Israel’s West Bank Land Registration Revival: De Facto Annexation, Legal Impact and Geopolitical Consequences
इज़राइल की वेस्ट बैंक में भूमि पंजीकरण प्रक्रिया की बहाली: एक de facto विलय की दिशा में कदम
परिचय
15 फरवरी 2026 को इज़राइल की कैबिनेट ने कब्जे वाले वेस्ट बैंक में भूमि पंजीकरण (land registration) की प्रक्रिया शुरू करने की मंजूरी दी, जो 1967 के बाद पहली बार हो रहा है। यह फैसला वेस्ट बैंक (जिसे इज़राइल में जूडिया और समरिया कहा जाता है) पर इज़राइल के नियंत्रण को और मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इज़राइली सरकार इसे प्रशासनिक सुधार और पारदर्शिता का मुद्दा बताती है, जबकि फिलिस्तीनी पक्ष, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और कई देश इसे "de facto annexation" (वास्तविक विलय) की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। यह लेख इस फैसले के ऐतिहासिक, कानूनी, राजनीतिक और भू-राजनीतिक संदर्भों का अकादमिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
वेस्ट बैंक पर 1967 के छह-दिवसीय युद्ध में इज़राइल ने कब्जा किया था, जब यह क्षेत्र जॉर्डन के नियंत्रण में था। 1948-1967 तक जॉर्डन ने यहां भूमि रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया चलाई थी, लेकिन केवल लगभग एक-तिहाई भूमि ही औपचारिक रूप से पंजीकृत हुई। 1967 के बाद इज़राइल ने इस प्रक्रिया को रोक दिया। परिणामस्वरूप, वेस्ट बैंक की अधिकांश भूमि (विशेषकर एरिया C में, जो कुल क्षेत्रफल का लगभग 60% है) बिना औपचारिक मालिकाना हक के रही।
ओस्लो समझौतों (1993-1995) के तहत वेस्ट बैंक को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया गया:
- एरिया A: फिलिस्तीनी नागरिक और सुरक्षा नियंत्रण (18%)
- एरिया B: फिलिस्तीनी नागरिक नियंत्रण, इज़राइली सुरक्षा नियंत्रण (22%)
- एरिया C: पूर्ण इज़राइली सैन्य और नागरिक नियंत्रण (60%)
एरिया C में अधिकांश इज़राइली बस्तियां (settlements) स्थित हैं, जहां लगभग 3.25 लाख से अधिक इज़राइली बस्तीवासी रहते हैं।
फैसले का विवरण
कैबिनेट के फैसले के मुख्य बिंदु:
- भूमि पंजीकरण प्रक्रिया की शुरुआत, जिसमें एरिया C पर फोकस।
- 2026-2030 के लिए शुरुआती बजट NIS 244 मिलियन (लगभग $79 मिलियन) और 35 नए पदों का सृजन।
- यदि कोई भूमि का दावा नहीं करता या प्रमाण नहीं दे पाता, तो उसे राज्य भूमि (state land) घोषित किया जा सकता है।
- इससे पहले (8 फरवरी 2026) सुरक्षा कैबिनेट ने बस्तीवासियों के लिए भूमि खरीद आसान बनाने, जॉर्डनियन कानून निरस्त करने और भूमि रजिस्ट्री को सार्वजनिक करने जैसे कदम उठाए थे।
वित्त मंत्री बेजालेल स्मोट्रिच ने इसे "settlement revolution" कहा, जबकि रक्षा मंत्री इज़राइल काट्ज ने इसे सुरक्षा और "illegal Palestinian registration" के जवाब के रूप में पेश किया।
कानूनी आयाम
अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार:
- 1949 की जेनेवा कन्वेंशन (IV) का अनुच्छेद 49: कब्जे वाली शक्ति द्वारा अपनी नागरिक आबादी को कब्जे वाले क्षेत्र में स्थानांतरित करना निषिद्ध है।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के कई प्रस्ताव (जैसे 2334, 2016) बस्तियों को अवैध मानते हैं।
- ICJ की 2024 की राय में भी इज़राइल की कब्जे वाली नीतियां अवैध घोषित की गईं।
इज़राइल इन बस्तियों को "disputed" मानता है, न कि "occupied", और ऐतिहासिक-धार्मिक दावे पेश करता है।
यह नया पंजीकरण प्रक्रिया कई विशेषज्ञों द्वारा "ब्यूरोक्रेटिक annexation" कहा जा रहा है, क्योंकि यह औपचारिक विलय घोषणा के बिना ही बड़े पैमाने पर भूमि को राज्य नियंत्रण में ला सकती है। शांति संगठन Peace Now और Yesh Din के अनुसार, इससे एरिया C का 83% तक हिस्सा राज्य भूमि बन सकता है।
राजनीतिक प्रभाव
- इज़राइली पक्ष: नेतन्याहू सरकार की दक्षिणपंथी गठबंधन (विशेषकर स्मोट्रिच और इटामर बेन-ग्विर) के लिए यह चुनावी वादों की पूर्ति है। बस्तियां राजनीतिक आधार हैं।
- फिलिस्तीनी पक्ष: राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इसे "अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन" और "de facto annexation" कहा। फिलिस्तीनी प्राधिकरण (PA) की वैधता और प्रभाव कमजोर होगा।
- दो-राज्य समाधान: यह कदम दो-राज्य समाधान को लगभग असंभव बना देता है, क्योंकि निरंतर भूमि हड़पने से फिलिस्तीनी राज्य के लिए सतत क्षेत्र नहीं बचता।
- अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: कतर, सऊदी अरब, UAE, EU और UN ने निंदा की। अमेरिका (ट्रंप प्रशासन के संदर्भ में) की प्रतिक्रिया मिश्रित रही।
निष्कर्ष
यह भूमि पंजीकरण प्रक्रिया केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक कदम है जो इज़राइल के वेस्ट बैंक पर स्थायी नियंत्रण को संस्थागत बनाने की दिशा में है। यह de jure (कानूनी) विलय से बचते हुए de facto विलय को आगे बढ़ाता है। लंबे समय में इससे संघर्ष और गहरा सकता है, फिलिस्तीनी आबादी की आर्थिक-सामाजिक स्थिति बिगड़ सकती है, और क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह परीक्षा है कि क्या वह अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों पर अडिग रहकर प्रभावी कदम उठा पाता है, या राजनीतिक हितों के आगे झुक जाता है। यह घटना इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष के इतिहास में एक नया, लेकिन चिंताजनक अध्याय जोड़ती है।
With Reuters Inputs
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