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Rising Attacks on Hindu Minorities in Bangladesh: Global Silence and Human Rights Concerns

The Silent Genocide: Persecution of Hindus in Bangladesh and the Moral Failure of the Global Community In an age where conflicts in Gaza, Ukraine, and other flashpoints command the world’s attention, a quieter yet deeply disturbing humanitarian crisis continues to unfold next door to India — in Bangladesh. Since the political upheaval and resignation of Prime Minister Sheikh Hasina in August 2024, reports of violence against the Hindu minority have escalated dramatically. Killings, arson attacks, vandalism of temples, forced displacement, economic boycotts, and intimidation have become frighteningly frequent. According to figures cited by Indian authorities, more than 2,200 incidents of violence against Hindus were recorded in 2024 alone , with similar patterns continuing through 2025 and into 2026. Independent reports corroborate these trends: homes torched, idols desecrated, businesses looted, and families compelled to flee ancestral lands. Yet, despite the mounting evidence, the w...

Why India Needs a Shadow Cabinet: Strengthening the Role of Opposition in a Modern Democracy

वर्तमान में भारत में विपक्ष की आवाज़ को सशक्त बनाने हेतु छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता एक समग्र अकादमिक विश्लेषण परिचय लोकतंत्र की आत्मा सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन में निहित होती है। जहां सत्तारूढ़ दल शासन, नीति-निर्माण और प्रशासन का दायित्व निभाता है, वहीं विपक्ष का कार्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों की समीक्षा, आलोचना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना होता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष ‘नकारात्मक शक्ति’ नहीं, बल्कि रचनात्मक नियंत्रक (Constructive Watchdog) की भूमिका निभाता है। भारत, जो स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र घोषित करता है, आज एक ऐसे राजनीतिक चरण से गुजर रहा है जहाँ विपक्ष की भूमिका कमजोर, बिखरी हुई और प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है। संसद के भीतर विमर्श का स्तर गिरा है और नीति-आलोचना प्रायः नारेबाज़ी या वॉकआउट तक सीमित रह जाती है। ऐसे परिदृश्य में छाया मंत्रिमंडल (Shadow Cabinet) की अवधारणा भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज़ को संस्थागत, संगठित और प्रभावी बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। यह लेख भारत में छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता, उसके संभा...

Supreme Court Reconsiders RTE Act Exemption for Minority Institutions: Key Insights and Implications

RTE Act और अल्पसंख्यक संस्थान: सुप्रीम कोर्ट की पुनर्विचार पहल प्रस्तावना भारत का संविधान शिक्षा को न केवल एक अधिकार, बल्कि हर बच्चे के भविष्य को संवारने का आधार मानता है। अनुच्छेद 21A के तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है। इसी दिशा में 2009 में लागू Right to Education (RTE) Act एक क्रांतिकारी कदम था, जिसने निजी और सरकारी स्कूलों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) और वंचित बच्चों के लिए 25% सीटें आरक्षित करने का दायित्व सौंपा। लेकिन 2014 में सुप्रीम कोर्ट के प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट बनाम भारत संघ (Pramati, 2014) फैसले ने अल्पसंख्यक संस्थानों को RTE के दायरे से पूरी तरह बाहर कर दिया। यह निर्णय अल्पसंख्यक समुदायों की स्वायत्तता की रक्षा तो करता था, लेकिन शिक्षा के समान अवसर के सिद्धांत पर सवाल भी उठाता था। अब, 1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर पुनर्विचार का फैसला किया है और इसे एक बड़ी पीठ (Larger Bench) को सौंपा है। यह कदम शिक्षा और अल्पसंख्यक अधिकारों के बीच संतुलन की नई बहस को जन्म देता है। पृष्ठभूमि: संवैधानिक...

Harvard University Vs Trump: जब छात्र आंदोलन पर सत्ता ने कसा शिकंजा

जब सत्ता अभिव्यक्ति से डरती है: हार्वर्ड विवाद और लोकतंत्र की असली परीक्षा "एक सशक्त लोकतंत्र वह होता है जहाँ विश्वविद्यालय विचारों की प्रयोगशाला हों, सत्ता के प्रचार स्थल नहीं।" अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्था हार्वर्ड यूनिवर्सिटी आज उस स्थिति में है जहाँ उसे न केवल अपनी अकादमिक प्रतिष्ठा बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूलभूत सिद्धांतों की रक्षा के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ रहा है। ट्रंप प्रशासन द्वारा $2.2 अरब के संघीय अनुदान को फ्रीज़ करने का निर्णय न केवल एक राजनीतिक प्रतिशोध का प्रतीक है, बल्कि यह अमेरिका और विश्व भर में शिक्षा और लोकतंत्र के भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। घटनाक्रम का सारांश हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने हाल ही में ट्रंप प्रशासन की उन नीतियों का मुखर विरोध किया, जिनका उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसरों में छात्र आंदोलनों और राजनीतिक विरोध को नियंत्रित करना था। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि संघीय सरकार ने विश्वविद्यालय को दिए जाने वाले अरबों डॉलर के अनुदान को रोक दिया। सरकार का तर्क है कि ये अनुदान 'राष्ट्रीय हितों' के विरुद्ध ...

Italy Opens 'Intimate meeting Room' in Prison: A Bold Step Towards Prison Reform and Human Rights

जेलों के भीतर 'इंटिमेसी' की इजाज़त: क्या यह मानवाधिकार का हिस्सा है? हाल ही में इटली ने एक ऐतिहासिक और विवादास्पद फैसला लेते हुए अपनी एक जेल में पहली बार 'इंटिमेट मीटिंग्स रूम' की शुरुआत की है। सेंट्रल अम्ब्रिया क्षेत्र की एक जेल में यह विशेष सुविधा तैयार की गई, जहाँ एक कैदी को अपनी महिला पार्टनर से मिलने की अनुमति दी गई। इससे पहले अदालत ने यह मान्यता दी थी कि कैदियों को अपने पार्टनर्स के साथ 'इंटिमेट मीटिंग' का अधिकार है। इस फैसले ने जेल सुधारों और कैदियों के मानवाधिकारों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है — और यह विषय भारतीय संदर्भ में भी उतना ही प्रासंगिक है, खासकर UPSC जैसी परीक्षाओं की तैयारी करने वालों के लिए। क्या यह विषय UPSC के पाठ्यक्रम से संबंधित है? जी हाँ, यह विषय सीधे तौर पर  UPSC मुख्य परीक्षा (GS Paper 2)  से जुड़ा है: 1.  Governance और जेल सुधार: भारत की जेल प्रणाली आज भी औपनिवेशिक ढांचे पर आधारित है। कैदियों को अक्सर केवल "अपराधी" के रूप में देखा जाता है, जबकि सुधार और पुनर्वास की भावना कमजोर पड़ जाती है। इटली की यह पहल जेल सुधारों की दिशा ...

UPSC Current Affairs in Hindi : 20 April 2025

दैनिक समसामयिकी लेख विश्लेषण व संकलन: 20 अप्रैल 2025 1-संपादकीय: लोकतंत्र में मर्यादा और संस्थाओं का सम्मान आवश्यक भारतीय लोकतंत्र की मजबूती उसकी संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और मर्यादा में निहित है। संसद, कार्यपालिका, और न्यायपालिका — इन तीनों स्तंभों का आपसी संतुलन ही लोकतंत्र को जीवंत और स्थिर बनाता है। ऐसे में जब कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि न्यायपालिका जैसे संवैधानिक संस्थान की आलोचना करता है, तो यह न केवल एक संस्थान पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन को भी चुनौती देता है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना इसी तरह का एक उदाहरण है, जिसने राजनीतिक और संवैधानिक हलकों में हलचल मचा दी। हालाँकि, इस प्रकरण में जो बात प्रशंसनीय रही, वह थी भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा की त्वरित प्रतिक्रिया। उन्होंने दोनों नेताओं की टिप्पणियों को उनका “व्यक्तिगत मत” बताते हुए पार्टी को उनसे अलग कर लिया और न्यायपालिका के प्रति पूर्ण सम्मान प्रकट किया। यह कदम दर्शाता है कि सत्तारूढ़ दल भी यह समझता है कि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार होते ...

Supreme Court and the President of India: Decoding Powers and Limitations

शीर्षक: संविधान, न्यायपालिका और राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति: एक वैचारिक संवाद हाल ही में चर्चित पत्रकार दीपक चौरसिया द्वारा किया गया ट्वीट—"सुप्रीम कोर्ट फाँसी की सज़ा देता है लेकिन महामहिम राष्ट्रपति उसे बदल सकती हैं . ऐसे में सुप्रीम कोर्ट महामहिम को आदेश कैसे दे सकती है, ये समझ के बाहर है."—एक गम्भीर संवैधानिक विमर्श को जन्म देता है। इस ट्वीट का उत्तर "अरविंद सिंह PK Rewa" ने जिस विश्लेषणात्मक शैली में दिया, वह न केवल संवैधानिक समझ को स्पष्ट करता है बल्कि आम नागरिकों को भी इस जटिल प्रणाली को समझने का मार्ग प्रदान करता है। सुप्रीम कौन? संस्था या संविधान? अरविंद सिंह का कथन—"इंडिया में सुप्रीम कोई संस्था नहीं है, सुप्रीम है संविधान"—संविधान की सर्वोच्चता के सिद्धांत को प्रतिपादित करता है। भारत एक संविधान आधारित गणराज्य है, न कि व्यक्ति आधारित। संविधान ही वह मूल ग्रंथ है जिससे सभी संस्थाएं—चाहे वह न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो या राष्ट्रपति जैसी संवैधानिक पदस्थाएं—अपना अधिकार प्राप्त करती हैं। सुप्रीम कोर्ट की भूमिका संविधान के संरक्षण और व्याख्या...

Supreme Court vs Executive: Judicial Review of President’s Assent Sparks Constitutional Debate

संपादकीय लेख: "संवैधानिक संतुलन बनाम न्यायिक सक्रियता: राष्ट्रपति की स्वीकृति पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की पृष्ठभूमि में एक विमर्श" भूमिका: भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला तीन स्वतंत्र स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—पर टिकी है। ये सभी स्तंभ संविधान की सीमाओं में रहकर कार्य करते हैं, परंतु जब एक स्तंभ दूसरे के क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप करता प्रतीत होता है, तो ‘संवैधानिक संतुलन’ की कसौटी पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति एवं राज्यपाल द्वारा राज्य विधेयकों पर दी जाने वाली स्वीकृति को न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाते हुए एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। इस निर्णय की प्रतिक्रिया में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने तीखी आपत्ति जताई और इसे ‘कार्यपालिका के अधिकारों पर अतिक्रमण’ करार दिया। यह लेख इसी संवैधानिक बहस को केंद्र में रखते हुए कार्यपालिका की स्वायत्तता, न्यायिक सक्रियता, संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के संतुलन की खोज करता है। संवैधानिक पृष्ठभूमि: राष्ट्रपति की विधायी स्वीकृति भारतीय संविधान का अनुच्छेद 201 राज्य वि...

UPSC Current Affairs in Hindi : 16 April 2025

 दैनिक समसामयिकी लेख संकलन : 16 अप्रैल 2025 यह रहा लेख का विश्लेषणात्मक और UPSC GS-3 (आंतरिक सुरक्षा) व निबंध लेखन के अनुकूल विस्तृत संस्करण: शीर्षक-1: 26/11 मुंबई हमला: एक राज्य प्रायोजित आतंकवाद और रणनीतिक भ्रम की साजिश (UPSC GS-3: आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ और आतंकवाद) भूमिका: 26/11 का मुंबई आतंकी हमला भारत के इतिहास में एक ऐसा त्रासद क्षण था जिसने देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था, आतंकवाद के स्वरूप और अंतरराष्ट्रीय रणनीति पर गहरे प्रश्न खड़े किए। यह हमला सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, राज्य-प्रायोजित साजिश थी, जिसे वैश्विक स्तर पर भ्रम फैलाने और भारत को अस्थिर करने के उद्देश्य से अंजाम दिया गया। पाकिस्तान की रणनीति: भ्रम की पृष्ठभूमि इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व विशेष निदेशक अशोक प्रसाद के अनुसार, पाकिस्तान ने इस हमले को "घरेलू असंतोष" का रूप देने की कोशिश की थी। इसके लिए पहले से ही देश के विभिन्न हिस्सों में भारतीय मुजाहिदीन (IM) द्वारा सिलसिलेवार बम धमाके कराए गए। यह संगठन, यद्यपि "स्वदेशी" बताया गया, असल में कराची से नियंत्रित होता था और इस...

UPSC Current Affairs in Hindi : 15 April 2025

  दैनिक समसामयिकी लेख संकलन: 15 अप्रैल 2025  1-आर्थिक अपराध और प्रत्यर्पण नीति: न्याय की वैश्विक लड़ाई में भारत की चुनौती भूमिका हाल ही में भगोड़े हीरा व्यापारी मेहुल चोकसी की बेल्जियम में गिरफ्तारी ने एक बार फिर भारत की प्रत्यर्पण नीति, आर्थिक अपराधों के प्रति कानूनी ढांचे, और वैश्विक सहयोग की वास्तविकताओं को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। चोकसी और उसके भतीजे नीरव मोदी पर ₹13,578 करोड़ के पंजाब नेशनल बैंक घोटाले का आरोप है, जिसने न केवल भारत की बैंकिंग प्रणाली को झकझोरा, बल्कि वैश्विक स्तर पर देश की वित्तीय छवि को भी नुकसान पहुँचाया। आर्थिक अपराध: एक संरचनात्मक विफलता PNB घोटाले ने यह उजागर किया कि भारत की बैंकिंग प्रणाली में निगरानी तंत्र और आंतरिक नियंत्रण की गंभीर कमी है। फर्जी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग के ज़रिए सार्वजनिक धन का दुरुपयोग वर्षों तक होता रहा, पर समय रहते कोई चेतावनी नहीं मिली। यह न केवल एक आर्थिक अपराध है, बल्कि एक संस्थागत और नैतिक विफलता का द्योतक भी है। प्रत्यर्पण प्रक्रिया की जटिलताएँ भारत ने चोकसी के खिलाफ इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया और उसके एंट...

Current Affairs in Hindi : 13 April 2025

समसामयिकी लेख संकलन : 13 अप्रैल 2025 1. संविधान की आत्मा और संघवाद की पुकार: बहुसंख्यकवाद के दौर में क्षेत्रीय नेतृत्व की भूमिका प्रस्तावना भारतीय संविधान मात्र एक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक जीवंत संकल्पना है जो विविधता में एकता, न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की नींव पर टिका है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जब बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियाँ लोकतांत्रिक संतुलन को चुनौती देने लगी हैं, ऐसे में जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती द्वारा विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा हेतु हस्तक्षेप की अपील करना एक महत्वपूर्ण संकेत है। 1. बहुसंख्यकवाद बनाम संवैधानिक मूल्य भारतीय लोकतंत्र का सौंदर्य इसकी बहुलतावादी प्रकृति में निहित है। संविधान में स्पष्ट रूप से अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा , सांस्कृतिक विविधता का सम्मान , और सत्ता के विकेंद्रीकरण की व्यवस्था की गई है। वर्तमान में बहुसंख्यक हितों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्तियाँ संवैधानिक संतुलन को कमजोर कर रही हैं। महबूबा मुफ़्ती का पत्र इसी संदर्भ में संवैधानिक चेतना को जागृत क...

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Islamic NATO in the Making? Turkey, Saudi Arabia and Pakistan’s Emerging Defense Axis

“इस्लामिक नाटो” की परिकल्पना: तुर्की के हथियार, सऊदी धन और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता — एक उभरते रक्षा गठजोड़ का विश्लेषण प्रस्तावना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन स्थिर नहीं होते; वे समय, खतरे और हितों के अनुसार बदलते रहते हैं। हाल के वर्षों में मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिवेश में तेज़ी से परिवर्तन हुआ है। इसी संदर्भ में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच संभावित रक्षा-सहयोग को कुछ विश्लेषक “इस्लामिक नाटो” जैसी संज्ञा देने लगे हैं। यद्यपि यह कोई औपचारिक सैन्य संगठन नहीं है, फिर भी तीनों देशों के पूरक सामर्थ्य — तुर्की की रक्षा-तकनीक, सऊदी अरब की आर्थिक शक्ति और पाकिस्तान की परमाणु क्षमता — एक नए रणनीतिक त्रिकोण की संभावना को जन्म देते हैं। यह लेख इस संभावित रक्षा गठजोड़ की पृष्ठभूमि, इसके कारक, संभावित स्वरूप और वैश्विक राजनीति पर इसके प्रभावों का अकादमिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। 1. भू-राजनीतिक पृष्ठभूमि शीत युद्ध के बाद की दुनिया में शक्ति संतुलन पश्चिमी देशों से धीरे-धीरे बहुध्रुवीय संरचना की ओर बढ़ा है। अमेरिका और यूरोप की प्रभुत्ववादी भूम...

Trump’s Greenland Ambition and Europe Tariff Crisis: A New Geopolitical Flashpoint in 2026

ट्रंप की ग्रीनलैंड नीति और यूरोप पर टैरिफ का संकट: 21वीं सदी की नई भू-राजनीतिक परीक्षा 18 जनवरी 2026 को एक बार फिर वैश्विक राजनीति उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दी, जहाँ शक्ति, संप्रभुता और आर्थिक दबाव आमने-सामने आ गए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने या किसी रूप में अमेरिकी नियंत्रण में लाने की अपनी पुरानी इच्छा को आक्रामक ढंग से दोहराया। 2019 में यह विचार दुनिया को अजीब लगा था, लेकिन 2025 में सत्ता में वापसी के बाद ट्रंप ने इसे रणनीतिक एजेंडे में बदल दिया। अब यह केवल एक असामान्य प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट का रूप ले चुका है। ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है, भौगोलिक रूप से आर्कटिक क्षेत्र के केंद्र में स्थित है। बर्फ से ढकी यह भूमि देखने में शांत लगती है, लेकिन इसके नीचे खनिज संसाधनों, दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और भविष्य के समुद्री मार्गों की अपार संभावनाएँ छिपी हैं। इसके साथ ही, यह अमेरिका, रूस और यूरोप के बीच रणनीतिक संतुलन का एक महत्वपूर्ण बिंदु बन चुका है। ट्रंप का तर्क है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है, ...

Trump’s Gaza “Board of Peace”: Power, Peacebuilding and the Future of Post-War Reconstruction

ट्रंप द्वारा गाजा के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा: शक्ति, शांति और पुनर्निर्माण के बीच एक जटिल प्रयोग प्रस्तावना 17 जनवरी 2026 को व्हाइट हाउस से की गई एक घोषणा ने मध्य पूर्व की राजनीति में नई बहस छेड़ दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा संघर्ष समाप्ति योजना के दूसरे चरण के अंतर्गत एक नई संस्था— ‘बोर्ड ऑफ पीस’ —के संस्थापक कार्यकारी सदस्यों की घोषणा की। इस बोर्ड का घोषित उद्देश्य गाजा में युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण, स्थिरीकरण, प्रशासनिक क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक विकास की निगरानी करना है। स्वयं ट्रंप इस बोर्ड के अध्यक्ष हैं। यह पहल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 (2025) से जुड़ी बताई गई है, जिसने ट्रंप की 20-सूत्रीय शांति योजना को सैद्धांतिक समर्थन दिया था। यह घोषणा केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह अमेरिका की मध्य पूर्व नीति, वैश्विक शासन संरचना और “शांति-निर्माण” की अवधारणा को लेकर कई बुनियादी प्रश्न खड़े करती है। पृष्ठभूमि: युद्ध से युद्धविराम तक अक्टूबर 2025 में हुए नाजुक युद्धविराम से पहले गाजा लगभग दो वर्षों तक भीषण युद्ध की चपेट में रहा। इस दौरा...

Jimmy Lai Case: Hong Kong National Security Law, Press Freedom and Global Human Rights Debate

हांगकांग–चीन संबंध और जिमी लाई मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रेस स्वतंत्रता और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का समग्र अकादमिक विश्लेषण भूमिका हांगकांग आज केवल एक वैश्विक वित्तीय केंद्र नहीं, बल्कि इतिहास, राजनीति, कानून और मानवाधिकारों के जटिल संगम का प्रतीक बन चुका है। इसकी वर्तमान स्थिति को समझने के लिए उसके औपनिवेशिक अतीत, “एक देश–दो प्रणाली” की अवधारणा और हाल के वर्षों में लागू राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की भूमिका को समग्रता में देखना आवश्यक है। जिमी लाई का मामला इसी ऐतिहासिक और राजनीतिक परिवर्तन का जीवंत उदाहरण है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, न्यायिक प्रक्रिया और प्रेस स्वतंत्रता आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। 1. हांगकांग–चीन संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (क) चीन का पारंपरिक हिस्सा हांगकांग प्राचीन काल से चीनी साम्राज्यों का हिस्सा रहा। यह मुख्यतः मछली पकड़ने और स्थानीय व्यापार पर आधारित क्षेत्र था। मिंग और चिंग राजवंशों के समय इसे दक्षिण चीन का सामान्य तटीय इलाका माना जाता था। (ख) अफीम युद्ध और ब्रिटिश उपनिवेश 19वीं सदी में अफीम युद्धों ने हांगकांग के भाग्य को बदल दिया। 1842 की नानजि...

Why India Needs a Shadow Cabinet: Strengthening the Role of Opposition in a Modern Democracy

वर्तमान में भारत में विपक्ष की आवाज़ को सशक्त बनाने हेतु छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता एक समग्र अकादमिक विश्लेषण परिचय लोकतंत्र की आत्मा सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन में निहित होती है। जहां सत्तारूढ़ दल शासन, नीति-निर्माण और प्रशासन का दायित्व निभाता है, वहीं विपक्ष का कार्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों की समीक्षा, आलोचना और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना होता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष ‘नकारात्मक शक्ति’ नहीं, बल्कि रचनात्मक नियंत्रक (Constructive Watchdog) की भूमिका निभाता है। भारत, जो स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र घोषित करता है, आज एक ऐसे राजनीतिक चरण से गुजर रहा है जहाँ विपक्ष की भूमिका कमजोर, बिखरी हुई और प्रतिक्रियात्मक दिखाई देती है। संसद के भीतर विमर्श का स्तर गिरा है और नीति-आलोचना प्रायः नारेबाज़ी या वॉकआउट तक सीमित रह जाती है। ऐसे परिदृश्य में छाया मंत्रिमंडल (Shadow Cabinet) की अवधारणा भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज़ को संस्थागत, संगठित और प्रभावी बनाने का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। यह लेख भारत में छाया मंत्रिमंडल की आवश्यकता, उसके संभा...

Gig Workers in India: Pain, Challenges and 10-Minute Delivery Crisis in Quick Commerce Sector

भारत में गिग वर्कर्स की पीड़ा: क्विक कॉमर्स और 10 मिनट डिलीवरी संकट का विश्लेषण डिजिटल क्रांति ने जिस सबसे बड़े सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को जन्म दिया है, उसका एक प्रमुख रूप है—गिग इकोनॉमी। ऐप-आधारित प्लेटफॉर्म्स ने काम को “ऑन-डिमांड” बना दिया है, जहाँ नौकरी स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी कार्यों की शृंखला है। उबर, ब्लिंकिट, ज़ेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट और ज़ोमैटो जैसे प्लेटफॉर्म्स इस मॉडल के प्रतीक हैं। पहली नज़र में यह व्यवस्था युवाओं को लचीलापन, तुरंत कमाई और तकनीक से जुड़ने का अवसर देती है, लेकिन इसी चमकदार परत के नीचे गिग वर्कर्स की पीड़ा, असुरक्षा और संघर्ष की एक लंबी कहानी छिपी है। भारत में यह समस्या विशेष रूप से क्विक कॉमर्स सेक्टर में दिखाई देती है, जहाँ “10 मिनट में डिलीवरी” जैसे वादों ने उपभोक्ताओं को तो सुविधा दी, लेकिन डिलीवरी पार्टनर्स के जीवन को जोखिम में डाल दिया। यह केवल तेज डिलीवरी का सवाल नहीं है, बल्कि यह उस आर्थिक मॉडल का सवाल है जो मुनाफे को श्रमिकों की सुरक्षा से ऊपर रखता है। गिग इकोनॉमी: अवसर और विरोधाभास गिग इकोनॉमी का मूल आकर्षण है—लचीलापन। कोई भी व्यक्ति अपनी सु...

Trump’s “Board of Peace”: From Gaza Plan to Global Conflict Resolution

ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’: गाजा से वैश्विक संघर्ष समाधान तक एक नया प्रयोग प्रस्तावना इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक बार फिर संक्रमण के दौर से गुजर रही है। बहुपक्षीय संस्थाएं—विशेषकर संयुक्त राष्ट्र—लगातार यह आरोप झेल रही हैं कि वे तेज़ी से बदलते संघर्षों के समाधान में प्रभावी नहीं रह गई हैं। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 में गाजा संकट के समाधान के लिए एक 20-सूत्रीय योजना पेश की और उसके दूसरे चरण में एक नई संस्था— ‘बोर्ड ऑफ पीस’ —की स्थापना की। जो पहल गाजा तक सीमित मानी जा रही थी, वह जनवरी 2026 में अचानक वैश्विक संघर्ष समाधान के मंच में बदलने लगी। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, बहुपक्षीयता और अमेरिका की भूमिका पर नए प्रश्न खड़े हो गए हैं। गाजा संकट और ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की उत्पत्ति 2024–25 में इजरायल-हमास संघर्ष ने गाजा को मानवीय त्रासदी के केंद्र में ला खड़ा किया। लगातार युद्ध, विस्थापन, भुखमरी और बुनियादी ढांचे का विनाश अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चुनौती बन गया। इसी संदर्भ में सितंबर 2025 में ट्रंप ने ‘कॉम्प्रिहेंसिव प्लान टू एंड द गाजा क...

Frederick Merz’s India Visit and the “Indo-Europe” Idea: A New Strategic Geography

जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की भारत यात्रा और 'इंडो-यूरोप' की अवधारणा: एक रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तावना वैश्विक भू-राजनीति में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकतरफा नीतियां और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आक्रामक कूटनीति ने दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। ऐसे समय में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की जनवरी 2026 में भारत की दो-दिवसीय आधिकारिक यात्रा केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक नई रणनीतिक भूगोल की शुरुआत का संकेत देती है। प्रसिद्ध स्तंभकार सी. राजा मोहन ने इसे "इंडो-यूरोप" की संज्ञा दी है। यह अवधारणा भारत और यूरोप (विशेषकर जर्मनी) के बीच गहन सहयोग के माध्यम से अमेरिका और चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह यात्रा 25 वर्षों के भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी और 75 वर्षों के राजनयिक संबंधों के उपलक्ष्य में हुई, जिसमें दोनों पक्षों ने 19 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। यात्रा के प्रमुख परिणाम और समझौते मेर्ज़ की यात्रा 12-13 जनवरी 2026 को हुई, जो उनकी चांसलर बनने के बाद प...

India's Israel-Palestine Policy: From Traditional Palestinian Support to Strategic Balance with Israel (2026 Update)

भारत की इज़राइल-फिलिस्तीन विदेश नीति: नेहरू से मोदी तक इज़राइल–फिलिस्तीन विवाद बीसवीं सदी के सबसे जटिल और दीर्घकालिक भू-राजनीतिक संघर्षों में से एक है, जो 1947-48 के विभाजन और इज़राइल की स्थापना से लेकर आज के गाजा संकट तक फैला हुआ है। यह मुद्दा न केवल मध्य पूर्व की राजनीति को आकार देता है, बल्कि वैश्विक दक्षिण-उत्तरी संबद्धताओं, धार्मिक पहचान राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विमर्श का केंद्र बिंदु भी रहा है। भारत का रुख इस संदर्भ में विशेष रूप से अध्ययन-योग्य है, क्योंकि यह पारंपरिक रूप से फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के समर्थक के रूप में जाना जाता है, जबकि हाल के दशकों में इज़राइल के साथ रणनीतिक साझेदारी भी गहराती जा रही है। यह द्वंद्व भारत की विदेश नीति की बहुआयामी प्रकृति को उजागर करता है, जिसमें ऐतिहासिक विरासत, वैचारिक आधार, भू-रणनीतिक हित, आर्थिक कारक और घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलताएं शामिल हैं। इस विश्लेषण में हम इन आयामों का संतुलित परीक्षण करेंगे, विशेष रूप से 2023 के बाद की घटनाओं के प्रकाश में, जो दर्शाती हैं कि भारत किस प्रकार वैश्विक दबावों के बीच संतुलन साध रहा है। भारत की विदे...

Trump’s Gaza Peace Board and India’s Role: Strategic, Political and Ethical Analysis

ट्रंप की ‘गाजा शांति बोर्ड’ में भारत की संभावित भागीदारी: एक संतुलित विश्लेषण भूमिका इजरायल–हमास युद्ध के बाद गाजा पट्टी के भविष्य को लेकर वैश्विक स्तर पर कई योजनाएँ सामने आई हैं। इन्हीं में से एक है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाजा’ । इसका उद्देश्य गाजा में युद्धोत्तर शासन, सुरक्षा व्यवस्था और पुनर्निर्माण को एक अंतरराष्ट्रीय ढाँचे के तहत संचालित करना है। इस बोर्ड में भारत को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया गया है। यह निमंत्रण केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका की स्वीकृति भी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत को इस पहल का हिस्सा बनना चाहिए? और यदि हाँ, तो किस स्तर तक? यह लेख इसी प्रश्न का ऐतिहासिक, रणनीतिक और नैतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है और अंत में एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। पृष्ठभूमि: गाजा और ट्रंप की शांति योजना गाजा लंबे समय से इजरायल–फिलिस्तीन संघर्ष का केंद्र रहा है। हमास के नियंत्रण, इजरायली सैन्य कार्रवाइयों और मानवीय संकट ने इस क्षेत्र को वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है। ट्रंप ...