India's Israel-Palestine Policy: From Traditional Palestinian Support to Strategic Balance with Israel (2026 Update)
भारत की इज़राइल-फिलिस्तीन विदेश नीति: नेहरू से मोदी तक
इज़राइल–फिलिस्तीन विवाद बीसवीं सदी के सबसे जटिल और दीर्घकालिक भू-राजनीतिक संघर्षों में से एक है, जो 1947-48 के विभाजन और इज़राइल की स्थापना से लेकर आज के गाजा संकट तक फैला हुआ है। यह मुद्दा न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को आकार देता है, बल्कि वैश्विक दक्षिण-उत्तरी संबद्धताओं, धार्मिक पहचान राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श का केंद्र बिंदु भी रहा है। भारत का रुख इस संदर्भ में विशेष रूप से अध्ययन-योग्य है, क्योंकि यह पारंपरिक रूप से फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के समर्थक के रूप में जाना जाता है, जबकि हाल के दशकों में इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी भी गहराती जा रही है। यह द्वंद्व भारत की विदेश नीति की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करता है, जिसमें ऐतिहासिक विरासत, वैचारिक आधार, भू-रणनीतिक हित, आर्थिक कारक और घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताएं शामिल हैं। इस विश्लेषण में हम इन आयामों का संतुलित परीक्षण करेंगे, विशेष रूप से 2023 के बाद की घटनाओं के प्रकाश में, जो दर्शाती हैं कि भारत किस प्रकार वैश्विक दबावों के बीच संतुलन साध रहा है।
भारत की विदेश नीति की जड़ें स्वतंत्रता के बाद के दौर में नेहरूवादी गुटनिरपेक्षता और उपनिवेशवाद-विरोधी नैरेटिव में निहित हैं। 1947 में जब भारत ने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की, तब फिलिस्तीनी लोग ब्रिटिश मैनडेट, ओटोमन साम्राज्य के पतन और बढ़ते यहूदी प्रवास के बीच अपनी राष्ट्रीय पहचान और भूमि अधिकारों के लिए संघर्षरत थे। भारत ने इस संघर्ष में अपनी खुद की उपनिवेश-ग्रस्त अतीत की झलक देखी—विभाजन की पीड़ा, राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियां और आत्मनिर्णय का अधिकार। परिणामस्वरूप, भारत ने 1947 के संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव 181 (पालेस्टाइन विभाजन योजना) के खिलाफ मतदान किया, जो इज़राइल और फिलिस्तीन के दो अलग राज्यों की स्थापना का सुझाव देता था। भारत का तर्क था कि किसी भी समाधान को फिलिस्तीनी अरबों की सहमति के बिना लागू नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह उपनिवेशवाद की पुनरावृत्ति जैसा प्रतीत होता है। 1950 में इज़राइल को मान्यता देने के बावजूद, भारत ने 1992 तक पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए, मुख्यतः अरब दुनिया के साथ अपनी एकजुटता बनाए रखने के लिए।
यह वैचारिक रुख संयुक्त राष्ट्र में भारत की भूमिका से स्पष्ट होता है। 1967 के अरब-इज़राइल युद्ध के बाद, भारत ने दो-राज्य समाधान का समर्थन किया, जिसमें 1967 की पूर्व सीमाओं पर आधारित फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना और यरुशलम के विशेष अंतरराष्ट्रीय दर्जे की वकालत की गई। भारत ने 1974 में फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (पीएलओ) को फिलिस्तीनी लोगों का एकमात्र प्रतिनिधि मान्यता दी और 1988 में फिलिस्तीन राज्य को मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बना। यह स्टैंड न केवल राजनीतिक समर्थन था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार, न्याय और राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के सिद्धांतों की पुष्टि भी, जो भारत की अपनी स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरित था। गुटनिरपेक्ष आंदोलन (एनएएम) के संस्थापक सदस्य के रूप में, भारत ने फिलिस्तीनी मुद्दे को वैश्विक दक्षिण की एकजुटता का प्रतीक बनाया, जो शीत युद्ध की द्विध्रुवीयता से परे एक तीसरा मार्ग तलाश रहा था।
भारत के लिए मध्य पूर्व का भू-रणनीतिक महत्व 1950-80 के दशक में तेजी से बढ़ा, खासकर अरब दुनिया के साथ। ऊर्जा सुरक्षा, तेल आयात और खाड़ी देशों में लाखों भारतीय प्रवासियों की मौजूदगी ने भारत को अरब लीग के साथ मजबूत संबंध बनाने के लिए प्रेरित किया। फिलिस्तीनी समर्थन इस संदर्भ में नैतिक से अधिक रणनीतिक था, क्योंकि यह अरब देशों के साथ राजनयिक संतुलन बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुआ। उदाहरण के लिए, 1973 के तेल संकट के दौरान, भारत की फिलिस्तीन-समर्थक नीति ने ओपेक देशों से ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद की। आर्थिक रूप से, भारत आज भी खाड़ी क्षेत्र से 60 प्रतिशत से अधिक तेल आयात करता है, और वहां 90 लाख से अधिक भारतीय काम करते हैं, जो सालाना अरबों डॉलर की रेमिटेंस भेजते हैं। यह आर्थिक निर्भरता भारत को फिलिस्तीनी मुद्दे पर अरब देशों की संवेदनशीलताओं का सम्मान करने के लिए बाध्य करती है, भले ही इज़राइल के साथ संबंध गहरा रहे हों।
घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलता भी भारत की नीति को आकार देती है। भारत की बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक संरचना में मुसलमानों की बड़ी आबादी (करीब 20 करोड़) एक महत्वपूर्ण कारक है। फिलिस्तीनी मुद्दा घरेलू राजनीति में धार्मिक पहचान और सामाजिक सद्भाव से जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक रूप से, कांग्रेस-नीत सरकारों ने फिलिस्तीनी समर्थन को घरेलू मुस्लिम वोट बैंक से जोड़ा, जबकि भाजपा सरकारों में हिंदुत्व की विचारधारा ने इज़राइल को "इस्लामी कट्टरवाद" के खिलाफ एक साझा साथी के रूप में देखा। हालांकि, भारत की नीति कभी भी पूरी तरह से धार्मिक रंग नहीं लेती; यह सामाजिक तनावों को नियंत्रित करने का माध्यम बनी रहती है। उदाहरण के लिए, 2023-24 के गाजा युद्ध के दौरान, भारत में फिलिस्तीनी समर्थन रैलियां और इज़राइल-समर्थक आवाजें दोनों ही उभरीं, जो घरेलू विभाजन को दर्शाती हैं।
1990 के दशक के बाद भारत-इज़राइल संबंधों में उल्लेखनीय बदलाव आया। शीत युद्ध की समाप्ति, वैश्वीकरण और आतंकवाद के उभार ने भारत को इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी की ओर धकेला। 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद, दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग प्रमुख रहा—इज़राइल भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बन गया, जिसमें बैराक मिसाइल, स्पाइक एंटी-टैंक मिसाइल और ड्रोन शामिल हैं। कृषि प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ा। मोदी सरकार ने "डी-हाइफेनेशन" नीति अपनाई, जिसमें इज़राइल और फिलिस्तीन के साथ संबंधों को अलग-अलग रखा जाता है, ताकि एक पर दूसरे का प्रभाव न पड़े। 2017 में मोदी की इज़राइल यात्रा और 2018 में फिलिस्तीन यात्रा इस संतुलन का प्रतीक थीं। आर्थिक रूप से, द्विपक्षीय व्यापार 2025 तक 10 अरब डॉलर को पार कर चुका है, जबकि इज़राइल की तकनीकी विशेषज्ञता भारत के "मेक इन इंडिया" अभियान को मजबूत करती है।
वर्तमान परिदृश्य में, भारत की नीति और अधिक जटिल हो गई है, विशेष रूप से 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले और उसके बाद के गाजा युद्ध के बाद। प्रधानमंत्री मोदी ने तत्काल इज़राइल के साथ एकजुटता व्यक्त की, आतंकवाद को अस्वीकार्य बताते हुए। हालांकि, भारत ने UN में फिलिस्तीनी अधिकारों के लिए वोट किया, जैसे नवंबर 2023 में इज़राइली बस्तियों की निंदा करने वाले प्रस्ताव पर, और गाजा में मानवीय सहायता भेजी। दिसंबर 2023 में UNGA के एक प्रस्ताव पर भारत ने तत्काल युद्धविराम और बंधकों की रिहाई का समर्थन किया, लेकिन अप्रैल 2024 में UNHRC के एक प्रस्ताव पर abstain रहा, जिसमें इज़राइल पर युद्ध अपराधों का आरोप था।2026 तक, यह संतुलन जारी है, जहां भारत दो-राज्य समाधान की वकालत करता है, फिलिस्तीनी नागरिकों की रक्षा पर जोर देता है, इज़राइल के साथ सुरक्षा सहयोग बनाए रखता है, और अरब देशों तथा अमेरिका-यूरोप के साथ व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करता है। वैश्विक दक्षिण के नेता के रूप में भारत की महत्वाकांक्षा—जैसा कि 2023 के G20 शिखर सम्मेलन और ग्लोबल साउथ वॉयस समिट में दिखा—फिलिस्तीनी मुद्दे को छोड़ने की अनुमति नहीं देती, क्योंकि इससे उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होगी।
निष्कर्षतः, भारत की इज़राइल–फिलिस्तीन नीति को केवल एक पक्षीय समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह इतिहास, वैचारिक विरासत, रणनीतिक हित, आर्थिक निर्भरता, घरेलू संवेदनशीलता और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का समन्वित परिणाम है। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में—जैसे गाजा संकट और क्षेत्रीय तनावों में—भारत का स्थायी लक्ष्य वैश्विक न्याय, क्षेत्रीय स्थिरता और राष्ट्रीय हितों का संतुलन बना हुआ है। यह नीति न केवल प्रासंगिक है, बल्कि एक उभरती महाशक्ति की परिपक्वता को भी दर्शाती है, जो बहुपक्षीयता और नियम-आधारित व्यवस्था की ओर अग्रसर है।
Comments
Post a Comment