपन्न किया, बल्कि एक साथ हुए संवैधानिक जनमत संग्रह के माध्यम से अपने राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने का प्रयास भी किया। यह चुनाव सामान्य सत्ता परिवर्तन भर नहीं था, बल्कि अगस्त 2024 की छात्र-नेतृत्व वाली ‘जुलाई क्रांति’ के बाद पहला राष्ट्रीय लोकतांत्रिक परीक्षण था, जिसने देश की सत्ता संरचना को जड़ से हिला दिया। लगभग डेढ़ दशक तक सत्ता में रहीं शेख हसीना के पतन, अवामी लीग की चुनावी अनुपस्थिति और व्यापक संस्थागत सुधारों की पृष्ठभूमि में यह चुनाव बांग्लादेश के इतिहास में एक राजनीतिक पुनर्जन्म के रूप में दर्ज किया जा रहा है। पृष्ठभूमि: ‘जुलाई क्रांति’ और सत्ता संरचना का ध्वंस 2009 से 2024 तक शेख हसीना का शासन राजनीतिक स्थिरता के साथ-साथ बढ़ते अधिनायकवादी रुझानों के लिए भी जाना गया। विपक्ष का दमन, चुनावों की विश्वसनीयता पर प्रश्न, न्यायपालिका और मीडिया पर दबाव तथा अल्पसंख्यकों—विशेषकर ह...