अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर हमला: परमाणु निरोध की दोहरी नैतिकता और विश्व व्यवस्था की परीक्षा (विश्लेषणात्मक एडिटोरियल लेख) प्रस्तावना: युद्ध, शक्ति और नैतिकता का टकराव फरवरी–मार्च 2026 में पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील युद्धक्षेत्र बन गया है। अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध शुरू किया गया संयुक्त सैन्य अभियान केवल एक क्षेत्रीय सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, परमाणु अप्रसार व्यवस्था और शक्ति-राजनीति के नैतिक आधारों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। अमेरिकी प्रशासन इस अभियान को “पूर्वनिवारक हमला” (pre-emptive strike) के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को रोकना बताया जा रहा है। किंतु इस तर्क के साथ ही एक गहरी विडंबना भी जुड़ी हुई है—वे राज्य जो स्वयं परमाणु हथियारों से लैस हैं, वही एक ऐसे राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं जिसके पास अभी तक परमाणु हथियार होने का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ परमाणु निरोध (nuclear deterrence) और पर...
भारत–अमेरिका 10 वर्षीय रक्षा ढांचा समझौता: इंडो-पैसिफिक स्थिरता के लिए रणनीतिक अनिवार्यता परिचय भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के तीव्र होते दौर और बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन के बीच, 31 अक्टूबर 2025 को मलेशिया के कुआलालंपुर में भारत और अमेरिका के बीच हस्ताक्षरित 10 वर्षीय “प्रमुख रक्षा साझेदारी ढांचा समझौता” (Framework for Major Defense Partnership) , दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में एक ऐतिहासिक मोड़ का प्रतीक है। यह समझौता, जिस पर भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस (ADMM-Plus) के इतर हस्ताक्षर किए, केवल एक औपचारिक कूटनीतिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह भारत की “Act East Policy” और अमेरिका की Indo-Pacific Strategy के बीच रणनीतिक सामंजस्य का सजीव उदाहरण है। यह समझौता न केवल रक्षा सहयोग को संस्थागत रूप देता है, बल्कि उभरती प्रौद्योगिकियों, औद्योगिक साझेदारी, और क्षेत्रीय स्थिरता के नए अध्याय की शुरुआत करता है — वह भी भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भारत–अमेरिका रक्षा संबंधों की या...