बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार: G4 देशों की म्यूनिख बैठक का ऐतिहासिक महत्व
भूमिका: बदलती विश्व-व्यवस्था और सुधार की अनिवार्यता
21वीं सदी की वैश्विक राजनीति गहन संक्रमण के दौर से गुजर रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित बहुपक्षीय संस्थाएं—विशेषकर संयुक्त राष्ट्र—आज यूक्रेन युद्ध, गाज़ा–मध्य पूर्व संकट, इंडो-पैसिफिक तनाव, जलवायु आपातकाल, महामारी, और साइबर–स्पेस की चुनौतियों से जूझ रही हैं। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि 1945 की संस्थागत संरचनाएँ 2026 की वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं रहीं।
इसी पृष्ठभूमि में G4 देशों—भारत, जर्मनी, जापान और ब्राज़ील—द्वारा बहुपक्षीय व्यवस्था, खासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), में सुधार की मांग को नया बल मिला है। फरवरी 2026 में के दौरान आयोजित G4 विदेश मंत्रियों की बैठक इस दिशा में एक निर्णायक प्रतीक बनकर उभरी।
G4 का उदय: प्रतिनिधित्व की कमी के विरुद्ध सामूहिक आवाज
G4 समूह का औपचारिक उभार 2005 में हुआ, जब इन चार देशों ने UNSC सुधार के लिए संयुक्त प्रस्ताव प्रस्तुत किया। आज ये देश वैश्विक अर्थव्यवस्था और शासन में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं—
- भारत: विश्व की अग्रणी उभरती शक्ति और संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों का सबसे बड़ा योगदानकर्ता।
- जापान और जर्मनी: विकास सहायता, मानवीय राहत और वैश्विक वित्तीय स्थिरता के प्रमुख स्तंभ।
- ब्राज़ील: लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और ग्लोबल साउथ की सशक्त आवाज।
इसके बावजूद, UNSC की स्थायी सदस्यता अब भी केवल पाँच देशों (P5) तक सीमित है—एक ऐसी व्यवस्था जो उपनिवेशोत्तर विश्व और उभरती शक्तियों के यथार्थ को प्रतिबिंबित नहीं करती। G4 का तर्क है कि वैश्विक शांति और सुरक्षा पर निर्णय लेने वाली संस्था का प्रतिनिधित्व 21वीं सदी के शक्ति-संतुलन के अनुरूप होना चाहिए।
म्यूनिख 2026: एक प्रतीकात्मक बैठक से आगे
2026 का म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन भू-राजनीतिक अस्थिरताओं की छाया में आयोजित हुआ। इसी मंच पर 14 फरवरी को G4 विदेश मंत्रियों की कार्यकारी डिनर बैठक हुई—जो कई मायनों में ऐतिहासिक रही।
बैठक में भारत के विदेश मंत्री , जर्मनी, जापान और ब्राज़ील के समकक्षों ने भाग लिया। यह पहली बार था जब G4 ने न्यूयॉर्क (UNGA) से बाहर, म्यूनिख जैसे वैश्विक सुरक्षा मंच पर संगठित उपस्थिति दर्ज की।
इस बैठक के प्रमुख निहितार्थ थे:
- UN@80 के बाद का संकल्प: संयुक्त राष्ट्र की 80वीं वर्षगांठ के पश्चात सुधार को ठोस दिशा देना।
- समेकित मॉडल (Consolidated Model) पर सहमति, जिससे UNSC विस्तार के लिए व्यावहारिक खाका तैयार हो सके।
- IGN (Intergovernmental Negotiations) में आपसी समन्वय बढ़ाने का निर्णय।
- एक-दूसरे की स्थायी सदस्यता दावेदारी के प्रति स्पष्ट समर्थन।
यह बैठक केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं थी, बल्कि सुधार के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन थी।
सुधारीत बहुपक्षीयता: G4 का वैचारिक ढांचा
G4 द्वारा प्रयुक्त “सुधारित बहुपक्षीयता” एक सैद्धांतिक नारा नहीं, बल्कि शासन का वैकल्पिक विज़न है। इसके तीन केंद्रीय स्तंभ हैं:
- समावेशिता (Inclusivity) – ग्लोबल साउथ, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया को निर्णायक मंचों पर वास्तविक स्थान।
- प्रभावशीलता (Effectiveness) – UNSC को तेज़, उत्तरदायी और मानवीय संकटों पर निर्णायक बनाने की आवश्यकता।
- न्याय और वैधता (Legitimacy) – सीमित देशों के वीटो वर्चस्व के बजाय लोकतांत्रिक सहमति आधारित व्यवस्था।
भारत बार-बार यह रेखांकित करता रहा है कि “जो संस्थाएँ समय के साथ नहीं बदलतीं, वे अप्रासंगिक हो जाती हैं।” म्यूनिख बैठक इसी दर्शन का मूर्त रूप है।
चुनौतियाँ: सुधार की राह के रोड़े
हालाँकि G4 की एकजुटता उल्लेखनीय है, परंतु राह आसान नहीं।
- चीन भारत और जापान की स्थायी सदस्यता को लेकर आशंकित है।
- अफ्रीकी संघ का Ezulwini Consensus अलग प्रतिनिधित्व मॉडल की माँग करता है।
- कुछ P5 देश वीटो अधिकार में किसी भी बदलाव के पक्ष में नहीं हैं।
फिर भी, G4 का तर्क सशक्त है—सुधार में देरी का अर्थ है वैश्विक संकटों पर असफलता और मानवीय पीड़ा में वृद्धि।
निष्कर्ष: इतिहास के मोड़ पर खड़ा विश्व
G4 देशों की म्यूनिख बैठक बहुपक्षीय सुधार की यात्रा में एक मील का पत्थर है। यह संकेत देती है कि उभरते लोकतंत्र अब केवल नियम-पालक नहीं, बल्कि नियम-निर्माता बनने को तैयार हैं।
यदि यह प्रयास सफल होता है, तो UNSC अधिक प्रतिनिधि, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक विश्वसनीय बनेगा—और वैश्विक शासन में संतुलन आएगा। म्यूनिख 2026 केवल एक बैठक नहीं, बल्कि उस नई इमारत की नींव है, जिसमें 21वीं सदी की विश्व-व्यवस्था आकार लेगी।
समय आ गया है कि दुनिया पुरानी दीवारें तोड़े—और साझा भविष्य के लिए नई संरचना खड़ी करे।
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