NCERT Judicial Corruption Controversy 2026: Supreme Court Intervention and Impact on Education & Democracy
एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक में 'न्यायिक भ्रष्टाचार' का समावेश: मौलिक समग्र प्रभाव का विश्लेषण
परिचय
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक में 'न्यायिक भ्रष्टाचार' (Judicial Corruption) और अदालती मामलों की लंबित स्थिति जैसे मुद्दों को शामिल करने का निर्णय एक बड़े विवाद का कारण बना। इस परिवर्तन ने न केवल शिक्षा और न्यायपालिका के बीच टकराव को जन्म दिया, बल्कि अकादमिक स्वतंत्रता, संस्थागत गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहन बहस छेड़ दी। 25 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्वत: संज्ञान (suo motu) लेकर केस दर्ज किया, जिसके बाद एनसीईआरटी ने किताब वापस ले ली और संबंधित हिस्से को हटाने का फैसला किया। यह घटना शिक्षा प्रणाली के मौलिक ढांचे पर दूरगामी प्रभाव डालती है, जहां सच्चाई की शिक्षा और संस्थाओं की छवि के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इस लेख में हम इस विवाद के समग्र प्रभावों का विश्लेषण करेंगे, जिसमें शिक्षा, न्यायपालिका, समाज और लोकतंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव शामिल हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि
एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें भारतीय शिक्षा प्रणाली की रीढ़ हैं, जो छात्रों को सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताओं से परिचित कराती हैं। नई किताब के अध्याय 'न्यायपालिका की हमारी समाज में भूमिका' में न्यायिक भ्रष्टाचार, अदालती मामलों का बैकलॉग (सुप्रीम कोर्ट में 81,000, हाई कोर्ट्स में 60 लाख और निचली अदालतों में 4 करोड़ से अधिक लंबित मामले) और जजों की कमी जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई थी। इसमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के जुलाई 2025 के बयान का हवाला दिया गया था, जिसमें उन्होंने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और कदाचार के उदाहरणों का जिक्र करते हुए पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। समर्थकों का तर्क था कि ऐसे विषय छात्रों को वास्तविक चुनौतियों से अवगत कराते हैं, जो आलोचनात्मक सोच विकसित करने में सहायक हैं। हालांकि, आलोचकों ने इसे न्यायपालिका को बदनाम करने का प्रयास बताया, खासकर जब राजनीति, नौकरशाही या अन्य क्षेत्रों में भ्रष्टाचार का जिक्र नहीं किया गया। यह परिवर्तन 2026-27 सत्र के लिए प्रस्तावित था, लेकिन विवाद के बाद किताब बाजार से वापस ले ली गई।
सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया और तत्काल प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को 'गणना करके किया गया गहरा हमला' करार दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने कहा कि वह न्यायपालिका की छवि खराब करने की अनुमति नहीं देंगे और हाई कोर्ट जजों से मिले फोन व संदेशों का हवाला देते हुए सख्त कार्रवाई का संकेत दिया। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने इसे 'चयनात्मक' बताया, सवाल उठाया कि क्यों केवल न्यायपालिका को निशाना बनाया गया। कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर केस दर्ज किया, जो 26 फरवरी 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। सरकार ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि संबंधित हिस्सा हटाया जाएगा, क्योंकि यह 'उपयुक्त नहीं' था और प्रेरणादायक सामग्री पर फोकस होना चाहिए। एनसीईआरटी ने माफी मांगी और कहा कि यह अनजाने में हुआ था, कोई दुर्भावना नहीं। इस त्वरित कार्रवाई से विवाद थम गया, लेकिन इससे शिक्षा नीति में न्यायपालिका के हस्तक्षेप की बहस तेज हो गई।
मौलिक समग्र प्रभाव: शिक्षा प्रणाली पर
यह विवाद शिक्षा के मौलिक उद्देश्य पर गहरा प्रभाव डालता है। एक ओर, पाठ्यक्रम में वास्तविक मुद्दों को शामिल करना छात्रों को आलोचनात्मक सोच और जागरूकता सिखाता है, जो लोकतांत्रिक नागरिकता के लिए आवश्यक है। लेकिन इस घटना से सेंसरशिप का खतरा बढ़ गया है। यदि संवेदनशील विषयों को हटाया जाता है, तो छात्रों को अधूरी तस्वीर मिलेगी, जो उन्हें वास्तविक दुनिया के लिए तैयार नहीं करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि कक्षा 8 के स्तर पर ऐसे विषय जटिल हो सकते हैं, जो युवा दिमागों को भ्रमित कर सकते हैं। समग्र रूप से, यह शिक्षा नीति में पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है, जहां पाठ्यक्रम निर्माण में शिक्षाविदों, विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं की बहु-पक्षीय भागीदारी जरूरी हो जाती है। इससे अन्य विषयों जैसे राजनीतिक भ्रष्टाचार या सामाजिक असमानता पर भी प्रभाव पड़ सकता है, जहां सेंसरशिप बढ़ने से शिक्षा 'सुरक्षित' लेकिन अधूरी हो जाएगी।
न्यायपालिका और संस्थागत गरिमा पर प्रभाव
न्यायपालिका लोकतंत्र का प्रमुख स्तंभ है, और इस विवाद ने उसकी छवि पर सीधा असर डाला। कोर्ट की तीखी प्रतिक्रिया से सार्वजनिक विश्वास मजबूत हुआ, लेकिन यह सवाल भी उठा कि क्या न्यायपालिका आलोचना से ऊपर है? पूर्व CJI गवई के बयान का हवाला देकर किताब ने वास्तविक मुद्दों को छुआ था, लेकिन सेलेक्टिव फोकस ने इसे हमले जैसा बना दिया। समग्र प्रभाव यह है कि न्यायपालिका की आंतरिक सुधार प्रक्रिया (जैसे पारदर्शिता बढ़ाने के प्रयास) पर ध्यान केंद्रित हो सकता है, लेकिन बाहरी आलोचना को दबाने से उसकी विश्वसनीयता कमजोर हो सकती है। सोशल मीडिया पर बहस (जैसे X पर पोस्ट्स) से पता चलता है कि लोग न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को मानते हैं, लेकिन इसे स्कूली किताबों में पढ़ाने को राजनीतिक साजिश मानते हैं। इससे विधायिका और न्यायपालिका के बीच टकराव बढ़ सकता है, क्योंकि एनसीईआरटी सरकारी निकाय है।
समाज और लोकतंत्र पर व्यापक प्रभाव
समाज पर यह विवाद गहन प्रभाव डालता है। यह सिखाता है कि संस्थाओं में कमियां हैं, लेकिन उनकी चर्चा कैसे की जाए? युवा छात्रों को भ्रष्टाचार के बारे में जागरूक करना सकारात्मक है, लेकिन बिना संतुलित दृष्टिकोण के यह निराशावाद पैदा कर सकता है। लोकतंत्र में अकादमिक स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा का संतुलन जरूरी है; इस घटना से सेंसरशिप की संस्कृति मजबूत हो सकती है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करेगी। X पर चर्चाओं से स्पष्ट है कि कुछ इसे सरकार की न्यायपालिका को नियंत्रित करने की कोशिश मानते हैं, जबकि अन्य न्यायपालिका की ईमानदारी पर जोर देते हैं। समग्र रूप से, यह घटना लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए बहु-स्तरीय संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करती है, जहां शिक्षा सच्चाई पर आधारित हो, लेकिन संस्थाओं की गरिमा बनी रहे। इससे पाठ्यक्रम सुधार में पारदर्शिता बढ़ सकती है, जो अंतत: मजबूत समाज का निर्माण करेगी।
निष्कर्ष
एनसीईआरटी विवाद का मौलिक समग्र प्रभाव शिक्षा, न्यायपालिका और लोकतंत्र के बीच संतुलन पर केंद्रित है। यह हमें सिखाता है कि वास्तविक मुद्दों की शिक्षा आवश्यक है, लेकिन सेलेक्टिव या असंतुलित तरीके से नहीं। भविष्य में, पाठ्यक्रम निर्माण में विशेषज्ञों की भागीदारी बढ़ाकर ऐसे विवादों से बचा जा सकता है। अंतत:, शिक्षा का उद्देश्य जागरूक नागरिक बनाना है, जो संस्थाओं की कमियों को समझें और उन्हें सुधारने में योगदान दें। यह घटना एक सबक है कि लोकतंत्र में बहस से ही प्रगति होती है, न कि दमन से।
With The Hindu and Indian Express Inputs
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