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शाह बानो केस: लिंग न्याय, धार्मिक स्वायत्तता और भारतीय धर्मनिरपेक्षता के द्वंद्व का एक अध्ययन परिचय 1985 का शाह बानो केस भारतीय संवैधानिक इतिहास की उन दुर्लभ घटनाओं में से है, जिसने धर्मनिरपेक्षता, न्यायिक सक्रियता और लिंग समानता के बीच गहन विमर्श को जन्म दिया। एक 62 वर्षीय मुस्लिम महिला का भरण-पोषण का अधिकार धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय राजनीतिक बहस में बदल गया, जिसने भारतीय लोकतंत्र के चरित्र को चुनौती दी और समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) की बहस को पुनर्जीवित कर दिया। हाल ही में आई फिल्म हक (2025) ने इस ऐतिहासिक केस को मानवीय दृष्टिकोण से पुनः प्रस्तुत किया है—जहां एक साधारण स्त्री की न्याय के लिए लड़ाई, भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे की सीमाओं और संभावनाओं दोनों को उजागर करती है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि शाह बानो बेगम का जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। उन्होंने 1932 में मोहम्मद अहमद खान नामक वकील से विवाह किया और पाँच बच्चों की माँ बनीं। चार दशकों तक चले वैवाहिक जीवन के बाद, 1975 में उनके पति ने दूसरी शादी कर ली और शाह बानो को घर से निकाल दिया। शाह बानो को उनके पति द्व...