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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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West Asia War 2026: Strategic Motives, Regime Change Debate and India’s Diplomatic Challenge

पश्चिम एशिया का युद्ध: शक्ति-राजनीति, शासन परिवर्तन की राजनीति और भारत की कूटनीतिक परीक्षा

प्रस्तावना: एक क्षेत्रीय युद्ध से वैश्विक संकट तक

28 फरवरी 2026 को संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध आरम्भ किए गए सैन्य अभियान ने पश्चिम एशिया को एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीतिक संकट के केंद्र में ला खड़ा किया है। यह संघर्ष केवल दो या तीन देशों के बीच सैन्य टकराव नहीं है; बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, ऊर्जा भू-राजनीति, शक्ति संतुलन और कूटनीतिक नैतिकता की परीक्षा बन गया है।

युद्ध के सात दिनों के भीतर ही इसके प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार मार्गों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दिखाई देने लगे हैं। तेल की कीमतों में तेज उछाल, होर्मुज जलडमरूमध्य की अस्थिरता, क्षेत्रीय शक्तियों की संभावित भागीदारी और वैश्विक महाशक्तियों की रणनीतिक गणनाएँ इस संकट को और जटिल बना रही हैं।

इस संघर्ष को समझने के लिए केवल सैन्य घटनाओं का विश्लेषण पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे छिपे रणनीतिक तर्क, शासन परिवर्तन की भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ, अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाएँ और उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के संदर्भ को भी समझना आवश्यक है।


अंतरराष्ट्रीय कानून और युद्ध की वैधता का प्रश्न

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में युद्ध की वैधता का मूल आधार संयुक्त राष्ट्र चार्टर है, जो संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और बल प्रयोग के प्रतिबंध जैसे सिद्धांतों पर आधारित है। सिद्धांततः किसी भी राज्य को दूसरे राज्य के विरुद्ध सैन्य बल प्रयोग करने की अनुमति केवल दो परिस्थितियों में मिलती है—

  1. आत्मरक्षा (Self-defence)
  2. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति

ईरान पर किए गए हालिया हमलों को लेकर यही मूल प्रश्न उठ रहा है कि क्या यह कार्रवाई वास्तव में आत्मरक्षा के सिद्धांत के अंतर्गत आती है, या यह एक पूर्वनिवारक (pre-emptive) युद्ध है जिसका अंतरराष्ट्रीय कानून में सीमित औचित्य है।

पिछले वर्षों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर गहन कूटनीतिक वार्ताएँ चल रही थीं। कई मध्यस्थ देशों—विशेष रूप से ओमान—ने संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऐसी परिस्थितियों में सैन्य कार्रवाई ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या कूटनीति को पर्याप्त अवसर दिया गया था, या युद्ध को पहले से ही एक विकल्प के रूप में चुना गया था।

इसके अतिरिक्त ईरानी नेतृत्व को लक्षित कर किए गए हमलों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक खतरनाक परंपरा को जन्म दिया है। राज्य प्रमुखों को सीधे सैन्य लक्ष्य बनाना लंबे समय से एक अनकही सीमा माना जाता रहा है। यदि यह सीमा टूटती है, तो वैश्विक राजनीति में प्रतिशोध और अस्थिरता की नई संस्कृति विकसित हो सकती है।


परमाणु कार्यक्रम या शासन परिवर्तन?

पश्चिम एशिया के इस युद्ध के पीछे घोषित उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना बताया जा रहा है। किंतु कई विश्लेषकों का तर्क है कि वास्तविक उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।

इतिहास में कई बार परमाणु प्रसार को रोकने का तर्क राजनीतिक हस्तक्षेप या सैन्य कार्रवाई के औचित्य के रूप में उपयोग किया गया है। यदि ईरान के साथ चल रही वार्ताओं में प्रगति हो रही थी, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि सैन्य विकल्प को प्राथमिकता क्यों दी गई।

संभवतः इसके पीछे एक व्यापक रणनीतिक लक्ष्य—शासन परिवर्तन (Regime Change)—हो सकता है।

ईरान पश्चिम एशिया में उन कुछ देशों में से है जिसने लंबे समय से अमेरिकी प्रभाव का विरोध किया है और क्षेत्रीय राजनीति में स्वतंत्र भूमिका निभाने का प्रयास किया है। यदि ईरान में एक अधिक अनुकूल सरकार स्थापित होती है, तो इसके कई भू-राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं:

  • वैश्विक ऊर्जा बाजार में ईरानी तेल का पुनः पूर्ण एकीकरण
  • रूस की ऊर्जा पकड़ को चुनौती
  • चीन की मध्य एशिया और पश्चिम एशिया में रणनीतिक पहुंच पर अंकुश

इस दृष्टि से ईरान केवल एक क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की शतरंज का एक महत्वपूर्ण मोहरा बन जाता है।


शासन परिवर्तन की रणनीति: इतिहास से सबक

हालांकि शासन परिवर्तन की रणनीति सैद्धांतिक रूप से आकर्षक लग सकती है, लेकिन इतिहास इसके जोखिमों की ओर संकेत करता है।

अफगानिस्तान, इराक और लीबिया जैसे उदाहरण बताते हैं कि बाहरी सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से राजनीतिक व्यवस्था बदलना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन स्थिर शासन स्थापित करना अत्यंत कठिन होता है।

ईरान के मामले में यह चुनौती और भी जटिल है।

  • इसकी जनसंख्या लगभग 9 करोड़ के आसपास है।
  • इसका समाज राजनीतिक रूप से जागरूक और राष्ट्रीय पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है।
  • इसकी सैन्य और सुरक्षा संरचना अत्यधिक संगठित है।

ऐसी परिस्थितियों में बाहरी हस्तक्षेप से तीन संभावित परिणाम सामने आ सकते हैं:

  1. मौजूदा शासन का और अधिक कठोर रूप
  2. दीर्घकालिक गृहयुद्ध
  3. एक असफल राज्य (Failed State) का निर्माण

इन तीनों ही स्थितियों का परिणाम क्षेत्रीय अस्थिरता और वैश्विक असुरक्षा के रूप में सामने आएगा।


ऊर्जा भू-राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था

पश्चिम एशिया का महत्व केवल राजनीतिक या सैन्य दृष्टि से नहीं है; यह वैश्विक ऊर्जा प्रणाली का केंद्र भी है।

होर्मुज जलडमरूमध्य से विश्व के लगभग 20% समुद्री तेल व्यापार का प्रवाह होता है। इस मार्ग में किसी भी प्रकार की अस्थिरता वैश्विक ऊर्जा बाजार को तुरंत प्रभावित करती है।

हालिया संघर्ष के बाद तेल की कीमतों में तेज वृद्धि देखी गई है। ऊर्जा बाजारों में यह अस्थिरता केवल तेल आयात करने वाले देशों के लिए ही नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक विकास के लिए भी चुनौती बन सकती है।

इसके अतिरिक्त यदि संघर्ष लंबा चलता है, तो यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, समुद्री बीमा लागत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकता है।


क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और संभावित विस्तार

पश्चिम एशिया की राजनीति बहुस्तरीय है। यहां क्षेत्रीय शक्तियाँ, वैचारिक प्रतिस्पर्धाएँ और वैश्विक महाशक्तियों की रणनीतियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

ईरान के साथ जुड़े कई क्षेत्रीय समूह और सहयोगी भी इस संघर्ष को व्यापक बना सकते हैं। यदि युद्ध का विस्तार होता है, तो यह केवल एक सीमित सैन्य अभियान नहीं रहेगा बल्कि एक व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है।

ऐसी स्थिति में लाल सागर, भूमध्य सागर और फारस की खाड़ी जैसे समुद्री क्षेत्रों में भी तनाव बढ़ सकता है, जो वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।


भारत के लिए रणनीतिक चुनौती

भारत के लिए यह संकट केवल दूरस्थ भू-राजनीतिक घटना नहीं है। पश्चिम एशिया भारत के लिए कई कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पहला, भारत की ऊर्जा सुरक्षा इस क्षेत्र से गहराई से जुड़ी हुई है। तेल और गैस आयात का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है।

दूसरा, इस क्षेत्र में लगभग एक करोड़ से अधिक भारतीय प्रवासी कार्यरत हैं, जिनकी सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता भारत के लिए महत्वपूर्ण है।

तीसरा, पश्चिम एशिया भारत की समुद्री और व्यापारिक रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इसलिए इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता भारत की अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और सुरक्षा हितों को सीधे प्रभावित करती है।


भारत की संभावित भूमिका: संतुलित कूटनीति

भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से रणनीतिक संतुलन और बहुपक्षीय कूटनीति पर आधारित रही है।

इस संकट में भारत के सामने तीन प्रमुख कूटनीतिक विकल्प हैं:

  1. तटस्थ संतुलन बनाए रखना
  2. संवाद और डी-एस्केलेशन की वकालत करना
  3. मानवीय और आर्थिक स्थिरता के लिए बहुपक्षीय पहल का समर्थन करना

भारत की विश्वसनीयता इस बात में है कि उसके सभी प्रमुख पक्षों—अमेरिका, इज़राइल, ईरान और खाड़ी देशों—के साथ कार्यात्मक संबंध हैं। यह स्थिति भारत को एक संभावित मध्यस्थ या कम से कम संवाद के समर्थक के रूप में भूमिका निभाने की क्षमता प्रदान करती है।

यदि भारत सक्रिय कूटनीतिक पहल करता है, तो यह उसकी वैश्विक भूमिका और “वैश्विक दक्षिण” के नेतृत्व के दावे को भी मजबूत कर सकता है।


निष्कर्ष: युद्ध नहीं, कूटनीति ही समाधान

पश्चिम एशिया का वर्तमान संकट केवल सैन्य शक्ति की परीक्षा नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की विश्वसनीयता की भी परीक्षा है।

यदि वैश्विक राजनीति में बल प्रयोग और शासन परिवर्तन की रणनीतियाँ सामान्य बन जाती हैं, तो यह नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।

इतिहास यह स्पष्ट करता है कि सैन्य हस्तक्षेप अल्पकालिक समाधान दे सकता है, लेकिन स्थायी शांति केवल संवाद, कूटनीति और राजनीतिक समझौते से ही संभव होती है।

भारत के लिए यह समय रणनीतिक विवेक, सक्रिय कूटनीति और संतुलित दृष्टिकोण का है।

पश्चिम एशिया में शांति केवल क्षेत्रीय स्थिरता के लिए ही नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के भविष्य के लिए भी आवश्यक है।


संदर्भ: शशि थरूर, "Our stakes are high in West Asia. Delhi must call for diplomacy, de-escalation", द इंडियन एक्सप्रेस, 6 मार्च 2026।

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