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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

16th Finance Commission 2026–31: Continuity, Reforms and the Future of India’s Federal Fiscal Framework

16वाँ वित्त आयोग: संघीय वित्तीय ढाँचे में निरंतरता और सुधार की नई दिशा

भूमिका

भारतीय संघीय व्यवस्था में वित्त आयोग एक केंद्रीय संवैधानिक संस्था है, जो केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के न्यायसंगत वितरण को सुनिश्चित करती है। संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत गठित 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट (2026–27 से 2030–31) ऐसे समय में प्रस्तुत की गई है, जब भारत महामारी के बाद की आर्थिक पुनर्बहाली, जलवायु परिवर्तन, तीव्र शहरीकरण और बढ़ते राजकोषीय दबावों जैसी बहुआयामी चुनौतियों का सामना कर रहा है।

डॉ. अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में गठित इस आयोग ने केवल वित्तीय हस्तांतरण तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि दक्षता, उत्तरदायित्व और सतत विकास को संघीय वित्त व्यवस्था के मूल स्तंभ के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। यह रिपोर्ट पूर्ववर्ती आयोगों की निरंतरता बनाए रखते हुए कुछ नवीन तत्वों को शामिल करती है, जो भारतीय संघवाद को अधिक परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।


कर हस्तांतरण में स्थिरता: ऊर्ध्वाधर वितरण

16वें वित्त आयोग ने केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी को 41 प्रतिशत पर बनाए रखने की सिफारिश की है। यह निर्णय 15वें वित्त आयोग की नीति की निरंतरता को दर्शाता है और केंद्र की व्यापक राष्ट्रीय जिम्मेदारियों—जैसे रक्षा, राष्ट्रीय अवसंरचना, जलवायु कार्रवाई और सामाजिक कल्याण—को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

साथ ही, आयोग ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा प्रमाणित शुद्ध कर आय के आधार पर वितरण को अधिक पारदर्शी बनाने की सिफारिश की है, जिससे कर हस्तांतरण की विश्वसनीयता बढ़ेगी।

हालाँकि, इस स्थिरता का एक नकारात्मक पहलू यह है कि उपकर और अधिभार (cess & surcharge)—जो विभाज्य पूल का हिस्सा नहीं होते—केंद्र की वित्तीय शक्ति को लगातार बढ़ा रहे हैं। यह स्थिति विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों के लिए असंतोष का कारण बनी हुई है, जो उच्च कर योगदान के बावजूद अपेक्षाकृत कम लाभ प्राप्त करते हैं।


क्षैतिज वितरण: समानता और प्रदर्शन का संतुलन

राज्यों के बीच संसाधनों के वितरण में 16वें वित्त आयोग ने सूत्रात्मक ढाँचे में महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। नए मापदंड निम्नानुसार हैं:

  • आय दूरी: 42.5%
  • जनसंख्या (2011): 17.5%
  • जनसांख्यिकीय प्रदर्शन: 10%
  • क्षेत्रफल: 10%
  • वन एवं पारिस्थितिकी: 10%
  • GDP योगदान: 10% (नया मापदंड)

GDP योगदान को शामिल करना एक महत्वपूर्ण वैचारिक बदलाव को दर्शाता है। यह न केवल पिछड़े राज्यों की सहायता करता है, बल्कि बेहतर आर्थिक प्रदर्शन करने वाले राज्यों को भी मान्यता देता है। इससे दक्षिणी और औद्योगिक राज्यों की उस शिकायत को आंशिक रूप से संबोधित किया गया है कि उन्हें जनसंख्या नियंत्रण और आर्थिक दक्षता के बावजूद “दंडित” किया जाता है।

हालाँकि, जनसंख्या को अधिक वज़न दिए जाने से उत्तर और मध्य भारत के उच्च जनसंख्या वाले राज्यों को अपेक्षाकृत लाभ मिल सकता है। इस प्रकार, यह मॉडल समानता और दक्षता के बीच एक संतुलन साधने का प्रयास करता है।


अनुदान व्यवस्था: राजस्व घाटा अनुदान का समापन और स्थानीय निकायों पर जोर

16वें वित्त आयोग की सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद सिफारिशों में से एक है राजस्व घाटा अनुदान का पूर्ण समापन। यह निर्णय राज्यों को अपने राजस्व स्रोतों को मजबूत करने और व्यय प्राथमिकताओं को पुनर्संतुलित करने के लिए प्रेरित करता है।

इसके स्थान पर, आयोग ने स्थानीय निकायों को केंद्र में रखा है और कुल 7.91 लाख करोड़ रुपये के अनुदान की सिफारिश की है, जिसमें 80 प्रतिशत बुनियादी और 20 प्रतिशत प्रदर्शन-आधारित अनुदान शामिल हैं।

  • ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए 4.35 लाख करोड़ रुपये
  • शहरी स्थानीय निकायों के लिए 3.56 लाख करोड़ रुपये, जिसमें अपशिष्ट जल प्रबंधन और शहरीकरण प्रीमियम जैसे विशेष प्रावधान शामिल हैं

यह दृष्टिकोण जमीनी लोकतंत्र को सशक्त बनाता है, किंतु ऑडिटेड खातों और राज्य वित्त आयोगों की सिफारिशों की अनुपालना जैसी शर्तें कमजोर प्रशासनिक क्षमता वाले निकायों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं।


आपदा प्रबंधन और जलवायु यथार्थ

जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने 2.04 लाख करोड़ रुपये के आपदा प्रबंधन कोष की सिफारिश की है। विशेष रूप से, आपदा-पूर्व निवारण (mitigation) पर जोर यह संकेत देता है कि नीति अब केवल राहत तक सीमित नहीं रही, बल्कि दीर्घकालिक लचीलापन विकसित करने की दिशा में बढ़ रही है।


राजकोषीय अनुशासन और संरचनात्मक सुधार

16वें वित्त आयोग ने राजकोषीय अनुशासन को अपनी सिफारिशों का केंद्रीय आधार बनाया है।

  • केंद्र का राजकोषीय घाटा 2030–31 तक GDP के 3.5% तक सीमित करने का लक्ष्य
  • राज्यों के लिए GSDP के 3% की सीमा
  • ऑफ-बजट उधारियों को समाप्त कर उन्हें बजट में शामिल करने का निर्देश

इसके अतिरिक्त, डिस्कॉम सुधार, सब्सिडी युक्तिकरण और राज्य सार्वजनिक उपक्रमों के पुनर्गठन जैसे सुझाव यह दर्शाते हैं कि आयोग संरचनात्मक सुधारों को विकास की पूर्वशर्त मानता है। हालाँकि, इन सुधारों का राजनीतिक और सामाजिक प्रतिरोध अल्पकाल में राज्यों के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न कर सकता है।


आलोचनात्मक मूल्यांकन

यद्यपि यह रिपोर्ट संघीय वित्तीय ढाँचे को अधिक अनुशासित और परिणामोन्मुख बनाती है, फिर भी कुछ चिंताएँ बनी रहती हैं।

  • राजस्व घाटा अनुदान का अंत वित्तीय रूप से कमजोर राज्यों पर दबाव बढ़ा सकता है।
  • GDP आधारित मापदंड क्षेत्रीय असंतुलन को जन्म दे सकते हैं।
  • उपकरों की बढ़ती भूमिका सहकारी संघवाद की भावना को कमजोर करती है।

इसके अतिरिक्त, प्रदर्शन-आधारित अनुदानों के लिए आवश्यक प्रशासनिक क्षमता के अभाव में असमानता बढ़ने का खतरा भी बना हुआ है।


निष्कर्ष

16वाँ वित्त आयोग भारतीय संघीय वित्त व्यवस्था का एक परिपक्व और दूरदर्शी दस्तावेज है। यह निरंतरता और सुधार, समानता और दक्षता, तथा सहायता और उत्तरदायित्व—इन सभी के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

यदि केंद्र और राज्य सहयोगी संघवाद की भावना के साथ इसकी सिफारिशों को लागू करते हैं, तो यह रिपोर्ट न केवल वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करेगी, बल्कि 2047 तक विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अन्यथा, यह संघीय तनावों को गहरा करने का जोखिम भी रखती है।

मुख्य स्रोत (Sources):

  • Finance Commission of India (आधिकारिक वेबसाइट)

– 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट, सिफारिशें और दस्तावेज

👉 fincomindia.nic.in

  • PRS Legislative Research

– 16th Finance Commission Report का सार, विश्लेषण और तुलनात्मक अध्ययन

👉 prsindia.org

  • The Hindu (Editorial & Explained सेक्शन)

– संघीय वित्त, वित्त आयोग और राजकोषीय संघवाद पर विश्लेषणात्मक लेख

  • Indian Express (Explained / Opinion)

– वित्त आयोग की प्रमुख सिफारिशों और राज्यों पर प्रभाव का विश्लेषण

  • Union Budget & MoF Documents

– राजकोषीय घाटा, कर्ज लक्ष्य, आपदा प्रबंधन कोष

👉 indiabudget.gov.in

  • NITI Aayog & RBI Reports (संदर्भात्मक)

– Fiscal federalism, state finances, debt sustainability


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