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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

America's Grand Comeback or Political Complacency?

डोनाल्ड ट्रंप के "अमेरिका की ऐतिहासिक वापसी" के दावे का गहराई से विश्लेषण करता यह संपादकीय लेख उनकी "अमेरिका फर्स्ट" नीति, आर्थिक सुधार, वैश्विक कूटनीति और सामाजिक विभाजन पर पड़ने वाले प्रभावों की आलोचनात्मक समीक्षा करता है। क्या यह सच में अमेरिका की महान वापसी है, या केवल राजनीतिक आत्ममुग्धता? जानिए इस विस्तृत और संतुलित विश्लेषण में।

America's Grand Comeback or Political Complacency?

अमेरिका की ऐतिहासिक वापसी या राजनीतिक आत्ममुग्धता?

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान कई विवादास्पद निर्णय लिए, लेकिन उनका एक बयान विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है—"अमेरिका अब ऐसी वापसी की कगार पर है, जैसी दुनिया ने पहले कभी नहीं देखी होगी।" यह बयान न केवल उनके आत्मविश्वास को दर्शाता है, बल्कि अमेरिका की राजनीतिक, आर्थिक, और सामाजिक स्थिति पर भी व्यापक बहस को जन्म देता है। क्या वास्तव में अमेरिका एक अभूतपूर्व वापसी कर रहा है, या यह केवल एक राजनीतिक दंभ है? इस लेख में हम इस दावे का गहराई से विश्लेषण करेंगे और इसकी वास्तविकता को समझने की कोशिश करेंगे।

ट्रंप का राष्ट्रवाद और "अमेरिका फर्स्ट" नीति

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पूरे कार्यकाल में "अमेरिका फर्स्ट" (America First) नीति को प्राथमिकता दी। उनका कहना है कि अमेरिका को अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए, चाहे इसके लिए उसे अंतरराष्ट्रीय संधियों को तोड़ना ही क्यों न पड़े। उन्होंने वैश्वीकरण के प्रभावों पर सवाल उठाए और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए।

हालांकि, इस नीति का प्रभाव मिलाजुला रहा। एक ओर, अमेरिकी उद्योगों को कुछ लाभ हुआ, लेकिन दूसरी ओर, इस नीति ने अमेरिका को कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और समझौतों से अलग-थलग कर दिया। पेरिस जलवायु समझौते (Paris Climate Agreement) से अमेरिका का बाहर निकलना, WHO को दी जाने वाली आर्थिक सहायता में कटौती, और NAFTA (North American Free Trade Agreement) को बदलने की कोशिशें इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

अर्थव्यवस्था: पुनरुद्धार या भ्रम?

ट्रंप ने अपने कार्यकाल में कई आर्थिक सुधारों का दावा किया, जिनमें कर कटौती, घरेलू उद्योगों को समर्थन और नौकरियों के अवसर बढ़ाने जैसी पहलें शामिल हैं। उनकी नीतियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा चीन के साथ व्यापार युद्ध (Trade War) है, जिसमें उन्होंने चीनी उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए और "अमेरिका में निर्मित" (Made in America) उत्पादों को बढ़ावा दिया।

शुरुआती दौर में इन नीतियों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को कुछ फायदा हुआ, लेकिन दीर्घकालिक रूप से इनके नकारात्मक प्रभाव अधिक दिखे। ट्रेड वॉर के कारण अमेरिकी कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ गई, जिससे उपभोक्ताओं को अधिक कीमतें चुकानी पड़ीं। कृषि क्षेत्र को भी भारी नुकसान हुआ क्योंकि चीन ने अमेरिकी कृषि उत्पादों का आयात कम कर दिया।

इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन द्वारा किए गए कर सुधारों ने अल्पकालिक आर्थिक उछाल तो दिया, लेकिन इससे सरकारी घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ गया। अमीर वर्ग को हुए कर लाभों ने असमानता को और बढ़ाया, जबकि मध्यम और निम्न वर्ग को कोई विशेष फायदा नहीं हुआ।

वैश्विक स्तर पर अमेरिका की स्थिति

ट्रंप का दावा है कि उनके नेतृत्व में अमेरिका वैश्विक स्तर पर अधिक प्रभावशाली बन रहा है। हालांकि, हकीकत इससे अलग है। उनके प्रशासन के दौरान अमेरिका कई वैश्विक मंचों पर अलग-थलग पड़ गया।

यूरोपीय संघ और NATO से संबंधों में तनाव: 

ट्रंप ने बार-बार NATO देशों को अधिक रक्षा खर्च करने के लिए कहा, जिससे यूरोपीय देशों के साथ अमेरिका के संबंधों में तनाव आ गया।

चीन के साथ टकराव: 

ट्रंप ने चीन के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया, लेकिन इसका प्रभाव यह हुआ कि चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए और कई अन्य देशों के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत किए।

मध्य-पूर्व नीति: 

उन्होंने यरुशलम को इज़राइल की राजधानी के रूप में मान्यता दी, जिससे इस क्षेत्र में तनाव बढ़ गया। ईरान के साथ परमाणु समझौते (Iran Nuclear Deal) से अमेरिका का हटना भी एक विवादास्पद निर्णय था।

इन सभी घटनाओं ने अमेरिका की वैश्विक स्थिति को कमजोर किया और उसे एक भरोसेमंद सहयोगी के बजाय एक अप्रत्याशित राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया।

आंतरिक सामाजिक और राजनीतिक विभाजन

ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिका में सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण अपने चरम पर पहुंच गया। नस्लीय और जातीय असमानताओं को लेकर विरोध प्रदर्शन, विशेष रूप से "ब्लैक लाइव्स मैटर" (Black Lives Matter) आंदोलन, अमेरिका की आंतरिक समस्याओं को उजागर करने वाला एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम था।

इसके अलावा, ट्रंप की बयानबाजी और उनके कट्टर समर्थकों की कार्यप्रणाली ने अमेरिकी लोकतंत्र को भी खतरे में डाल दिया। 6 जनवरी 2021 को कैपिटल हिल पर हुआ हमला अमेरिकी इतिहास की सबसे शर्मनाक घटनाओं में से एक थी। यह हमला दिखाता है कि ट्रंप समर्थकों के एक बड़े हिस्से ने उनके "चुनाव चोरी" के दावे को सच मान लिया और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर ही हमला कर दिया।

ट्रंप का दावा बनाम वास्तविकता

ट्रंप के "अमेरिका की वापसी" के दावे को अगर ऐतिहासिक दृष्टि से देखें, तो यह कई सवाल खड़े करता है।

1. क्या अमेरिका पहले कभी कमजोर हुआ था?

अगर हम 2008 की आर्थिक मंदी को छोड़ दें, तो अमेरिका की स्थिति पहले से ही मजबूत थी। ट्रंप के आने से पहले भी अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी और उसकी सैन्य शक्ति अजेय थी।

2. क्या अमेरिका की नीतियां पहले से अधिक प्रभावी हुईं?

कुछ मामलों में, ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका के पक्ष को मजबूत करने की कोशिश की, लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव नकारात्मक रहे।

3. क्या वैश्विक स्तर पर अमेरिका का प्रभाव बढ़ा?

नहीं, बल्कि अमेरिका की छवि एक अस्थिर और आत्मकेंद्रित राष्ट्र के रूप में बनी, जिससे कई देशों ने अपने संबंधों की समीक्षा करनी शुरू कर दी है।

निष्कर्ष

डोनाल्ड ट्रंप का दावा कि अमेरिका अब ऐसी वापसी की कगार पर है जैसी दुनिया ने पहले कभी नहीं देखी होगी, अपने आप में एक आकर्षक और उत्साहवर्धक विचार है। हालांकि, वास्तविकता यह है कि उनकी नीतियां अल्पकालिक लाभ तो दे सकती हैं, लेकिन दीर्घकालिक रूप से उन्होंने अमेरिका को अधिक विभाजित, अधिक अलग-थलग और अधिक अस्थिर बना दिया है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि ट्रंप ने अमेरिका के अंदर राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा दिया, लेकिन उन्होंने वैश्विक राजनीति और आर्थिक स्थिरता की कीमत पर ऐसा किया। उनकी नीतियां अमेरिकी लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए एक चुनौती बन गईं हैं।

अगर अमेरिका को सच में "महान" बनना है, तो उसे केवल आत्ममुग्धता से बाहर आकर वास्तविक चुनौतियों का सामना करना होगा और एक संतुलित, समावेशी और दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। ट्रंप का दावा एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा, यह अमेरिका की सच्ची वापसी का मार्ग नहीं है।



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✍️ARVIND SINGH PK REWA

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