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Polity Point By Arvind Singh PK Rewa

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India Joins Trump’s Gaza Peace Board as Observer: Strategic Balance in Middle East Diplomacy 2026

भारत की गाजा शांति योजना में भागीदारी: ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में पर्यवेक्षक के रूप में भारत की कूटनीतिक उपस्थिति

परिचय

वर्ष 2026 में गाजा पट्टी का प्रश्न केवल इजराइल–फिलिस्तीन संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक शक्ति-संतुलन, मानवीय हस्तक्षेप और बहुपक्षीय कूटनीति की परीक्षा बन गया है। ऐसे समय में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा प्रारंभ किया गया ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) एक नई पहल के रूप में सामने आया है, जिसका घोषित उद्देश्य गाजा में युद्धविराम की निगरानी, पुनर्निर्माण, हमास के निरस्त्रीकरण तथा एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण व्यवस्था की स्थापना है।

फरवरी 2026 में वाशिंगटन डीसी में आयोजित इस बोर्ड की पहली बैठक में भारत ने पूर्ण सदस्य के बजाय पर्यवेक्षक (Observer) के रूप में भाग लिया। यह निर्णय साधारण कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की संतुलित और बहुस्तरीय विदेश नीति का प्रतीक है।


‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पृष्ठभूमि: संयुक्त राष्ट्र से परे एक वैकल्पिक मंच?

ट्रंप प्रशासन ने जनवरी 2026 में विश्व आर्थिक मंच (दावोस) के दौरान इस पहल की घोषणा की थी। इसे एक ऐसे मंच के रूप में प्रस्तुत किया गया जो संयुक्त राष्ट्र की धीमी प्रक्रियाओं से परे जाकर “त्वरित, परिणाम-उन्मुख और सुरक्षा-केन्द्रित” शांति व्यवस्था स्थापित करेगा।

इस बोर्ड के प्रमुख लक्ष्य बताए गए हैं—

  • गाजा में स्थायी युद्धविराम की निगरानी
  • हमास का निरस्त्रीकरण
  • गाजा के पुनर्निर्माण हेतु बहु-अरब डॉलर फंड
  • अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल की तैनाती
  • मानवीय सहायता की समन्वित आपूर्ति

अमेरिका ने लगभग 10 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता व्यक्त की है, जबकि अन्य सदस्य देशों से भी आर्थिक सहयोग अपेक्षित है। बोर्ड में पश्चिम एशिया, यूरोप और एशिया के कई देश शामिल हैं।

हालांकि, कई विश्लेषकों का मत है कि यह पहल संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को सीमित कर सकती है और वैश्विक शांति व्यवस्था में समानांतर संरचनाओं का निर्माण कर सकती है।


भारत की भूमिका: पूर्ण सदस्यता से दूरी, सहभागिता से निकटता

भारत ने इस बोर्ड में पूर्ण सदस्यता ग्रहण नहीं की। उसने पर्यवेक्षक के रूप में भाग लेकर यह संकेत दिया कि वह प्रक्रिया से बाहर नहीं रहना चाहता, किंतु स्वयं को किसी बाध्यकारी ढांचे में भी नहीं बांधना चाहता।

भारत का यह रुख उसकी पारंपरिक पश्चिम एशिया नीति के अनुरूप है, जो तीन मूलभूत स्तंभों पर आधारित रही है—

  1. दो-राज्य समाधान का समर्थन
  2. फिलिस्तीनी अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता
  3. इजराइल के साथ रणनीतिक साझेदारी

भारत ने वर्षों से फिलिस्तीन को मान्यता दी है और मानवीय सहायता भी प्रदान की है। साथ ही, रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और तकनीक के क्षेत्र में इजराइल के साथ उसके संबंध गहरे हुए हैं।

ऐसे में, किसी एक धड़े से पूर्णतः जुड़ना उसकी संतुलनकारी नीति के विपरीत होता। पर्यवेक्षक की स्थिति उसे तीन लाभ देती है—

  • सूचना और विमर्श तक पहुंच
  • संभावित आर्थिक अवसरों पर निगरानी
  • कूटनीतिक लचीलापन

कूटनीतिक संतुलन: अमेरिका के साथ सामरिक समीकरण

भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दशक में व्यापक रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं। रक्षा, प्रौद्योगिकी, इंडो-पैसिफिक सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला पुनर्संरचना जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों की निकटता बढ़ी है।

ऐसे परिदृश्य में भारत का इस पहल से पूर्णतः दूरी बनाना व्यवहारिक नहीं होता। पर्यवेक्षक के रूप में भागीदारी यह दर्शाती है कि भारत—

  • अमेरिका के साथ संवाद बनाए रखना चाहता है
  • मध्य पूर्व में अपने हितों की रक्षा करना चाहता है
  • लेकिन किसी विवादास्पद सुरक्षा ढांचे में प्रत्यक्ष सैन्य भूमिका से बचना चाहता है

यह “सक्रिय तटस्थता” (Active Neutrality) की रणनीति है।


गाजा पुनर्निर्माण: भारत के लिए आर्थिक अवसर?

गाजा के पुनर्निर्माण में बुनियादी ढांचे, आवास, स्वास्थ्य सेवाओं, जल आपूर्ति, डिजिटल कनेक्टिविटी और ऊर्जा क्षेत्र में भारी निवेश की आवश्यकता होगी।

भारत की सार्वजनिक और निजी कंपनियां—

  • निर्माण और अवसंरचना
  • आईटी समाधान
  • सौर ऊर्जा
  • चिकित्सा उपकरण

जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी हैं।

यदि बोर्ड की परियोजनाएं आगे बढ़ती हैं, तो भारतीय कंपनियों को ठेके मिलने की संभावना बन सकती है। पर्यवेक्षक के रूप में भारत इस आर्थिक परिदृश्य का आकलन कर सकता है।


संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक शासन की चुनौती

ट्रंप की यह पहल अप्रत्यक्ष रूप से संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाती है। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुधारों और सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थक रहा है।

ऐसी स्थिति में भारत का यह निर्णय—कि वह बोर्ड से जुड़ा रहे, पर पूर्ण सदस्यता न ले—एक सावधानीपूर्ण संदेश देता है कि—

  • वह बहुपक्षीय संस्थाओं के महत्व को कम नहीं आंकता
  • लेकिन वैकल्पिक मंचों की वास्तविकता को भी नजरअंदाज नहीं करता

यह व्यवहारिक बहुपक्षीयता (Pragmatic Multilateralism) का उदाहरण है।


क्षेत्रीय स्थिरता और भारत के हित

मध्य पूर्व भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है—

  • ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख स्रोत
  • लाखों भारतीय प्रवासी
  • व्यापारिक और निवेश संबंध

गाजा में स्थिरता क्षेत्रीय तनाव को कम कर सकती है, जिसका सकारात्मक प्रभाव तेल कीमतों और समुद्री व्यापार मार्गों पर पड़ेगा।

इस दृष्टि से भारत का इस प्रक्रिया से जुड़ा रहना उसके दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित में है।


निष्कर्ष: संतुलित कूटनीति का परिपक्व उदाहरण

‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक में भारत की पर्यवेक्षक उपस्थिति उसकी विदेश नीति की परिपक्वता को दर्शाती है। यह निर्णय न तो किसी पक्ष का पूर्ण समर्थन है, न ही दूरी बनाना—बल्कि यह रणनीतिक लचीलापन है।

भारत ने यह संदेश दिया है कि—

  • वह वैश्विक शांति प्रयासों से अलग नहीं है
  • परंतु वह अपनी स्वायत्त विदेश नीति को भी अक्षुण्ण रखेगा
  • और हर मंच पर राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखेगा

यदि यह पहल सफल होती है, तो भारत भविष्य में अधिक सक्रिय भूमिका पर विचार कर सकता है। लेकिन फिलहाल, पर्यवेक्षक की स्थिति उसे संतुलन, जानकारी और अवसर—तीनों प्रदान करती है।

गाजा की शांति केवल सैन्य या वित्तीय हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि विश्वास, राजनीतिक संवाद और समावेशी समाधान से संभव है। भारत की भूमिका इसी व्यापक दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है।

(संदर्भ: द इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिंदू, एनडीटीवी तथा अन्य समाचार स्रोत, फरवरी 2026)

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