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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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US-Israel Military Campaign Against Iran: Nuclear Deterrence Double Standards and the Risks to Global Order

अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा

(विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख)

प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव

फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है।

यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और परमाणु अप्रसार (non-proliferation) की वैश्विक व्यवस्था की दोहरी नैतिकता उजागर होती है। यदि परमाणु हथियार मानवता के लिए विनाशकारी हैं, तो वे हर राज्य के लिए समान रूप से विनाशकारी हैं। लेकिन व्यवहार में विश्व व्यवस्था एक ऐसे पदानुक्रम में बदल चुकी है जहाँ कुछ शक्तिशाली देशों को परमाणु हथियार रखने का अधिकार है, जबकि अन्य देशों को उसी संभावना के कारण सैन्य हमलों का सामना करना पड़ सकता है।

परमाणु निरोध की अवधारणा और उसका नैतिक संकट

परमाणु निरोध का सिद्धांत शीत युद्ध के दौरान विकसित हुआ था। इसका मूल आधार था—पारस्परिक सुनिश्चित विनाश (Mutually Assured Destruction)। इस सिद्धांत के अनुसार यदि दो प्रतिद्वंद्वी परमाणु शक्तियाँ युद्ध करती हैं तो परिणाम दोनों के लिए पूर्ण विनाश होगा, इसलिए परमाणु हथियार युद्ध को रोकने का माध्यम बन जाते हैं।

लेकिन शीत युद्ध के बाद यह सिद्धांत धीरे-धीरे एक राजनीतिक उपकरण में बदल गया। पाँच मान्यता प्राप्त परमाणु शक्तियाँ—अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन—परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत वैध मानी जाती हैं, जबकि अन्य देशों को परमाणु हथियार प्राप्त करने से रोका जाता है।

समस्या तब और जटिल हो जाती है जब कुछ राज्य इस व्यवस्था से बाहर रहते हुए भी परमाणु शक्ति बन जाते हैं। उदाहरण के लिए इज़राइल के पास व्यापक रूप से परमाणु हथियार होने की संभावना मानी जाती है, किंतु उसने कभी औपचारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की है।

ऐसी स्थिति में जब अमेरिका और इज़राइल ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए सैन्य कार्रवाई करते हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या अप्रसार व्यवस्था वास्तव में वैश्विक सुरक्षा के लिए है या केवल शक्ति संतुलन बनाए रखने का एक साधन है।

यदि नियम समान नहीं हैं, तो वे नियम नहीं बल्कि शक्ति की अभिव्यक्ति बन जाते हैं।

पूर्वनिवारक युद्ध की राजनीति

ईरान के विरुद्ध वर्तमान सैन्य अभियान का औचित्य “संभावित खतरे” पर आधारित है। यह तर्क अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नया नहीं है।

2003 में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने इसी तर्क के आधार पर इराक पर आक्रमण किया था। उस समय दावा किया गया था कि सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के हथियार (WMDs) हैं। बाद में यह दावा असत्य साबित हुआ, लेकिन तब तक इराक की राजनीतिक और सामाजिक संरचना पूरी तरह टूट चुकी थी।

इराक युद्ध के परिणाम आज भी मध्य पूर्व में दिखाई देते हैं—

  • राज्य संस्थाओं का पतन
  • सांप्रदायिक हिंसा
  • उग्रवादी संगठनों का उदय, विशेषकर ISIS
  • करोड़ों लोगों का विस्थापन

यह इतिहास एक स्पष्ट चेतावनी देता है कि सैन्य हस्तक्षेप अक्सर उस समस्या से अधिक गंभीर संकट उत्पन्न कर देता है जिसे हल करने के लिए वह शुरू किया जाता है।

यदि ईरान के साथ भी इसी प्रकार का परिदृश्य विकसित होता है, तो पश्चिम एशिया में अस्थिरता का एक नया चक्र शुरू हो सकता है।

क्षेत्रीय सुरक्षा पर संभावित प्रभाव

ईरान केवल एक राष्ट्र-राज्य नहीं है; वह पश्चिम एशिया की जटिल शक्ति-राजनीति का केंद्रीय तत्व है।

उसके पास क्षेत्रीय प्रभाव का एक व्यापक नेटवर्क है—

  • लेबनान में हिज़्बुल्लाह
  • इराक में शिया मिलिशिया
  • यमन में हूती आंदोलन
  • सीरिया में सहयोगी शासन

यदि ईरान के विरुद्ध युद्ध लंबा खिंचता है, तो यह संघर्ष केवल अमेरिका-इज़राइल और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। यह एक बहु-क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है जिसमें खाड़ी देश, लेबनान, इराक और यहाँ तक कि लाल सागर क्षेत्र भी शामिल हो सकते हैं।

यह परिदृश्य वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बन सकता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। वैश्विक तेल व्यापार का लगभग पाँचवां हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है।

यदि ईरान इस क्षेत्र में समुद्री मार्गों को बाधित करने का प्रयास करता है या सैन्य संघर्ष के कारण यातायात बाधित होता है, तो तेल की कीमतों में तीव्र वृद्धि हो सकती है।

इसके प्रभाव व्यापक होंगे—

  • वैश्विक मुद्रास्फीति में वृद्धि
  • ऊर्जा आयातक देशों पर दबाव
  • विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक अस्थिरता

भारत जैसे देशों के लिए यह विशेष चिंता का विषय है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है।

अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुपक्षवाद की चुनौती

ईरान पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के संदर्भ में भी विवादास्पद है।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार किसी राज्य के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई केवल दो परिस्थितियों में वैध मानी जाती है—

  1. आत्मरक्षा
  2. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति

पूर्वनिवारक युद्ध की अवधारणा इन दोनों से अलग है। यह “संभावित खतरे” को आधार बनाकर सैन्य कार्रवाई को उचित ठहराती है।

यदि यह सिद्धांत स्वीकार कर लिया जाता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक खतरनाक मिसाल बन सकता है।

क्योंकि तब कोई भी शक्तिशाली राज्य किसी भी संभावित खतरे के आधार पर युद्ध शुरू कर सकता है।

भारत के लिए रणनीतिक निहितार्थ

भारत के लिए यह संकट कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।

पहला, भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक और आर्थिक संबंध हैं—विशेषकर ऊर्जा और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं के संदर्भ में।

दूसरा, भारत पश्चिम एशिया में लगभग एक करोड़ प्रवासी भारतीयों और उनकी remittances पर भी निर्भर है।

तीसरा, भारत की विदेश नीति लंबे समय से “रणनीतिक स्वायत्तता” और “बहुपक्षीय कूटनीति” पर आधारित रही है।

इसलिए भारत के लिए सबसे संतुलित दृष्टिकोण यही होगा कि वह कूटनीतिक समाधान, तनाव-कम करने और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान की वकालत करे।

निष्कर्ष: शक्ति नहीं, नियम आधारित व्यवस्था की आवश्यकता

अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध सैन्य अभियान केवल एक युद्ध नहीं है; यह वैश्विक व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांतों की परीक्षा है।

यदि परमाणु अप्रसार व्यवस्था को विश्वसनीय बनाना है, तो उसे समान नियमों पर आधारित होना होगा। अन्यथा यह केवल शक्ति-राजनीति का उपकरण बनकर रह जाएगी।

इतिहास यह सिखाता है कि बमबारी से स्थिरता नहीं आती। इराक, अफगानिस्तान और सीरिया इसके उदाहरण हैं।

स्थायी समाधान केवल कूटनीति, बहुपक्षीय संवाद और पारदर्शी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से ही संभव है।

यदि विश्व समुदाय इस दिशा में आगे नहीं बढ़ता, तो परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता भविष्य में और अधिक युद्धों और अस्थिरता का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।


With Indian Express Inputs

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