Pakistan–US Relations: “Used and Throw Like Toilet Paper” Remark, Historical Context, Strategic Mistakes and Future Policy
पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध: “टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल कर फेंक दिया” – एक विश्लेषणात्मक लेख
भूमिका
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन और शत्रुता प्रायः हितों पर आधारित होती हैं। पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध इसका स्पष्ट उदाहरण हैं। हाल के दिनों में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने अमेरिका के साथ संबंधों पर तीखी आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका ने पाकिस्तान को “used and threw us like toilet paper” यानी “टॉयलेट पेपर की तरह इस्तेमाल किया और फिर फेंक दिया।” यह बयान पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली या किसी सार्वजनिक मंच पर दिया गया, जहां उन्होंने अतीत के अनुभवों के आधार पर अमेरिका पर आरोप लगाया कि पाकिस्तान ने अमेरिका के लिए भारी कुर्बानियां दीं, लेकिन बदले में उसे धोखा और उपेक्षा ही मिली।
यह बयान पाकिस्तान की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ की ओर संकेत करता है, जहां अब पाकिस्तान स्वयं को स्वतंत्र निर्णय लेने वाला देश के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों की नींव 1950 के दशक में पड़ी, जब शीत युद्ध के दौर में पाकिस्तान ने अमेरिका द्वारा दी जाने वाली सैन्य और आर्थिक सहायता स्वीकार की। सेंटो (SEATO) और सेंटो (CENTO) जैसे समझौतों के माध्यम से पाकिस्तान अमेरिका का सहयोगी बना। 1965 और 1971 के युद्धों में अमेरिका की ओर से पाकिस्तान को सीमित समर्थन मिला, जिससे पहली बार आपसी विश्वास में कमी आई।
1980 के दशक में अफगान जिहाद के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान को अपना सबसे बड़ा सहयोगी माना। अरबों डॉलर की सहायता, आधुनिक हथियार और खुफिया जानकारी साझा की गई। पाकिस्तान ने अफगान मुजाहिदीन को समर्थन दिया और सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध में अहम भूमिका निभाई। लेकिन 1989 में सोवियत वापसी के बाद अमेरिका ने “प्रेसलर संशोधन” (Pressler Amendment) के तहत पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाए और एफ-16 लड़ाकू विमानों की आपूर्ति रोक दी। यह पहला बड़ा “इस्तेमाल और फेंकने” का अनुभव था।
9/11 के बाद अमेरिका ने एक बार फिर पाकिस्तान को “मेजर नॉन-नाटो अलाय” का दर्जा दिया और “आतंक के खिलाफ युद्ध” में उसे फ्रंटलाइन स्टेट घोषित किया। पाकिस्तान ने नाटो आपूर्ति मार्ग, खुफिया सहयोग और सैन्य अभियानों में सहायता की। लेकिन ड्रोन हमलों, एबटाबाद घटना और ओसामा बिन लादेन की मौजूदगी पर उठे सवालों ने संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया। 2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद पाकिस्तान एक बार फिर अकेला पड़ गया, जबकि उसे तालिबान सरकार और आतंकवाद से जुड़े आरोपों का सामना करना पड़ रहा है।
ख्वाजा आसिफ का बयान और उसका अर्थ
ख्वाजा आसिफ का यह कठोर बयान पाकिस्तान की नई पीढ़ी की सोच को दर्शाता है। उनका कहना है कि पाकिस्तान अतीत से सबक नहीं लेता और बार-बार वही गलतियां दोहराता है। अमेरिका ने पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति, सैन्य क्षमता और बलिदानों का उपयोग किया, लेकिन जब उसके हित पूरे हो गए तो पाकिस्तान को “टॉयलेट पेपर” की तरह इस्तेमाल कर फेंक दिया।
यह बयान केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि यथार्थपरक भी है। पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में 80,000 से अधिक जानें गंवाईं और अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान झेला, फिर भी आज उसे एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट, आर्थिक दबाव और क्षेत्रीय अलगाव का सामना करना पड़ रहा है।
निष्कर्ष और सीख
अमेरिका जैसी वैश्विक शक्ति के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। पाकिस्तान को अब “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। चीन, रूस, सऊदी अरब, तुर्की और अन्य देशों के साथ संतुलित संबंध स्थापित कर अमेरिका पर निर्भरता कम की जा सकती है।
ख्वाजा आसिफ का यह बयान एक चेतावनी है कि पाकिस्तान अब “इस्तेमाल होने” के लिए तैयार नहीं है। अतीत के अनुभवों से सीख लेते हुए भविष्य की विदेश नीति को आत्मनिर्भर, राष्ट्रीय हितों पर आधारित और राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा करने वाली होना चाहिए। यदि पाकिस्तान ने यह सबक सीख लिया, तो यह बयान इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में याद किया जाएगा।
यह बयान पाकिस्तान के आत्मसम्मान का प्रतीक है, और अब समय आ गया है कि हम “टॉयलेट पेपर” नहीं, बल्कि एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान स्थापित करें।
Comments
Post a Comment