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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Assam Polygamy Prohibition Bill 2025: A Landmark Step Toward Gender Justice

असम बहुविवाह निषेध विधेयक 2025: लैंगिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम

सार

27 नवंबर 2025 को असम विधानसभा द्वारा पारित असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 भारतीय व्यक्तिगत विधि सुधारों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा 25 नवंबर को सदन में प्रस्तुत इस विधेयक का उद्देश्य बहुविवाह की प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना तथा छिपाई गई शादियों पर 10 वर्ष तक और प्रत्यक्ष बहुविवाह पर 7 वर्ष तक की कठोर सज़ा देना है। अनुसूचित जनजातियों और छठी अनुसूची क्षेत्रों को इसमें छूट दी गई है, जिससे सांस्कृतिक स्वायत्तता का सम्मान होता है। वैश्विक उदाहरणों, विशेषकर तुर्की के 1926 के सुधारों का उल्लेख करते हुए, राज्य सरकार ने इसे महिला सम्मान और समानता की दिशा में निर्णायक कदम बताया है। यह लेख विधेयक के विधिक ढांचे, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, राजनीतिक निहितार्थों तथा संभावित चुनौतियों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है और तर्क देता है कि यह विधेयक विविध सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में विवाह संबंधी अधिकारों को पुनर्परिभाषित करने का मार्ग प्रशस्त करता है।


परिचय

भारत में व्यक्तिगत विधियाँ लंबे समय से धार्मिक समुदायों की परंपराओं और आस्था-आधारित मान्यताओं पर आधारित रही हैं। इनमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और परिवार जैसे विषय शामिल हैं। विभिन्न समुदायों में इनकी व्याख्याएँ अलग-अलग होने के कारण विवाह संबंधी अधिकार, विशेषकर महिलाओं के संदर्भ में, बराबरी का स्वरूप ग्रहण नहीं कर सके। असम जैसे बहु-जातीय और बहुधार्मिक समाज में यह बहस पिछले तीन दशकों से राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का प्रमुख हिस्सा रही है।

ऐसे परिदृश्य में असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 का उभरना केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि एक सामाजिक सुधार प्रक्रिया का विस्तार है। विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित इस विधेयक को राज्य सरकार ने “नारी सम्मान” और “सामाजिक न्याय” के रूप में प्रस्तुत किया है। मुख्यमंत्री सरमा ने सदन में स्पष्ट कहा कि यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि एक “सार्वभौमिक मानवीय मूल्य” की स्थापना का प्रयास है, जिसके अंतर्गत सभी नागरिक—हिंदू, मुस्लिम, ईसाई या अन्य—समान रूप से प्रतिबंध के दायरे में आएँगे।


ऐतिहासिक और विधिक संदर्भ

भारत की व्यक्तिगत विधियों में बहुविवाह संबंधी प्रावधान धार्मिक आधार पर भिन्न रहे हैं। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 में बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया था, जबकि मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत चार विवाह की अनुमति पारंपरिक रूप से मान्य रही है। असम के ग्रामीण तथा कुछ जनजातीय क्षेत्रों में प्रचलित इस प्रथा ने कई बार महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक अधिकारों को कमजोर किया है।

राज्य सरकार इसके पहले भी महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के लिए सक्रिय रही है—जैसे 2023 में बाल विवाह के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान। इसी क्रम में 9 नवंबर 2025 को मंत्रिमंडल ने बहुविवाह निषेध विधेयक को स्वीकृति दी। वैश्विक उदाहरणों से भी यह स्पष्ट है कि कई मुस्लिम-बहुल देशों—जैसे तुर्की—ने आधुनिक कानूनों के तहत बहुविवाह को प्रतिबंधित किया है। पाकिस्तान ने भी इसके लिए कठोर संवैधानिक और मध्यस्थता-आधारित उपाय लागू किए हैं। इस तरह, असम का यह प्रयास न केवल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में निर्देशित समान नागरिक संहिता की भावना से मेल खाता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वैधानिक प्रवृत्तियों के अनुरूप भी है।


विधेयक के प्रमुख प्रावधान

1. बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध

विधेयक के अनुसार कोई भी व्यक्ति, जिसके जीवनसाथी जीवित हों, पुनः विवाह नहीं कर सकता—जब तक पूर्व विवाह कानूनी रूप से तलाक या निरस्तीकरण द्वारा समाप्त ना हो। इसे एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध घोषित किया गया है।

2. कठोर दंड

  • बहुविवाह करने पर 7 वर्ष तक का कठोर कारावास और आर्थिक दंड।
  • पूर्व विवाह को छिपाने पर 10 वर्ष तक सज़ा।
  • सहायक व्यक्तियों—जैसे काज़ी, पुजारी, ग्रामीण प्रधान, माता-पिता या संरक्षक—पर दो वर्ष तक का दंड और 1 से 1.5 लाख रुपये तक का जुर्माना।
  • पुनरावृत्ति के मामलों में दंड दोगुना होगा।

3. पीड़ित महिलाओं के लिए प्रतिकर

विधेयक एक विशेष राहत कोष स्थापित करता है जिससे प्रभावित महिलाओं को आर्थिक सहायता, आश्रय और कानूनी परामर्श प्रदान किया जाएगा।

4. सामाजिक और राजनीतिक अयोग्यता

दोषसिद्ध व्यक्तियों को सरकारी नौकरियों, कल्याणकारी योजनाओं और स्थानीय निकायों के चुनावों के लिए अयोग्य घोषित किया गया है।

5. अनुसूचित जनजातियों और छठी अनुसूची क्षेत्रों में छूट

बोडोलैंड, कार्बी आंगलोंग आदि क्षेत्रों को उनकी स्वायत्तता और परंपराओं के मद्देनज़र छूट दी गई है, हालांकि राज्य सरकार ने अपेक्षा जताई है कि वहाँ भी स्थानीय स्तर पर समान कानून बनाए जाएँगे।


राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और सामाजिक निहितार्थ

विधानसभा में इस विधेयक को लगभग सर्वसम्मति समर्थन मिला। हालांकि विपक्ष ने इसके दुरुपयोग की संभावना और अंतरधार्मिक विवाहों के मामलों में सावधानी बरतने की अपील की। मुस्लिम संगठनों ने इसे शरिया में हस्तक्षेप बताया, परंतु सरकार ने तर्क दिया कि “सच्चे इस्लाम” में भी बिना पूर्व पत्नी की सहमति बहुविवाह की अनुमति नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विधेयक भाजपा की 'समान नागरिक अधिकार' आधारित राजनीति को मज़बूत करता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ जनसांख्यिकीय चिंताएँ लंबे समय से चर्चा में हैं। इसके साथ ही 2026 के बाद समान नागरिक संहिता लागू करने की राज्य सरकार की प्रतिबद्धता को भी यह विधेयक आधार देता है।


समीक्षात्मक मूल्यांकन और चुनौतियाँ

यद्यपि यह विधेयक न्याय, समानता और महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण है, परंतु इसके प्रभावी क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ हैं—

  • भौगोलिक विषमता: असम के दूरदराज़ और जनजातीय क्षेत्रों में जागरूकता और पुलिस-न्यायिक ढाँचों की सीमाएँ इसे लागू करने में बाधा बन सकती हैं।
  • मुस्लिम समुदाय में अविश्वास: ऐतिहासिक कारणों से कुछ समुदायों को इसमें लक्षित करने की आशंका है, जिसे दूर करने के लिए संवाद और सामाजिक जागरूकता अनिवार्य है।
  • आर्थिक निर्भरता: जिन परिवारों में बहुविवाह चलन में है, वहाँ महिलाएँ अक्सर आर्थिक रूप से निर्भर होती हैं। केवल दंड पर्याप्त नहीं होगा; कौशल-विकास, शिक्षा और रोजगार के अवसर भी प्रदान करने होंगे।
  • कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता: शिकायत दर्ज कराने, साक्ष्य जुटाने और न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया महिलाओं के लिए सरल और सुलभ बनानी होगी।

फिर भी, शोध से पता चलता है कि जब दंडात्मक उपायों के साथ सामाजिक जागरूकता और महिला-सहायता कार्यक्रम जोड़े जाते हैं, तो बहुविवाह की घटनाएँ उल्लेखनीय रूप से कम होती हैं।


निष्कर्ष

असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 निस्संदेह एक सामाजिक और विधिक सुधार का मील का पत्थर है। यह व्यक्तिगत विधियों में समानता का मार्ग प्रशस्त करता है, महिलाओं की गरिमा को प्राथमिकता देता है और विवाह संस्था को अधिक नैतिक और न्यायपूर्ण बनाता है। वैश्विक आधुनिकताओं से प्रेरित यह कदम भारत में समान नागरिक संहिता संबंधी बहसों को नई दिशा प्रदान करता है।

इसके सफल क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है कि—

  • समुदायों में विश्वास का निर्माण हो,
  • महिलाओं के आर्थिक-सामाजिक सशक्तिकरण को बढ़ाया जाए, और
  • पारदर्शी, निष्पक्ष और संवेदनशील प्रशासनिक ढाँचा विकसित किया जाए।

यदि ये प्रयास सफल होते हैं, तो यह विधेयक असम ही नहीं, पूरे भारत के लिए विवाह संबंधी सुधारों का एक प्रभावी मॉडल बन सकता है—जहाँ महिलाओं के अधिकार वास्तव में  "non-negotiable" माने जाएँगे।


With The Hindu Inputs 

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