बांग्लादेश के आम चुनाव 2026: राजनीतिक पुनर्जन्म और लोकतांत्रिक पुनर्संरचना की ऐतिहासिक घड़ी
भूमिका: एक युग का अंत, एक नए अध्याय की शुरुआत
12 फरवरी 2026 को बांग्लादेश ने न केवल अपना 13वां संसदीय आम चुनाव संपन्न किया, बल्कि एक साथ हुए संवैधानिक जनमत संग्रह के माध्यम से अपने राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने का प्रयास भी किया। यह चुनाव सामान्य सत्ता परिवर्तन भर नहीं था, बल्कि अगस्त 2024 की छात्र-नेतृत्व वाली ‘जुलाई क्रांति’ के बाद पहला राष्ट्रीय लोकतांत्रिक परीक्षण था, जिसने देश की सत्ता संरचना को जड़ से हिला दिया। लगभग डेढ़ दशक तक सत्ता में रहीं शेख हसीना के पतन, अवामी लीग की चुनावी अनुपस्थिति और व्यापक संस्थागत सुधारों की पृष्ठभूमि में यह चुनाव बांग्लादेश के इतिहास में एक राजनीतिक पुनर्जन्म के रूप में दर्ज किया जा रहा है।
पृष्ठभूमि: ‘जुलाई क्रांति’ और सत्ता संरचना का ध्वंस
2009 से 2024 तक शेख हसीना का शासन राजनीतिक स्थिरता के साथ-साथ बढ़ते अधिनायकवादी रुझानों के लिए भी जाना गया। विपक्ष का दमन, चुनावों की विश्वसनीयता पर प्रश्न, न्यायपालिका और मीडिया पर दबाव तथा अल्पसंख्यकों—विशेषकर हिंदू समुदाय—के खिलाफ हिंसा के आरोप धीरे-धीरे जन असंतोष में बदलते गए।
अगस्त 2024 में यह असंतोष छात्र आंदोलनों के रूप में विस्फोटित हुआ, जिसे ‘जेन-जी रेवोल्यूशन’ कहा गया। इन प्रदर्शनों में लगभग 1,400 लोगों की मृत्यु ने शासन की वैधता पर गहरा नैतिक आघात पहुंचाया। अंततः शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी और वे भारत में निर्वासन में चली गईं।
इसके बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में गठित अंतरिम सरकार ने लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण को अपना केंद्रीय लक्ष्य बनाया। अवामी लीग को निलंबित किया गया, पूर्व सत्ता संरचना पर कानूनी कार्रवाइयाँ शुरू हुईं और व्यापक सुधारों के लिए ‘जुलाई चार्टर’ तैयार किया गया।
चुनावी प्रक्रिया और राजनीतिक परिदृश्य
2026 के आम चुनावों में लगभग 12.77 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं ने भाग लिया, जिनमें पुरुष, महिलाएं और थर्ड-जेंडर मतदाता शामिल थे। मतदान 299 संसदीय सीटों पर हुआ, क्योंकि एक सीट उम्मीदवार की मृत्यु के कारण रद्द कर दी गई थी। लगभग 1,981 उम्मीदवार मैदान में थे, जबकि हजारों प्रवासी बांग्लादेशियों ने आईटी-आधारित पोस्टल बैलट के माध्यम से मतदान किया—जो चुनावी प्रक्रिया के आधुनिकीकरण का संकेत है।
राजनीतिक रूप से यह चुनाव नए ध्रुवीकरण का प्रतीक रहा।
- एक ओर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेतृत्व वाला गठबंधन था, जिसकी कमान तारिक रहमान के हाथों में थी।
- दूसरी ओर जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला 11-पार्टी गठबंधन, जिसमें 2024 के आंदोलन से उभरी नेशनल सिटिज़न्स पार्टी (NCP) जैसी नई शक्तियाँ शामिल थीं।
अवामी लीग की अनुपस्थिति ने चुनाव को पारंपरिक सत्ता-विपक्ष की बजाय नई वैचारिक प्रतिस्पर्धा में बदल दिया।
सुरक्षा चुनौतियाँ और लोकतांत्रिक परीक्षा
मतदान के दौरान कुछ हिंसक घटनाएँ सामने आईं—खुलना में एक राजनीतिक नेता की मृत्यु, गोपालगंज और मुंशीगंज में विस्फोट तथा कुछ मतदान केंद्रों पर अव्यवस्था। इसके बावजूद, भारी सुरक्षा व्यवस्था और अंतरिम सरकार की सख्ती के कारण चुनाव कुल मिलाकर शांतिपूर्ण रहे।
मुहम्मद यूनुस द्वारा इस दिन को “नए बांग्लादेश का जन्मदिन” कहना केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक नैतिक घोषणा थी—कि सत्ता अब भय नहीं, बल्कि जन-इच्छा से संचालित होगी।
जनमत संग्रह: ‘जुलाई चार्टर’ और संवैधानिक पुनर्रचना
इस चुनाव का सबसे अनूठा पहलू था संवैधानिक जनमत संग्रह, जिसमें 84-बिंदुओं वाले जुलाई चार्टर पर जनता की राय ली गई। इसके प्रमुख प्रस्ताव थे:
- प्रधानमंत्री के लिए कार्यकाल सीमा
- संसद में महिलाओं के लिए बढ़ा हुआ प्रतिनिधित्व
- राष्ट्रपति की भूमिका को सुदृढ़ करना
- न्यायपालिका और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता
- द्विसदनीय संसद और संस्थागत संतुलन
यह जनमत संग्रह बांग्लादेश के इतिहास में पहली बार सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध संवैधानिक सुरक्षा कवच बनाने का प्रयास है।
क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ
इन चुनावों का प्रभाव केवल बांग्लादेश तक सीमित नहीं है।
- भारत-बांग्लादेश संबंध नई सरकार की विचारधारा पर निर्भर करेंगे—विशेषकर सीमा प्रबंधन, अल्पसंख्यक सुरक्षा और व्यापार के मुद्दों पर।
- जमात-ए-इस्लामी की बढ़ती भूमिका क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय हो सकती है।
- दक्षिण एशिया में यह प्रयोग दर्शाता है कि जन-आंदोलन और संस्थागत सुधार मिलकर लोकतंत्र को पुनर्जीवित कर सकते हैं।
निष्कर्ष: आशा और चेतावनी के बीच खड़ा बांग्लादेश
12 फरवरी 2026 का चुनाव बांग्लादेश के लिए केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक आत्ममंथन की प्रक्रिया है। पुराने चेहरों की अनुपस्थिति, युवाओं की निर्णायक भूमिका और संवैधानिक सुधारों की पहल इस बात का संकेत है कि देश एक नए लोकतांत्रिक अनुबंध की ओर बढ़ रहा है।
फिर भी, हिंसा, वैचारिक ध्रुवीकरण और संस्थागत कमजोरी जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। यदि जुलाई चार्टर की भावना को ईमानदारी से लागू किया गया, तो बांग्लादेश न केवल अपने अतीत के घाव भर सकेगा, बल्कि दक्षिण एशिया के लिए लोकतांत्रिक पुनर्जागरण की मिसाल भी बन सकता है।
With The Live Mint Inputs
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