भारत का 'बेबी ब्रह्मोस': ₹2.3 करोड़ में दुनिया का सबसे सस्ता लेकिन सबसे घातक एयर-लॉन्च्ड प्रिसिजन स्ट्राइक हथियार
वैश्विक रक्षा बाजार में जहां महंगे हथियारों की होड़ मची हुई है, भारत ने अपनी आत्मनिर्भरता की एक नई मिसाल कायम की है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने पिनाका रॉकेट सिस्टम का एयर-लॉन्च्ड संस्करण विकसित कर लिया है, जिसे 'बेबी ब्रह्मोस' के नाम से जाना जा रहा है। यह न केवल दुनिया का सबसे किफायती प्रिसिजन स्ट्राइक हथियार है, बल्कि अपनी घातक क्षमता से दुश्मनों के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो रहा है। कम लागत में उच्च प्रभाव – यही भारत की इस नवीनतम उपलब्धि का मूल मंत्र है।
पिनाका का विकास: ग्राउंड से स्काई तक की उड़ान
पिनाका की कहानी 1990 के दशक से शुरू होती है, जब DRDO ने भारतीय सेना के लिए एक मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर (MBRL) सिस्टम विकसित किया। शुरू में इसकी रेंज 40 किलोमीटर थी, लेकिन निरंतर उन्नयन से यह अब 120 किलोमीटर तक की गाइडेड रेंज तक पहुंच चुका है। हाल ही में, DRDO ने इसे एयर-लॉन्च्ड रूप में बदल दिया, जो फाइटर जेट्स जैसे Su-30MKI, LCA तेजस और राफेल से लॉन्च किया जा सकता है।
इस नए संस्करण में रॉकेट की लंबाई को घटाकर लगभग 4.8 मीटर किया गया है, ताकि यह विमान के पाइलन पर आसानी से फिट हो सके। ठोस ईंधन पर आधारित यह रॉकेट लॉन्च के साथ ही अपनी पूरी ऊर्जा खर्च कर सुपरसोनिक गति प्राप्त करता है, और फिर एयरोडायनामिक नियंत्रण सतहों की मदद से ग्लाइड करते हुए लक्ष्य तक पहुंचता है। यह मिड-कोर्स सुधार की क्षमता रखता है, जिससे दुश्मन के रडार और एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम्स को चकमा देना आसान हो जाता है।
प्रमुख तकनीकी विशेषताएं:
- लागत: प्रति यूनिट मात्र ₹2.3 करोड़, जो ब्रह्मोस की ₹35-40 करोड़ की तुलना में बेहद कम है।
- रेंज और सटीकता: ग्राउंड वर्जन की 120 किमी रेंज से अधिक, एयर-लॉन्च होने से स्टैंड-ऑफ दूरी बढ़ जाती है। INS, GPS और NavIC गाइडेंस से CEP (सर्कुलर एरर प्रोबेबल) न्यूनतम।
- टारगेट: टैंक समूह, सैनिक टुकड़ियां, एयरबेस, लॉजिस्टिक सेंटर – मुख्यतः टैक्टिकल लक्ष्य।
- प्लेटफॉर्म अनुकूलता: Su-30MKI पर कई यूनिट्स ले जाने की क्षमता, जिससे सैचुरेशन अटैक संभव।
- गति: सुपरसोनिक से हाइपरसोनिक स्तर तक, जो इसे अप्रत्याशित बनाती है।
'बेबी ब्रह्मोस' नाम की वजह: एक तुलनात्मक विश्लेषण
ब्रह्मोस, जो भारत-रूस की संयुक्त परियोजना है, एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है जो Mach 3 की गति से निचली ऊंचाई पर उड़कर बड़े स्ट्रैटेजिक लक्ष्यों जैसे युद्धपोतों या बंकरों को नष्ट करती है। इसकी लागत अधिक होने के कारण यह चुनिंदा ऑपरेशन्स के लिए उपयुक्त है। वहीं, एयर-लॉन्च्ड पिनाका एक गाइडेड रॉकेट है, जो छोटे-मध्यम लक्ष्यों पर तेज, सस्ते और बड़े पैमाने पर हमलों के लिए डिजाइन किया गया।
यह 'बेबी ब्रह्मोस' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह ब्रह्मोस की तरह घातक है, लेकिन छोटा, सस्ता और अधिक लचीला। जहां ब्रह्मोस एक स्नाइपर की तरह सटीक लेकिन महंगा है, वहीं बेबी ब्रह्मोस एक शॉटगन की तरह बड़े क्षेत्र को कवर करता है। दोनों मिलकर भारतीय वायुसेना की स्ट्राइक क्षमता को बहु-आयामी बनाते हैं।
वैश्विक तुलना: अमेरिका से 10 गुना सस्ता, फ्रांस की पहली पसंद
अमेरिका का HIMARS सिस्टम प्रति यूनिट लगभग ₹20 करोड़ का पड़ता है, जबकि भारत का यह संस्करण 10 गुना सस्ता है। फ्रांस का M270 सिस्टम 2027 में रिटायर होने वाला है, और रिपोर्ट्स के अनुसार, फ्रांस अब पिनाका को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। 114 राफेल जेट्स की बड़ी डील के साथ या उसके हिस्से के रूप में यह सिस्टम खरीदने की चर्चा है, जो भारत के रक्षा निर्यात को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।
यह चुनाव फ्रांस जैसे उन्नत देश द्वारा भारतीय तकनीक का चयन है, जो DRDO की विश्वसनीयता को रेखांकित करता है।
सामरिक महत्व: सीमाओं पर नई ताकत
- वायुसेना की बढ़ती शक्ति: Su-30MKI जैसे जेट्स अब रॉकेट आर्टिलरी के रूप में काम करेंगे, पायलट्स को दुश्मन क्षेत्र में प्रवेश किए बिना दूर से हमला करने की सुविधा देंगे।
- सैचुरेशन और ओवरलोड: एक विमान से कई रॉकेट दागकर दुश्मन की एयर डिफेंस को संतृप्त किया जा सकता है, जिससे बचाव मुश्किल हो जाता है।
- चीन और पाकिस्तान के लिए चुनौती: ऑपरेशन जैसे बालाकोट या सिंदूर में यह ब्रह्मोस के साथ मिलकर छोटे लक्ष्यों को भी प्रभावी ढंग से नष्ट कर सकता है।
- निर्यात संभावनाएं: आर्मेनिया को पहले ही पिनाका निर्यात किया जा चुका है, और अब फ्रांस, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा अन्य देश रुचि दिखा रहे हैं।
पिनाका परिवार का भविष्य: Pinaka IV और उससे आगे
DRDO अब Pinaka IV पर काम कर रहा है, जिसकी रेंज 300 किलोमीटर से अधिक होगी। इसका एयर-लॉन्च्ड संस्करण और भी घातक साबित होगा, साथ ही BrahMos-NG (हल्का संस्करण) अलग से विकसित हो रहा है। 2030 तक ये सिस्टम्स उत्पादन में आने की उम्मीद है, जो भारत की मल्टी-लेयर स्ट्राइक क्षमता को वैश्विक स्तर पर बेमिसाल बनाएंगे।
निष्कर्ष: आत्मनिर्भर भारत की जीत
'बेबी ब्रह्मोस' महज एक हथियार नहीं, बल्कि भारत की उस सोच का प्रतीक है जो कहती है – हम आयात पर निर्भर नहीं, बल्कि स्वदेशी नवाचार से दुनिया को चुनौती देंगे। DRDO, भारतीय वायुसेना और रक्षा मंत्रालय की यह उपलब्धि 'कम लागत, अधिक प्रभाव' की नीति को साकार करती है। जब फ्रांस जैसे देश हमसे हथियार मांग रहे हैं, तो भारत रक्षा क्षेत्र में 'विश्व गुरु' बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।
जय हिंद! 🇮🇳🚀
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