अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
उपराष्ट्रपति चुनाव 2025: एनडीए की स्थिति, संवैधानिक महत्व और UPSC दृष्टिकोण भारत में उपराष्ट्रपति चुनाव केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था, गठबंधन राजनीति और संसदीय संतुलन की कसौटी भी है। 2025 के उपराष्ट्रपति चुनाव में संसद सदस्य मतदान कर रहे हैं और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के उम्मीदवार राधाकृष्णन को बढ़त हासिल मानी जा रही है। इस संदर्भ में यह चुनाव कई दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है। संवैधानिक और संस्थागत महत्व भारतीय संविधान के अनुच्छेद 63 से 71 तक उपराष्ट्रपति के पद का उल्लेख किया गया है। यह पद केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि राज्यसभा के सभापति के रूप में संसदीय कार्यवाही की निष्पक्षता और संतुलन का दायित्व भी निभाता है। उपराष्ट्रपति सरकार और विपक्ष के बीच संतुलनकारी भूमिका निभाते हैं। यह चुनाव संसद की आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को रेखांकित करता है। राजनीतिक दृष्टिकोण से एनडीए द्वारा राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाना केवल गणितीय मजबूती नहीं, बल्कि रणनीतिक संकेत भी है: संसद में मजबूत उपस्थिति और क्षेत्रीय दलों का सहयोग। वि...