अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
ट्रंप का नोबेल शांति पुरस्कार का जुनून: दावे बनाम हकीकत डोनाल्ड ट्रंप का नोबेल शांति पुरस्कार का सपना 2018 से 2025 तक चर्चा में रहा है। 2018 में उन्होंने अब्राहम समझौतों को ऐतिहासिक बताकर खुद को नोबेल का हकदार ठहराया। 2025 में उनके दावे और बड़े हो गए—उन्होंने कहा कि उन्होंने सात युद्ध खत्म किए और गाजा में शांति की योजना बनाई। लेकिन क्या उनके दावे सचमुच इतने बड़े हैं, या यह सिर्फ प्रचार है? 10 अक्टूबर 2025 को नोबेल समिति की घोषणा से पहले, गाजा और यूक्रेन के संकटों के बीच यह सवाल और गहरा गया है। आलोचक इसे "प्रभुत्व, न कि संवाद" कहते हैं। आइए, सरल भाषा में उनके दावों और हकीकत की पड़ताल करें। 2018: अब्राहम समझौते और नोबेल का दावा 2018 में ट्रंप ने अब्राहम समझौतों को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताया। इन समझौतों के तहत इजरायल ने संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान जैसे अरब देशों के साथ राजनयिक संबंध बनाए। ट्रंप ने इसे मध्य पूर्व में शांति की नींव कहा और नोबेल की मांग की। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी उनका समर्थन किया। लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये समझौते अ...