हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स की सदस्यता का अंत: ब्रिटिश लोकतंत्र के विकास का एक निर्णायक अध्याय ब्रिटेन की संसदीय परंपरा विश्व की सबसे पुरानी और स्थायी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है। किंतु इस गौरवपूर्ण परंपरा के भीतर कुछ ऐसे तत्व भी रहे हैं जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ लंबे समय से असंगत माने जाते रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख था हाउस ऑफ लॉर्ड्स में वंशानुगत पीयर्स (Hereditary Peers) की सदस्यता—एक ऐसी व्यवस्था जिसके अंतर्गत कुलीन परिवारों के सदस्य केवल अपने जन्म के आधार पर संसद के ऊपरी सदन में स्थान प्राप्त करते थे। मार्च 2026 में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित Hereditary Peers Bill इस व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इसके साथ ही सदियों से चली आ रही वह परंपरा समाप्त हो जाएगी जिसके अंतर्गत राजनीतिक शक्ति का एक हिस्सा जन्माधिकार से निर्धारित होता था। यह सुधार न केवल एक संस्थागत परिवर्तन है, बल्कि ब्रिटिश लोकतंत्र के क्रमिक आधुनिकीकरण की उस दीर्घकालिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें सामंती विरासतों को धीरे-धीरे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरू...
निवारक निरोध और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम: सुरक्षा के नाम पर स्वतंत्रता का हनन? हाल ही में लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए), 1980 के तहत निवारक हिरासत ने एक बार फिर इस कानून की उपयोगिता और वैधता पर बहस छेड़ दी है। उनकी पत्नी डॉ. गीतांजली जे. अंगमो द्वारा दायर हैबियस कॉर्पस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 6 अक्टूबर को सुनवाई करने वाला है, जिसमें वांगचुक की हिरासत को चुनौती दी गई है। यह मामला न केवल लद्दाख की राज्य दर्जे और छठी अनुसूची की मांग से जुड़ा है, बल्कि यह उस व्यापक समस्या को भी उजागर करता है, जिसमें निवारक निरोध राजनीतिक असहमति दबाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। भारत में निवारक निरोध की अवधारणा संविधान के अनुच्छेद 22 से उत्पन्न हुई है। यह राज्य को कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति को बिना मुकदमे के हिरासत में रखने की अनुमति देती है। इसी सिद्धांत पर आधारित एनएसए, केंद्र और राज्य सरकारों को राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या आवश्यक आपूर्तियों को खतरे में डालने वाली गतिविधियों को रोकने के लिए 12 महीने तक की हिरासत की शक्ति द...