अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
शाह बानो केस: लिंग न्याय, धार्मिक स्वायत्तता और भारतीय धर्मनिरपेक्षता के द्वंद्व का एक अध्ययन परिचय 1985 का शाह बानो केस भारतीय संवैधानिक इतिहास की उन दुर्लभ घटनाओं में से है, जिसने धर्मनिरपेक्षता, न्यायिक सक्रियता और लिंग समानता के बीच गहन विमर्श को जन्म दिया। एक 62 वर्षीय मुस्लिम महिला का भरण-पोषण का अधिकार धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय राजनीतिक बहस में बदल गया, जिसने भारतीय लोकतंत्र के चरित्र को चुनौती दी और समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) की बहस को पुनर्जीवित कर दिया। हाल ही में आई फिल्म हक (2025) ने इस ऐतिहासिक केस को मानवीय दृष्टिकोण से पुनः प्रस्तुत किया है—जहां एक साधारण स्त्री की न्याय के लिए लड़ाई, भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे की सीमाओं और संभावनाओं दोनों को उजागर करती है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि शाह बानो बेगम का जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। उन्होंने 1932 में मोहम्मद अहमद खान नामक वकील से विवाह किया और पाँच बच्चों की माँ बनीं। चार दशकों तक चले वैवाहिक जीवन के बाद, 1975 में उनके पति ने दूसरी शादी कर ली और शाह बानो को घर से निकाल दिया। शाह बानो को उनके पति द्व...