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Supreme Court Intervention on UGC Regulations: Equality, Inclusion and the Future of Higher Education in India
उच्चतम न्यायालय का यूजीसी नियमों पर हस्तक्षेप: समानता, समावेशिता और जाति-विहीन समाज की संवैधानिक तलाश भारतीय लोकतंत्र की आत्मा समानता में निहित है—एक ऐसी समानता जो केवल कानूनी प्रावधान न होकर सामाजिक चेतना का आधार बने। इसी पृष्ठभूमि में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा 2026 में जारी किए गए नए नियमों पर उच्चतम न्यायालय का हालिया अंतरिम हस्तक्षेप केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय समाज की दिशा पर एक गहन संवैधानिक टिप्पणी के रूप में देखा जाना चाहिए। यह फैसला उस मूल प्रश्न को पुनः केंद्र में लाता है कि क्या भारत, 75 वर्षों की स्वतंत्रता के बाद, जाति-विहीन समाज की ओर अग्रसर है या अनजाने में विभाजनकारी रेखाओं को और गहरा कर रहा है। विवाद की पृष्ठभूमि: नियमों में निहित संकुचन 13 जनवरी 2026 को यूजीसी द्वारा अधिसूचित नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में संकाय नियुक्तियों और पदोन्नति प्रक्रियाओं में भेदभाव को रोकना बताया गया। किंतु इन नियमों की मूल समस्या उनकी परिभाषात्मक संरचना में निहित थी। अनुच्छेद 3(सी) के अंतर्गत ‘भेदभाव’ को विशेष रूप से जाति-आधारित भेदभाव तक...